भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 84

प्रथम तरङ्ग या प्रथामगमन्नैति साऽपि वाच्यप्रकाशने । पाटवं दृष्टवैदुष्यतोत्रा सुव्रतभारती ॥ १२ ॥ १२. यद्यपि सुव्रत की रचना ने ख्याति प्राप्त कर ली थी तथापि पांडित्याभिमान के कारण उसकी रचना शैली दोषपूर्ण हो गई थी। अस्तु विषय प्रतिपादन में निपुणता प्राप्त नहीं कर सकी। केनाप्यनवधानेन कविकर्मणि सत्यपि । अंशोऽपि नास्ति निर्दोषः क्षेमेन्द्रस्य नृपावली ॥ १३ ॥ १३. यद्यपि क्षेमेंद्र१ की नृपावली२ काव्य रचना है तथापि अनवधानता के कारण उसमे इतनी त्रुटियाँ रह गई हैं कि उसका कोई भी अंश निर्दोष नही कहा जा सकता। संजो कर रखने की परंपरा चल पड़ी थी। चिंता हुई। एतदर्थ जो कुछ इतिहास ग्रन्थ शेष ऐतिहासिक तथा राजाओं के चरित्र सम्बन्धी ग्रन्थो रह गये थे वे भी अनायास समाप्त हो गये। को, यद्यपि वे संस्कृत में लिखे गए थे, धार्मिक मध्येशिया के लोग पूर्व मुस्लिम काल में रूप नहीं दिया गया। ऐतिहासिक घटनाएँ तथा बौद्ध या हिन्दू धर्मानुयायी थे । रूसी पुरातत्त्व राजाओं के चरित्र राजवंशवली किंवा प्रशस्ति विभाग के अनुसंधानों तथा खनन कार्यों से इस पर मात्र रह गए थे। यथेष्ट प्रकाश पड़ा है। वहाँ मुसलमान पहुँचे । मुस्लिम पूर्व काल में हुए राजाओं की वंशावली तथा धर्म स्वीकार करने के लिये बाध्य किया गया। बौद्ध उनका चरित्र उनके हजारों वर्ष पश्चात् होनेवाले भिक्षुओं ने ग्रन्थो को गुफाओं में खोदकर गाड दिया। राजवंशों किंवा जनता के लिये महत्त्वहीन हो गए वे ही प्राप्त होने वाले ग्रन्थ विश्व इतिहास की इस थे। उनके पढ़ने लिखने से न तो पुण्यार्जन हो समय सामग्री बन रहे है। यही काम भारत में सकता था और न धनार्जन । यह मनोभावना मुस्लिम शासन के सत्तारूढ़ होने के पश्चात् बलवती हो गई होगी। अस्तु रामायण, पुराण हुआ। मिस्र, ईरान तथा एशिया माइनर के देशो तथा महाभारत में वर्णित यत्र तत्र इतिहास को एक में प्राचीन ग्रन्थों का सर्वथा लोप हो गया। वहाँ के आंशिक झलक मिल जाती है। उन्हे धार्मिक ग्रन्थ इतिहास को पिरामिडों, ध्वंसावशेषों और प्राप्त की मान्यता देकर, उनका धर्म में समावेश कर होने वाले बिखरे शिलालेखो को पढ़कर जाना जा लिया गया । रहा है। मुसलमानी शासन काल में संस्कृत ग्रंथो पर पाठभेद : विपत्ति आ गई। उन्हें फूंकने, उन्हे नष्ट करने श्लोक संख्या १३ मे 'कर्मणि' का पाठभेद का धार्मिक उन्माद उत्पन्न हो गया। उन्हे 'कर्म्माणि' मिलता है। पड़ना कुफ्र समझा जाता था। कितने ही ग्रंथ लोगों ने स्वतः भय से फूंक दिए वो उन्हें जल पाद टिप्पणियाँ : समाधि दे दी। काश्मीर मे यह बहुत बड़े पैमाने १३ (१) क्षेमेंद्र-कवि क्षेमेंद्र का एक नाम पर हुआ। इस काल में जिन्होंने अपना धर्म नहीं व्यासदास भी है। कवि क्षेमेंद्र काश्मीर के राजा त्यागा, उन्हें धार्मिक ग्रंथों को रक्षा की विशेष अनन्त देव (सन् १०२६-१०६३ ई०) और २