राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 83, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजतरङ्गिणी विस्तीर्णाः प्रथमे ग्रन्थाः स्मृत्यै संक्षिपतो वचः। सुव्रतस्य प्रबन्धेन छिन्ना राजकथाऽश्रयाः ॥ ११ ॥ ११. पूर्वकालीन इतिहास ग्रन्थ विस्तृत थे। उन्हें स्मरण रखने के लिये सुव्रत ने उनका संक्षिप्त संस्करण कर दिया था। अतएव वे छिन्न¹ अर्थात् लुप्त हो गए।
पादटिप्पणियाँ
११. (१) विच्छिन्न = लुप्त-आज भी विद्यालयों में विस्तृत इतिहास ग्रन्थ के स्थान पर नोटों के पढ़ने की प्रथा चल निकली है। विद्यार्थी विशाल पाण्डित्यपूर्ण विस्तृत इतिहास ग्रंथो के चक्कर में नहीं पड़ते। परीक्षाएँ पास करने के लिये नोटों का आश्रय लेते हैं। विस्तृत इतिहास ग्रंथों का केवल संदर्भ के लिये उपयोग किया जाता है। सुव्रत के संक्षिप्त इतिहास का नाम कल्हण नहीं देता है। पूर्व कालीन इतिहास ग्रन्थों का नाम भी कल्हण नहीं देता है। प्रतीत होता है कि उसके समय में मौजूद नहीं थे। प्रतीत होता है कि सुव्रत ने विद्यार्थियों तथा पाठकों की सुविधा के लिये सरस बोधगम्य तथा स्मरण रखने योग्य प्राचीन इतिहासों को संक्षिप्त तथा वर्गीकृत कर दिया था। सुव्रत का यह संक्षिप्त इतिहास प्रचलित तथा ख्यातिप्राप्त हो गया। कल्हण इस बात का स्पष्ट उल्लेख करता है। अतएव पूर्वकालीन विस्तृत इतिहासों की प्रतिलिपि कर उन्हें रखना अथवा उसका पाठ बंद हो गया था। उन दिनों आजकल जैसे प्रकाशन तथा मुद्रण का साधन उपलब्ध नहीं था।
काश्मीर में काफी भोजपत्र के वृक्ष हैं। जोजिला पास के मार्ग में बहुत वृक्ष मैंने देखा। उनसे कुछ भोजपत्र उखाड़कर ले भी आया। भोजपत्र काफी चौड़े और लम्बे होते हैं। परतो पर परतें जमी रहती हैं। उन्हीं पर पुस्तक काली स्याही से लिखी जाती थी। सुव्रत का इतिहास छोटा था। अतएव उसी की प्रतिलिपियां पठन पाठन के लिये बनने लगी होंगी। पुरातन इतिहास ग्रंथ केवल संदर्भ, अनुसंधान तथा शोभा के लिये रह गए होंगे। उनका स्वतः असामायिक तथा अनुपयोग होने के कारण लोप हो जाना जैसा कल्हण स्वयं स्वीकार करता है, कोई आश्चर्य की बात नहीं मालूम होती।
कल्हण के समय सुव्रत द्वारा उल्लिखित इतिहास ग्रंथ उपलब्ध नहीं थे। सुव्रत का इतिहास भी अभी तक कहीं प्राप्त नहीं है, जो कल्हण के समय प्रचलित था। संभव है, कल्हण की राज तरंगिणी अधिक पूर्ण होने के कारण इसका प्रचलन हो गया और सुव्रत का इतिहास उसी प्रकार राजतंरगिणी लिखने के पश्चात् स्वतः लुप्त हो गया, जिस प्रकार सुव्रत के इतिहास के कारण प्राचीन इतिहास ग्रंथ स्वतः लुप्त हो गए थे।
कल्हण के इस उद्धरण से यह स्पष्ट प्रमाणित होता है कि प्राचीन काल में इतिहास लिखने की स्वस्थ परंपरा भारत में प्रचलित थी। गवेषणापूर्ण अनुसंधान के आधार पर रचनाकारो ने गाथा अथवा काव्य नहीं, अपितु इतिहासों की रचना की थी। पाश्चात्य विद्वानो की धारणा कि भारत में इतिहास लिखने की परंपरा नहीं थी, आमूल मिथ्या प्रमाणित होती है।
ऐतिहासिक ग्रन्थों का धार्मिक महत्त्व नहीं होता था। संस्कृत कल्हण के समय में भारत में अनेक स्थानों मे राजभाषा थी । संस्कृत में पत्र व्यवहार तथा लिखा पढ़ी होती थी।
इस समय बहुधा धार्मिक ग्रन्थ इसीलिये भारत में पाए जाते हैं कि उन्हें धार्मिक मान लिया गया था। वे धर्म से संबंधित कर दिए गए थे। उन्हें