राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४ राजतरङ्गिणी न पश्येत्सर्वसंवेद्यान् भावान् प्रतिभया यदि । तदन्यद्दिव्यदृष्टित्वे किमिव ज्ञापकं कवेः ॥ ५ ॥ ५. यदि कवि में सर्व संवेद्य भावों के प्रकट करने की प्रतिभा न होती तो और किस प्रकार माना जा सकता था कि उन्हें दिव्य दृष्टि प्राप्त है। कथादैर्घ्यानुरोधेन वैचित्र्येऽप्यप्रपञ्चिते । तदत्र किंचिदस्त्येव वस्तु यत् प्रीतये सताम् ॥ ६ ॥ ६. विचित्र घटनावलियों का विस्तृत समावेश कथा विस्तार के कारण इसमे नहीं किया जा सका है, तथापि सत्पुरुषों को यत्र तत्र किंचित् रुचिकर कथानक भी मिलेंगे। श्लाघ्यः स एव गुणवान् रागद्वेषबहिष्कृता । भूतार्थकथने यस्य स्थेयस्येव सरस्वती ॥ ७ ॥ ७. वही गुणवान् श्लाघनीय है जिसकी वाणी राग-द्वेषों का बहिष्कार कर एक न्यायमूर्ति के समान भूतकालीन घटनावलियों को यथार्थ रूप से प्रस्तुत करती है। पादटिप्पणियाँ ४. (१) प्रजापति—सृष्टि के सर्जक परम पितामह ब्रह्मा के लिये प्रजापति शब्द का प्रयोग किया गया है । सृष्टि के सर्जन काल मे ब्रह्मा ने १० लोक- कर्ताओ को उत्पन्न किया था । अ० वेद : ३:१०: १३, ४.२५ १; ८:१ १७, ९ १:२४, ३०:७:७, वाजसनेयि संहिता माध्यदिन शाखा : ८:३६, शतपथ ब्राह्मण १.४:२१, तैत्तिरीय ब्राह्मण २:२ १०, मत्स्य पुराण १:१ २५, प्रजापति की परिभाषा करता है— 'विश्वेप्रजाना पतयो येभ्यो लोका विनि सृताः' । वेद में प्रजापति शब्द प्रजापालक, सविता, अग्नि, आदि देवो के लिये भी आया है। ऋग्वेद ४.५५:२, ६:५६, १०:८५.४३, अथर्ववेद; १० १.२१ । प्रजापतियो की संख्या कितनी थी, इस संबंध में मतैक्य नही है । कहीं ७, कही ११, कही १३, कही १४ और कहीं २१ संख्या उनको दी गई है। महा- भारत मे २१ प्रजापतियों का उल्लेख मिलता है । यह संख्या सबसे अधिक—ब्रह्मा, रुद्र, मनु, दक्ष, भृगु, धर्म, तप, यम, मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसिष्ठ, परमेष्ठी, सूर्य, चन्द्रामा, कर्दभ, क्रोध और विक्रीत, महाभारत में दी गई है । (आदि पर्व १:२९, ३३; ३१.२६ २१; शांति पर्व ३३४:१५, २७) । निम्नलिखित प्रजापतियों के नाम सभी तालिकाओ मे पाए जाते है—मरीचि, अत्रि, अंगिरस, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, वशिष्ठ, भृगु, नारद । पाठभेद: श्लोक संख्या ५ मे 'दन्यद्दिव्य' का पाठभेद 'दन्यदिव्य' मिलता है ॥ ५ ॥ श्लोक संख्या ६ मे 'चित्ये' का 'चित्यै', 'तदत्र' का 'तन्मात्र' तथा 'दस्त्येव' का पाठभेद 'दस्त्यत्र' मिलता है । श्लोक संख्या ७ में 'कृता' का पाठभेद 'ष्कृत:' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ७. (१) स्थेय—कल्हण ने स्थेय शब्द का प्रयोग न्यायाधीश, न्यायकर्ता के अर्थ मे किया है । उसने अपने को न्याय दृष्टि से एक न्यायकर्ता की तरह परिस्थितियो के बीच रखा है । प्राचीन प्राप्त पुस्तकोँ, अप्राप्य ग्रंथों के उद्धरणो, सभी प्रकार की ऐतिहासिक सामग्रियो का निरीक्षण, अवलोकन तथा विवेक तुला पर एक न्यायकर्ता की तरह तोलकर अपने मत तथा विचार को राजतरंगिणी मे लिपिबद्ध किया है ।