राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ राजतरंगिणी पुराणों के लिए निम्नलिखित पाँच लक्षणों का होना आवश्यक माना गया है। इन लक्षणों के आधार पर नीलमत पुराण को तौलना होगा। सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च। वंशानुचरितं चैव पुराणं पंच-लक्षणम्॥ —मार्कण्डेय पुराण १३५ : १३ पुराण में सृष्टि (सर्ग), प्रलय (प्रतिसर्ग), वंश, मन्वन्तरो तथा वंशानुचरित किंवा पुरातन चरित का वर्णन किया जाता है। कौटिल्य ने इतिहास वर्ग में इतिवृत्त तथा पुराण को माना है। (अर्थशास्त्र १:३) इतिवृत्त में ऐतिहासिक घटनायें अधिक रहती हैं। परन्तु पुराण में कथा, गाथा आदि का समावेश होता है। सामाजिक जीवन को एक ओर प्रवृत्त करने के लिए, सर्वसाधारण को अनुप्राणित तथा उन्हें सुपथ पर लाने के लिए पुराण ने अनादि काल से मार्ग दर्शन किया है। पुराण वर्णाश्रम धर्म, सदाचार, व्रत, उपवास, तिथि-कल्प, दान, तीर्थ, श्राद्ध, राजधर्म, देवार्चन पूजा, विनय तथा शील का अद्भुत कोष है। 'नीलमत' पुराण, नील के मत का वर्णन करता है। इसमें भागवत, वायु, गरुड़, ब्रह्म, मार्कण्डेय, स्कन्दादि पुराणों के समान विशाल ज्ञान-भण्डार, आख्यान तथा वस्तु सामग्री नहीं है। वह लघु ग्रन्थ है। उसका क्षेत्र व्यापक नहीं है। सीमित है। नीलमत पुराण को महापुराणों की श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा। उसका महत्त्व लौकिक है। प्रादेशिक है। निस्सन्देह उसमें अन्य विषयों का भी उल्लेख है। उसकी रचना शैली तथा वस्तु सामग्री उसे स्थानीय अथवा उपपुराणों के वर्ग में रखने के लिए प्रेरित करती है। नीलमत पुराणों की श्रेणी में स्थान प्राप्त कर सकता है। वंशचरित का वर्णन करता है। कल्हण ने उसमे ऐतिहासिक सामग्री ली है। शैली पुराणों जैसी प्राचीन है। उसमे संवाद प्रतिसंवाद रूप से घटनाओं तथा कथा वस्तु का वर्णन किया गया है। उसमें माहात्म्यो का वर्णन है। कपटेश्वर, आश्रम स्वामी, वितस्ता माहात्म्य का विस्तृत उल्लेख है। कुछ विद्वानो ने इसे माहात्म्य की श्रेणी में रखने का प्रयास किया है। परन्तु कल्हण स्वयं नीलमत को पुराण मानता है न कि माहात्म्य । (अ० १ : १७८-१८३) इस पुराण का शीर्षक महत्त्वपूर्ण है। 'मत' शब्द का प्रयोग किया गया है। नाम 'नीलमत' है। स्पष्ट करता है। पुराण नील मुनि के मत का संग्रह है। वायु, मार्कण्डेय, गरुड, ब्रह्म पुराण के समान इसे भी नील नाम से सम्बन्धित किया गया है। मैं सन् १९६१ ई० में कश्मीर के भद्रवा स्थान में गया था। जिस समय मैं गया था मार्ग दुरुह था। सड़कें बन रही थी। इस समय सड़कें बन गई है। यातायात सुगम हो गया है। बस तथा मोटर वहाँ पहुँच सकती है। भद्रवा में वासुकी नाग का एक मन्दिर है। मुझे मालूम हुआ कि वासुकी पुराण एक समय वहाँ प्रच- लित था। अधिक अनुसन्धान पर निष्कर्ष निकला कि वह वासुकी नाम का कोई पुराण नहीं है। इसी प्रकार एक रत्नाकर पुराण का उल्लेख मिला है। रत्नाकर पुराण का यदि कभी अस्तित्व रहा होगा तो वह भी कश्मीर में रचित उपपुराण ही था। भारतवर्ष में इस प्रकार के १०० या इससे अधिक पुराण एवं उपपुराण प्रचलित थे। अनेकों का उल्लेख मिलता है। अनेकों के नाम लोप हो गये है। कश्मीर उपत्यका से भद्रवा क्षेत्र कम सुन्दर नहीं है। जिस समय में वहाँ गया था शाली अर्थात् धान के खेत लहलहा रहे थे। कटाई निकट होने के कारण धान कुछ सूख चला था। हरियाली लोप हो रही थी। सुनहलापन आ गया था। मालूम होता था। सुनहले धान