राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरङ्ग ७
[बायाँ स्तम्भ]
है। वह तृषा बुझाने में, पादपों को विकसित करने में, पुष्पों को सुरभि फैलाने में, उन्हें जल से सीचकर उनमें उत्साह उत्पन्न करती है। शांति प्रदान करती है। पुनः घूमती वर्षा ऋतु आती है। नदी अपना सुहावना रूप बदलकर हुंकार उठती है। किनारों को काटती, वृक्षों को बहाती, जलप्लावन करती, गरजती, मलिन रूप धारण करती, महार्णव से मिलने चल देती है। ये ही बातें राजाओं तथा राज्यों के विषय में कही जा सकती हैं। वर्षा- कालीन नदी का जलप्लावन राज्यों की क्रांतियां, शरद् ऋतु की निर्मलता राज्यों की स्थिरता, शीत ऋतु की ठंड राज्यों की जड़ता, वसंत ऋतु की सुरभि राज्यों का विकास, ग्रीष्मकालीन जल की उपयोगिता राज्यों के शांतिकाल का द्योतक हैं। नदी राज्य है। जल राज्य की जनता है। वर्षा- कालीन मटमैला जल राज्य के दोषों को प्रकट करता है। निर्मल धारा राज्य के गुणों को प्रकट करती है। ग्रीष्मकालीन शीतल धारा जनता के दुःख निवारणार्थ श्रेष्ठ कार्यों का रूपक प्रस्तुत करती है। आततायियों के आतंक से सरिता जल जनता को शीतलता प्रदान करता है। शांति देता है। नदी के तट पर गर्मी से व्याकुल व्यक्ति जैसे शीतलता, शांति, सुख का बोध करता है, उसी प्रकार पीड़ित प्राणी राज्याश्रय प्राप्त करते ही दुःख से पीड़ा से, त्राण पाता है। नदी वर्षा में दूषित होती है। काव्यकारों ने वर्षा ऋतु में नदियों का रजस्वला होना कहा है। उस समय दोष के कारण उनका कोई स्पर्श नहीं करता। ठीक उसी प्रकार राज्य में दोष आ जाने पर कोई राज्य के पास आना नहीं चाहता। इसी नदी का निर्मल जल पान करने वाला उसमें स्नान तक करना नापसंद करता है। राजा में दोष उत्पन्न होने पर राजा अपना तो सर्वनाश करता ही है, दूसरों के भी नाश का
[दायाँ स्तम्भ]
साधन बन जाता है। उफनती वर्षा कालीन तरंगिणी की प्रबल वेगधारा अपने ही दोनों तटों को काटती है, अपने ही तटवर्ती फलप्रद छायाप्रद वृक्षों को उखाड़ती वहाती नष्ट करती है; भूमि के पादपों को सींचने के स्थान पर उन्हें गलाती, गिराती; बहाती, अपनी सीमामर्यादा लांघती देश को जलप्लावित करती है। उसी प्रकार राजा अपनी मर्यादा अपनी सीमा उल्लंघन करने पर क्रांति किंवा विप्लव का रूप उपस्थित करने के कारण नष्ट हो जाता है। कल्हण ने इसी लिये इतिहास, गाथादि शब्दों के स्थान पर तरंगिणी शब्द का प्रयोग राज्यों के इतिहास के लिये किया है। कल्हण कवि था। कुलीन कवि था। एक राजमंत्री का पुत्र था। कवि हृदय प्रकृति के अंक में बैठकर सौंदर्य संचय करता है। कवि हृदय प्रकृति से मूक वार्ता करता है। वह प्रकृति की प्रतिभा से अपनी प्रतिभा का भंडार भरता है। कवि सरस, अलंकृत, भाषा में अपना उद्देश्य तथा विचार प्रकट करना चाहता है। उसकी सुप्त चेतना कृति के साथ मिलते ही जागृत हो जाती है। कवि कल्हण इसका अपवाद नहीं था। कल्हण सफल इतिहास लेखक कवि था। उसने एक सफल कवि की तरह तरंगिणी की उपमा राज्य से दी है। राज्य श्रृंखला इस तरंगिणी के जल बिंदु हैं। जल की धारा राज का प्रवाह है, जो कभी सूखता नहीं। तरंगिणी की यह धारा अविच्छिन्न रूप से बहती रही है। राजतरंगिणी को इस धारा को सोलहवीं शताब्दी तक जोनराज, श्रीवर, शुकादि जैसे ऐतिहासिक कवि विद्वानो ने सूखने नहीं दिया है। तरंगिणी आज भी सूखी नहीं है। उसमें जल रहा है। आता रहेगा, चाहे इस जलधारा में देश काल पात्र के अनुसार उसके रूप रंग एवं स्वाद में क्यों न अन्तर पड़ गया हो ?