भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 798

की बालियां खेतो में खड़ी है । किंचित् मरुत् स्पर्श से विस्तृत धान क्षेत्र में सुनहली लहरें लहर लेने लगती थी । आधुनिक यन्त्रमय जगत् तथा प्रतिदिन के राजनैतिक उथल-पुथल, सामाजिक वैषम्यों से दूर, हिमाद्रि की गोद में यह स्थान साधना तथा अध्यात्म चिन्तन के लिए अनुपम स्थान है । नीलमत पुराण का नाम—नीलमत, नीलमत पुराण, नील पुराण तथा कहीं-कही कश्मीर माहात्म्य के रूप में मिलता है । स्वर्गीय डा० भण्डारकर ने इस पुराण को 'कश्मीर माहात्म्य' की संज्ञा दी है । यह ठीक नही प्रतीत होता । कल्हण ने राज तरंगिणी में दो बार नीलमत, दो बार पुराण तथा एक बार नील पुराण नाम से नील- मत पुराण का उल्लेख किया है । [ रा० त० १:१४,१६,१७१,१७८,१८३२ ] नीलमत पुराण का ऐतिहासिक महत्त्व है। कुछ विद्वानो का मत है : 'नीलमत पुराण' सन् ६००- ७०० ई० के मध्य लिखा गया है। पुराणों का रचना-काल विवादास्पद है। पुराणों के रचना, संकलन, संस्क- रणों का निश्चय नहीं हो सका है। कुछ विद्वानों का मत है । वायु पुराण ई० पूर्व ५००, ब्रह्माण्ड पुराण ई० पूर्व ४००, विष्णुपुराण ७००-४०० ई० पूर्व, मत्स्य पुराण ३०० ई० पूर्व तथा भागवत पुराण का रचना काल सन् ३१० ई० है । नीलमत पुराण के रचना-काल के विषय में अनेक मत है । यह निर्विवाद है नीलमत की कथावस्तु अत्यन्त प्राचीन है। उसकी अनेक बातें पुराणों के विपरीत प्रतीत होती हैं। अनेक विषयों में उसका अपना मत है। अपनी मौलिकता है। सहस्रों वर्ष से कश्मीर में प्रचलित जनश्रुतियो, कथाओं, पर- म्पराओं, स्थानों, वंशावलियों का उल्लेख है। स्वीकार करना होगा । उसका रचना-काल चाहे प्राचीन न हो फिर भी उसमें पुरातन तथ्यों का समावेश है । कल्हण के उद्धरण से स्पष्ट हो जाता है। नीलमतपुराण प्राचीन ग्रन्थ था। उसका अस्तित्व बारहवीं शताब्दी के पूर्व था । आभ्यन्तर साक्ष्य से नीलमत की प्राचीनता सिद्ध होती है । क्षेमेन्द्र, जयरथ तथा कल्हण ने बुद्ध भगवान् के सम्बन्ध के जो विचार प्रकट किये हैं वे नीलमत से सर्वथा भिन्न हैं—नीलमत के भगवान् बुद्ध को महत्त्वपूर्ण स्थान पूजा, उपासना आदि के प्रसंग में दिया गया है। उसमें बुद्धका प्रादुर्भाव कहा गया है। अवतार शब्द का न होना नीलमत की प्राचीनता प्रमाणित करता है। बुद्ध को अवतार माननेका समय बहुत बाद का है। बुद्ध धर्म नीलमत पुराण में हिन्दू-धर्म का विरोधी मत किंवा धर्म रूप में चित्रित नही किया गया है। नीलमत उस समय की कृति है जब कश्मीर में बुद्धधर्म प्रचलित था। आदर की दृष्टि से देखा जाता था । हिन्दूधर्म में विस्तार से वर्णित कल्किअवतार, कृष्ण राधा, तुलसी आदि का अभाव नीलमत में खट- कता है। इस बात की ओर संकेत करता है ग्रन्थ उस समय की रचना है जब कल्कि अवतार, राधा, तथा तुलसी दल की कल्पना नहीं की गयी थी । हरचरित चिन्तामणि से भी नीलमत पुराण प्राचीन है । उसके समकालीन इसे रखना उचित नही है। हरचरित चिन्तामणि मे शिव को महत्त्वपूर्ण विशेष स्थान दिया गया है। इस बात का प्रमाण है । शैव दर्शन तथा सिद्धान्त का कश्मीर में पर्याप्त विकास हो चुका था। यह काल नीलमत का पूर्ववर्ती काल है। कल्हण का बौद्धों की तुलना यक्षों से करना साबित करता है । कश्मीर में बौद्धधर्म उसके समय प्रायः लोप हो चुका था। आदर खो चुका था। जब कि नीलमत में बुद्ध तथा बौद्धोंका आदर किया गया है। श्री लक्ष्मीधर ने कृत्य कल्पतरु ( नियत काल काण्ड ) जो बारहवी शताब्दी के पूर्व अर्धशती की रचना है, उसमें ब्रह्मपुराण के श्लोकों का उद्धरण दिया है। प्रायः वे ही श्लोक नीलमत पुराण में भी हैं। इस प्रकार के कम से कम साठ पद है। किन्तु प्रकाशित ब्रह्मपुराण में वे पंक्तियां नहीं मिलती । इससे