भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 80, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 80

प्रथम तरङ्ग ५ पूर्वैर्बद्धं कथावस्तु मयि भूयो निबध्नति । प्रयोजनमनाकर्ण्य वैमुख्यं नोचितं सताम् ॥ ८ ॥ ८. पूर्वकालीन रचनाकारों द्वारा जो कथा वस्तुएँ निबद्ध कर दी गई हैं। उनका मैं क्यों पुनर्लेखन कर रहा हूँ, इस प्रयोजन के हेतु को बिना समझे सत्पुरुषों का मुझसे विमुख होना उचित नहीं है । दृष्टं दृष्टं नृपोदन्तं बद्ध्वा प्रमयमीयुषाम् । अर्वाक्काळभवैर्वार्ता तत्प्रबन्धेषु पूर्यते ॥ ६ ॥ ९. जिन लेखको ने अपने समय के 'नृपों का इतिहास' लिपिबद्ध किया है, उनके पश्चात् अर्वाचीन काल के कवि के लिये और क्या ऐसी बातें शेष रह गई हैं, जो अपने नूतन प्रबंध के कारण पूर्ण करेंगे ? दाक्ष्यं कियदिदं तस्मादस्मिन् भूतार्थवर्णने । सर्वप्रकारं स्खलिते योजनाय ममोद्यमः ॥ १० ॥ १०. अतएव इस ग्रन्थ के लिखने की मेरी योजना यह है कि मैं सर्वांगीण पूर्ण क्रमबद्ध इतिहास उपस्थित करूँ। जहाँ पुरातन इतिहास लेखकों की रचनाएं विश्रृंखलित हैं ।


[बायाँ स्तम्भ] पाठभेदः श्लोक संख्या ८ में 'मुख्यम्' का पाठभेद 'मुख' मिलता है। श्लोक संख्या ९ तथा १० युग्मक हैं। श्लोक संख्या ६ में 'बद्ध्वा' का पाठभेद 'बद्धा' ( 'बुद्ध्वा' ) तथा 'प्रमय' का 'प्रथम' मिलता है। श्लोक संख्या १० में 'कारं' का 'कार' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ ९. (१) नृप—अमरकोशकार ने राजा के सात नाम दिए हैं—(१) राजन् ( २ ) राट्, (३) पार्थिव, (४) क्ष्माभृत्, (५) नृप, (६) भूप और (७) महीक्षित् ।-क्षत्रिय वर्ग ८:१। नृप का शाब्दिक अर्थ होता है 'मनुष्यों की रक्षा करनेवाला।' राजा तथा नृप के अर्थों में किंचित् भेद है। कल्हण ने यहाँ भूपति, राजा, महीपालादि शब्दो का प्रयोग नहीं किया है। वैदिक साहित्य में भी यह इसी अर्थ मे प्रयुक्त हुआ है। ऋग्वेदः २:१:१७, ४:२०:१, ७:६ ९:१, १०:४४: २-३; अथर्ववेद ५:१८:१-१५; तैत्तिरीय आरण्यक : ६:३:३ ।

[दायाँ स्तम्भ] (२) इतिहास प्रयोजन—कल्हण अपने पूर्व लेखको के इतिहास क्रम को जारी रखना चाहता है। उसके इस कथन का अर्थ यह है कि इतिहास लिखने की प्राचीन परंपराएँ रही है। यदि आज भारतीय इतिहास ग्रंथ उपलब्ध नहीं हो रहे है, तो इसका अर्थ यह न लगाया जाए कि भारत में इतिहास लिखने की परंपरा थी ही नहीं। कल्हण का यह संकेत स्पष्ट है कि वह इतिहास लेखको की परंपरा को जारी रखना चाहता है, ताकि अपने समय तक के राजाओं का इतिहास जहाँ तक पूर्वलेखक लिख चुके हैं, उनमें जोड़कर टूटी श्रृंखला के इतिहास के टूटे क्रम को पुनः क्रमबद्ध कर दिया जाय । राजतरंगिणी नाम कल्हण के उर्वर मस्तिष्क की मौलिक उपज है। उसके पूर्व ग्रंथ नृप तथा राजाओ के नाम से संबंधित थे। उनका नाम ग्रंथ के उद्देश्य का बोधक हो जाता था। परंतु राजतरंगिणी एक ऐसा नाम है जो राजा