राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ६०९ इति ध्यात्वाऽलिखद्वर्णान् खङ्खस्यांशुकपल्लवे । 'वध्योऽपि न हतो यत्त्वं स्मर्तव्यं तच्चवेत्यसौ' ॥ ५२२ ॥ ५२२. इस प्रकार ध्यान कर खंख के अंशुक पल्लव पर इन वर्णों को लिखा— 'वध्य भी, जो तुम नहीं वध हुए, यह स्मरण रखना।' जनैरलक्ष्यमाणेऽथ याते दुर्लभवर्धने । त्यक्तनिद्रः स मन्त्री तान् दृष्ट्वा वर्णानवाचयत् ॥ ५२३ ॥ ५२३. बिना किसी के देखे दुर्लभवर्धन के चले जानेपर जागृत उस मंत्री (खंख) उन वर्णों को देखकर पढ़ा। दाक्षिण्यात्प्राणदस्त्यास्य खङ्खः स मनसा तदा । विसस्मारानङ्गलेखां दध्यौ तु प्रत्युपक्रियाम् ॥ ५२४ ॥ ५२४. उस समय खंख अनंगलेखा को चित्त से विस्मृत कर दिया और दाक्षिण्य से प्राण प्रद उसके प्रति प्रत्युपकार भावना धारण किया। तस्योपकर्तुरचितं प्रतिकारमिच्छोः चिन्ताऽविशन्न तु मनः स्मरबाणपङ्क्तिः । दृग्गोचरे परिचयप्रणयं प्रपेदे निर्निद्रता न तु कदाचन राजपुत्री ॥ ५२५ ॥ ५२५. उस प्रत्युपकारेच्छुक के मन में उपकर्त्ता के योग्य प्रत्युपकार करने की चिन्ता प्रवेश की, न कि स्मरबाण पंक्ति। उसकी दृष्टि में अनिद्रता ने परिचय प्रणय प्राप्त किया, न कि कभ' उस राजपुत्री ने। धृत्वा सप्तत्रिंशतिमब्दान्स चतुर्भि- र्मासैर्वन्ध्यां मूर्धनि रत्नं नृपतीनाम् । तस्मिन्काले लोकमवापोज्ज्वलकृत्यो बालादित्यो बालशशाङ्काङ्कितमौलेः ॥ ५२६ ॥ ५२६. वह चार मास न्यून सैंतीस वर्ष राजाओं का शिरोरत्न होकर उज्ज्वल कृत्य शील बालादित्य, बाल शशांकांकित मौलि का लोक प्राप्त किया। श्लोक संख्या ५२२ में 'तान्' का 'तद्' पाठ एवं ज्ञानेन्द्रियो के बाण सूचक है। क्योंकि किसी भेद मिलता है। प्रकार का कर्म इन्हीं इन्द्रियों के द्वारा होता है। पादटिप्पणियाँ : काम भावना की जागृति में इन्द्रियां ही सहायक ५२५ (१) स्मर : काम के हाथों में पाच होती हैं। इन्हीं इन्द्रियों के माध्यम से काम आक्रमण पुष्प बाण होते हैं। समझता हूँ कि पांचो कर्म करता है। ७७