भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 751

५६८ राजतरंगिणी सर्वरत्नजयस्कन्दगुप्तशब्दाङ्किताभिधाः । आसन् विहारचैत्यादिकृत्यैस्तत्सांचवा यशः॥ ३८० ॥ ३८०. सर्वरत्न, जय १ एवं स्कन्द २ गुप्त नामक उसके मन्त्रिप्रवरों ने विहार चैत्य आदि कृत्य किये । 'च द्वात्रिंश' मिलता है । पादटिप्पणियाँ ३७९ (१) श्री विल्सन ने युधिष्ठिर द्वितीय का राज्याभिषेक काल सन् १८४ ईस्वी २ मास और सम कुल काल सं० ४८९ ई० दिया है । तथा राज्यकाल ३९ वर्ष २ मास देता है । श्री एस० पी० पण्डित ने यह समय सन् २०४ ई० तथा राज्य काल २१ वर्ष ३ मास दिया है । ह्वीन्र्तेोन ने राज्याभिषेक का समय लौकिक संवत् ३२४६ वर्ष ११ मास १ दिन तथा राज्यकाल ३८ वर्ष ३ मास दिया है । श्री बा०ने यह समय संवत् ४०९३ तथा सन् ३२३ ई० दिया है । ट्रायन के मत से यह काल सन् १८४ ई० ८ मास तथा कनिघम के अनुसार संन् ४६४ ई० आत ह । पादटिप्पणियाँ : ३८० (१) जयेन्द्रविहार-चीनी पर्यटक मोकुन ने अपने पर्यटन में जे-जे विहार का उल्लेख किया है । वह सम्भवतः जय का ही निर्माण कराया होगा । (२) स्कन्द-स्कन्द द्वारा निर्मित विहार तरंग ६ । ३७ में वर्णित स्कन्द भवन विहार है । वह श्रीनगर में वर्तमान खण्डवन स्थान में था । यह विहार श्रीनगर के वितस्ता झेलम नदी के दक्षिण तटपर नौ कदल अर्थात् छठे पुल ओर नगर की सामावर्ती ईदगाह के मध्य स्थित था । कल्हण ने इसका वर्णन स० ८ : १४४२ में किया है । वहाँ उसने स्कन्द भवन ही नाम दिया है । यहाँ राजा सुम्शल की रानी भस्म हुई थी । यह स्थान मणिका स्वामी की श्मशान मूर्ति नाम से प्रसिद्ध हो गया था । इसे मापगुम अर्थात् अरक्षित स्थान भी कहते थे । कालान्तर में यह स्थान कब्रिस्तान के काम में आने लगा था । मुहम्मद शाह (सन् १४८४-८६) के समय में यह सेना का शिविर (छावनी) के काम में लाया गया था । खण्डवन मुहल्ला के दक्षिण तरफ विहार स्थान रहा होगा । यह स्थान सम्भवतः नव कदल से १५० गज पर रहा होगा । यहाँ पर अब मुल्ला मुहम्मद बासूर की जियारत है । जियारत में यहाँ पर स्थित प्राचीन मन्दिर तथा विहार के टूटे अलंकृत शिलाखण्ड लगे हैं । हिन्दू मन्दिर की शैलो पर जियारत का निर्माण किया गया था । स्कन्द का दूसरा नाम कार्तिकेय है । कुमार कार्तिकेय का एक बार उल्लेख नीलमतपुराण में आया है । कार्तिकेय की पूजा कृत्तिका के साथ करने का निर्देश किया गया है। नीलमत में उस महान् सेनानी अथवा सेनापति के रूप में चित्रित नहीं किया गया है । ( नील० 435, 642, 649 ) श्री स्तीन ने इस जियारत को सन् १८९१ ई० में देखा था । उन्हें एक स्थान कच्ची दीवाल से घिरा मिला था। इसके केन्द्र में २२ फ़िट ऊँचा एक डूह। चौकोर पत्थर की दीवाल से वेष्ठित मिला था । वह ३८ फ़िट वर्गाकार था । उसके दक्षिण पूर्व की ओर एक गड्ढा १० फ़िट का था । यह सम्भवतः प्राचीन जल कुण्ड अथवा जल स्थान था । उसके कुछ फासले पर लगभग सन् १८८१ ई० में जियारत के मुल्ला ने एक गोल कुँआ खोद लिया था। स्थानीय ब्राह्मण कहते हैं कि इस स्थान पर कुमार किंवा स्कन्द का मन्दिर था । उसके समीप