राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट 'क' नीलमत पुराण ( तरंग : १ : १४ : पृष्ठ-१० ) कश्मीर के पुरा कालीन इतिहास पर प्रकाश नीलमत पुराण द्वारा पड़ता है। कल्हण ने राजतरंगिणी को बहुत कुछ सामग्री नीलमत पुराण से प्राप्त की है। कल्हण ने स्वयं इसे स्वीकार किया है। नीलमत पुराण वास्तव में पुराणों की परिभाषा में पुराण है अथवा नहीं, उसका ऐतिहासिक महत्त्व है या नहीं ? उसकी गणना पुराणों में की जा सकती है या नहीं ? यह विद्वानों की चर्चा का विषय रहा है। कश्मीर में धार्मिक, ऐतिहासिक एवं काव्य ग्रन्थ लिखने की प्राचीन परम्परा रही है। 'योग वासिष्ठ' जैसा ग्रन्थ भी या तो कश्मीर में लिखा गया था अथवा उसका प्राप्य वर्तमान संस्करण कश्मीरी है। (योग वासिष्ठ कथा : भूमिका) एक मत है कि विष्णुधर्मोत्तर पुराण वैष्णव पुराण है। कश्मीर में लिखा गया था (स्मृति तत्त्व : जीवानन्द विद्यासागर : २ : ४६७-४६८)। नीलमत पुराण की रचना कश्मीर उपत्यका में हुई थी। यह निर्विवाद सिद्ध हो चुका है। यह पुराण नहीं उपपुराण है। स्थानीय किंवा लौकिक उपपुराण वर्ग में आता है। वायु पुराण (१ : १८१) में उल्लेख है : 'इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपवृंहयेत् ।' वेद और पुराण साथ स्थित थे। दोनों में निकट सम्बन्ध था। अथर्व वेद के व्रात्य सूक्त में इतिहास पुराण का चारों वेदों के साथ उल्लेख किया गया है। मत्स्य पुराण के अनुसार परम पितामह ब्रह्मा वेद और पुराण दोनों के स्रोत हैं। एक मत पुराण को वेद से प्राचीन मानता है। पुराणों को सरलतापूर्वक समझाने के लिए वेदों का अभ्युदय हुआ है। वेद केवल सृष्टि विद्या पर प्रकाश डालता है। पुराणों का क्षेत्र अधिक व्यापक है। उनकी आख्यान शैली वेदों के समान है। वे लगभग चार लाख श्लोकों में लिपिबद्ध हैं। वेद एवं पुराण दोनों पुराकालीन आख्यानों पर आधारित हैं। पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम् । नित्यं शब्दमयं पुण्यं शतकोटिप्रविस्तरम् ॥ अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिस्सृताः॥ —मत्स्य पुराण ३ : ३-४ पुराण वेद के प्राधिकार का आदर करता है। वैदिक सिद्धान्तों की व्याख्या करता है। उसे प्रमाण मानता है। 'सर्ववेदार्थसाराणि पुराणार्थः ।'—नारदीय १ : ९ : १०० वेदाः प्रतिष्ठिताः सर्वे पुराणे नात्र संशयः ॥—नारदीय २ : २४ : १७ ; स्कन्द, रेवा, ॥२२ पृ० यो न वेद पुराणं हि न स वेदार्थ किंचन ।—स्कन्द पुराण : रेवा खण्ड आत्मा पुराणं वेदानाम् ।—स्कन्द पुराण रेवाखण्ड ॥२२ ढ०