राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरङ्ग ३ भालं वह्निशिखाङ्कितं दधदधिश्रोत्रं वहन् संभृत- क्रीडत्कुण्डलिजृम्भितं जलधिजच्छायाऽच्छकण्ठच्छविः । वक्षो बिभ्रदहीनकञ्चुकचितं यद्वाङ्गनाऽर्धस्य वो भागः पुङ्गवलक्ष्मणोऽस्तु यशसे वामोऽथवा दक्षिणः ॥ २ ॥ २. जिनका वामांग नारी (पार्वती का) है। जिनका ललाट केसर तिलक से सुशोभित है। जिनके कानों में दोलायमान कुण्डल क्रीड़ा करते हैं। जिनका कंठ शंख वर्ण उज्ज्वल है। जिनके वक्षस्थल का दक्षिणांग नर (शिव' का) है। जिनके भाल पर वह्निशिखा अंकित है। जिनके कानों के निकट केलित सर्पवृंद मुख खोलते रहते हैं। जिनके कंठ की छवि विषपान करने के कारण मलिन नहीं होकर कांतिपूर्ण है। जिनका वक्षस्थल शेषनाग कवच से वेष्टित है। वे अर्धनारीश्वर वृषभध्वज, चाहे दक्षिण अथवा वाम अंग हो, आपका कल्याण करें। वन्द्यः कोऽपि सुधास्यन्दाऽऽस्कन्दी स सुकवेर्गुणः । येन याति यशःकायः स्थैर्यं स्वस्य परस्य च ॥ ३ ॥ ३. सुधा'धारा को भी मात करनेवाले सुकवियों का गुण वंदनीय है; जिनके कारण उनकी तथा दूसरों की यशःकाया स्थिर हो जाती है। कोऽन्यः कालमतिक्रान्तं नेतुं प्रत्यक्षतां क्षमः । प्राक्कथन कविप्रजापतींस्त्यक्त्वा रम्यनिर्माणशालिनः ॥ ४ ॥ ४. प्रजा'पति के समान रम्य निर्माणशील कवियों के अतिरिक्त और किसमें इतनी क्षमता है, जो भूतकाल की बातें प्रत्यक्ष मूर्तिमान आँखों के संमुख उपस्थित कर सके। पाठभेदः श्लोक संख्या दो में 'सम्भृत' का पाठभेद 'सम्भूत' 'जृम्भितं' का 'जुम्भित' मिलता है। पादटिप्पणियाँ २. (१) शिव—शिव की यहाँ वंदना अर्द्धनारीश्वर के रूप में की गई है। शिव का दक्षिण अंग शिव तथा वाम अंग पार्वती का माना जाता है। पाठभेदः श्लोक संख्या ३ में 'सुधा' का 'स्वधा' और 'येन' का 'येना' मिलता है ॥ ३ ॥ पादटिप्पणियाँ ३. (१) सुधा—सुधा अर्थात् अमृत पान करनेवाला ही अमृतत्व प्राप्त करता है। यदि कोई अन्य व्यक्ति अमृत पान करे तो उसका फल अपने को नहीं मिल सकता। किंतु कवि अपने काव्यामृत एवं लेखनी द्वारा अमर होकर, जिसके विषय में अपनी लेखनी उठाता है, उसको भी उसके यश- वर्णन द्वारा अमर बना देता है। काया अस्थिर है। उसका नाश होता है। परंतु यशःकाया अपने यश के कारण स्थिर हो जाती है। यदि वाल्मीकि कवि नही होते, तो, राम की कथा और उनका यश कैसे आज तक स्थिर रहता ? पाठभेदः श्लोक संख्या ४ में 'पती' का पाठभेद 'पती' मिलता है ॥ ४ ॥