राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ राजतरङ्गिणी
और सरित् किंवा तरंगिणी का मेल नहीं खिलता। राजा मनुष्य है। तरंगिणी एक नदी है। वह प्रकृति की देन जड पदार्थ है। कल्हण ने राजाओं के चरित्र किंवा इतिहास का नूतन नामकरण राजतरंगिणी नाम से किया है। कल्हण के पश्चात् आनेवाले इतिहास लेखकों ने इस नाम को अपनाया है। काश्मीर के इतिहास को कल्हण के पश्चात् लिखकर इतिहास शृंखला को कायम रखा है - जोनराज, श्रीवर तथा शुक आदि सन् ११४८ से १५५६ ई० तक अर्थात् मुगल काल के प्रारंभ तक कल्हण के पश्चात् राजतरंगिणी लिखकर कल्हण द्वारा आरंभ किए महाप्रयास को आनेवाली चार शताब्दियों तक जारी रखा। इस तरंगिणी की धारा को सूखने नहीं दिया। तरंगिणी अर्थात् नदी की धारा अविच्छिन्न गति से बहती रहती है। तरंगिणी का पेटा एक सा रहता है। परंतु उसमें सर्वदा नवीन जल आता रहता है। प्रवाह के साथ बहकर गया जल पुन लौटकर नहीं आता। तथापि धारा की गति तथा जलस्रोत की शृंखला टूटती नहीं। तरंगिणी के समान देश में राजा आते रहते हैं जाते रहते हैं परंतु राज्य सिंहासन खाली नहीं रहता। देश में नदी की धारा की तरह राजपरंपरा अनवरत गति से अविशृंखल क्रम से चलती रहती है। राज्य के शासन का क्रम टूटता नहीं। राजा मरने के साथ ही दूसरे व्यक्ति के रूप में जीता रहता है। इंग्लैंड के राजा के जीवन, अभिषेक तथा मृत्यु के समय - भगवान् राजा की रक्षा करे, राजा चिरंजीवी हो - कहा जाता है। अर्थात् देश का राजा नहीं मरता, बल्कि देश में राजा पदवीधारी व्यक्ति मरता है। नदी के जलबिंदुओं के समान राजपरंपरा काल प्रभाव के साथ चलती रहती है। उसमें जल बिन्दुओं के तुल्य नामधारी राजा आते रहते हैं। प्रवाह के साथ बह जाते हैं। उनके पीछे पुनः जल- बिंदु आकर प्रवाह को पूर्ववद् जारी रखते हैं।
राज सिंहासन नदी के पेटा के समान है। वहाँ राजा तुल्य जलबिंदु आते हैं और चले जाते हैं। राज्य सिंहासन नदी के पेटा के समान कभी जलतुल्य राजा से विहीन नहीं होता। राज्य तथा शासन का क्रम नहीं टूटता। सिंहासन पर नदी में आते नवीन जल के समान राजाओं की परंपरा आती रहती है। यह प्रवाह कभी सूखता नहीं। अनादिकाल से चला आया है। चला जायगा। हमारा रहना और न रहना महत्त्वहीन है। नदी प्रकृति के उषाकाल से जल बहाती समुद्र में मिलने चली जा रही है। राजा सभ्यता के उदय काल से होता आया है। काल प्रभाव से होता रहेगा। उसकी यह आने जाने की परंपरा नहीं टूटेगी। कितनी उदात्त कल्पना थी कवि कल्हण की। उसने इतिहास की एक नवीन व्याख्या की है। यह व्याख्या उतनी ही आधुनिक कही जायगी जितने आधुनिक हम अपने होने का गौरव अनुभव करते हैं। तरंगिणी में लोल लहरियां उठती हैं। उत्ताल तरंगें उठती हैं। भंवरें चक्कर खाती हैं। उनका निर्मल जल गदले वर्षाकालीन जल में परिणत हो जाता है। कलकल करती लहरियां जलप्लावन का रूप धारणकर गरजने लगती हैं। जल दूषित होता है। शरद ऋतु आती है। जल पुनः निर्मल हो जाता है। शीत ऋतु में ये ही लहरियां जम जाती हैं। तुषारपात के कारण ठंडी श्वेत ओढ़नी ओढ़कर सब कुछ ठंडा कर देती हैं। पादपों के पत्ते गिर जाते हैं। कुसुम- झाड़ियां ठूंठ लगने लगती हैं। वसंत आता है। तुषारपात का अवसान होता है। जमा बर्फ गलने लगता है। धारा में गति आती है। पादपों में नवकिसलय निकलते हैं। कुसुम-झाडियों में कलियां मन ही मन मुस्कुराने लगती हैं। ग्रीष्म काल आते ही जल धारा क्षीण होने लगती है। उसकी यह क्षीणता उसकी महत्ता बढ़ा देती