भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 793

६०८ राजतरंगिणी यः शुनोरिव संघर्ष एकार्थाभिनिविष्टयोः । रागिणोर्यदि मानः स कोऽवमानस्ततः परः' ॥ ५१६ ॥ ५१६. 'किसी एक वस्तु पर अभिनिवेश रखने वाले दो श्वानतुल्य दो रागियों का जो संघर्ष है, वह यदि मान है, तो उससे बढ़कर अपमान क्या हो सकता है ? ममकाग्रे मृगाक्षीषु क इत्यायं सचेतसाम् । स्वदेहेऽनुपपन्नोऽपि यः सोऽन्यत्र कथं मतः ॥ ५१७ ॥ ५१७. 'बुद्धिमान् जनों का मृगाक्षियों में अपनत्व कैसे ठीक हो सकता है, जो कि अपने देह में ही अनुपपन्न है, वह अन्यत्र कैसे संगत हो सकता है ? उद्वेगोत्पादनादेषा वध्या चेत्प्रतिभाति मे । रागस्तद्विस्मृतः कस्मान्मूलमुद्वेगशाखिनः ॥ ५१८ ॥ ५१८. 'उद्वेग उत्पन्न करने के कारण यह यदि मुझे वधयोग्य प्रतीत हो रही है तो, वह राग कैसे भूल जाऊँ जो उद्वेग वृक्ष का मूल है। सप्तपातालक्षिप्तमूलो रागमहीरुहः । भूमिभूतमनुत्पाट्य द्वेषमुन्मूल्यते कथम्' ॥ ५१६ ॥ ५१९. "राग महीरुह का मूल सप्त पाताल यावत् निक्षिप्त है, अतएव भूमिभूत रागोत्पाटन के बिना द्वेष का उन्मूलन कैसे सम्भव है ? द्वेषो नामैष दुर्धर्षो जितो येन विवेकिना । क्षणार्धेनैव रागस्य तेन नामापि नाशितम् ॥ ५२० ॥ ५२०. 'जिस विवेकी ने इस दुर्धर्ष द्वेष को विजित कर लिया, उसने क्षणार्ध में ही, राग का नाम मिटा दिया । वीक्ष्यैतद्दिव्यया दृष्ट्या रागिणां वाच्यमौषधम् । ईर्ष्या जेया ततो रागः स्वयमाशाः पलायते ॥ ५२१ ॥ ५२१. 'दिव्य दृष्टि पूर्वक देखकर इसे रागियों का औषध कहना चाहिए, ईर्ष्या विजय करो, उससे राग स्वयं दिशाओं में पलायित हो जाता है।' ५१६ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का ५१९ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह यह ११ वाँ श्लोक है। १३ वा श्लोक है। ५१७ (१) राज तरंगिणी सूक्ति संग्रह का ५२० (१) राज तरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह १२ वा श्लोक है। यह १४ वा श्लोक है। पाठभेद : पाठभेद : श्लोक संख्या ५१९ में 'नुनाट्य' का पाठभेद श्लोक संख्या ५२१ में 'वाच्य' का पाठभेद 'नुन्माद' मिलता है। 'शस्य' मिलता है।