राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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प्रतीत होता है, कोई एक और ब्रह्मपुराण का संस्करण उस समय उपलब्ध था अथवा ब्रह्मपुराण नामका कोई एक और ग्रन्थ था । प्राप्त ब्रह्म पुराण का उल्लेख हेमाद्रि, शूलपाणी, वाचस्पति मिश्र आदि में मिलता है । तथा दूसरे ब्रह्मपुराण का उल्लेख लक्ष्मीधर, जीमूतवाहन, अपरार्क, हरदत्त, अनिरुद्ध भट्ट आदि में मिलता है । निस्सन्देह मानना पड़ेगा । ब्रह्मपुराण में कश्मीर का जो उद्धरण दिया गया है वह कश्मीरी लेखरों की ही रचना है। उसकी रचना कश्मीर में हुई थी । अधिक सम्भावना है। वह नीलमत पुराण से ली गयी है । नील- मत के संस्करण होते रहे हैं। नवी दशवी शताब्दी में कश्मीर के शैवदर्शन का नीलमत पुराण में समावेश करने का प्रयास किया गया है । नीलमत पुराण में विष्णुधर्मोत्तर पुराण के कुछ पद संशोधित किंवा परिवर्तित रूप में मिलते हैं। इस पुराण का काल चौथी से पाँचवीं शताब्दी का मध्यकाल माना गया है । नीलमत में वैष्णव, शैव तथा बौद्धधर्म एक साथ विकसित और रहते दिखायी देते हैं । कनिष्क के समय में बौद्धधर्म का प्राबल्य कश्मीर में हो गया था । अतएव नीलमत का अस्तित्व कश्मीर में चौथी से छठी शताब्दी के पूर्व होना निर्विवाद प्रतीत होता है । हुयेन्त्सांग (सातवी शताब्दी ) नील के मत का उल्लेख करता है । अतएव हुयेन- सांग के पूर्व नील मत पुराण का कश्मीर में अस्तित्व था ।
कल्हण ने राजतरंगिणी ( त. १६ ) वर्णित प्रथम चार राजाओं गोनन्द, दामोदर, यशोवती तथा गोनन्द द्वितीय तथा श्लोक सख्या १ : ५०-८२ नीलमत के श्लोकों से मिलाया जाय तो यह प्रमाणित होता है कि कल्हण ने उन्हें नीलमत से लिया है। कल्हण ने सुप्त राजाओं का उद्धरण, ज्येष्ठेश की कथा, सोदर तीर्थ वर्णन, पिशाच कथा, तोर्यों तथा सतीसर, नीलजा अर्थात् वितस्ता का वर्णन नील मत पुराण के आधार पर किया है ।
पुराणो के समय-समय पर अनेक लेखको तथा सम्पादकों द्वारा संस्करण होते रहे हैं । कोई भी कागज अथवा भोजपत्र पर लिखी गयी पुस्तक एक सहस्र किंवा दो सहस्रों वर्षों से अधिक काल तक स्थायी नही रह सकती । अतएव उनका पुनर्लेखन अथवा संस्करण समय-समय पर होता रहा है । संस्करण किंवा पुनर्लेखन करने वाले के लिये अपने समय की घटना अथवा अपने मतके प्रतिपादन हेतु कुछ न कुछ पुस्तकों में परिवर्धन, परिवर्तन किंवा संशोधन कर देना असंभव नही है। पाठान्तर हो जाना स्वाभाविक है । नीलमत पुराण के पाठ के विषय में भी यही बात कही जा सकती है ।
नीलमत पुराण का ऐतिहासिक महत्त्व निम्नलिखित कारणों से बढ़ जाता है : ( १ ) नीलमत पुराण तत्कालीन कश्मीर संस्कृति, तथा सभ्यता का जीता-जागता चित्र उपस्थित करता है । ( २ ) तत्कालीन धार्मिक कृत्यों, एवं संस्कारों आदि को प्रभावित किया है । ( ३ ) कश्मीर के स्थानो, सरोवरों, जलप्रपातो, संगमों, मन्दिरो, देव स्थानों तथा तीर्थों का तथ्य पूर्ण सच्चा भौगोलिक वर्णन, इन स्थानों से सम्बन्धित प्राचीन तथा तत्कालीन गाथाओ का उल्लेख सत्यता के साथ करता है । जिस प्रकार जरूसलम का वास्तविक भूगोल स्वयं बाइबिल है, उसी प्रकार कश्मीर का भूगोल स्वयं नीलमत पुराण है । ( ४ ) कश्मीर की जनता का चरित्र चित्रण करता है । ( ५ ) अनेक लुप्त राजाओं के चरित्र तथा उनके वंशो का उल्लेख करता है । ( ६ ) अनेक जातियो, गोत्रों, उनके कश्मीर में आने, निवास करने, तथा उनके पारस्परिक आन्त- रिक एवं बाह्य संबंधों तथा जीवन पर प्रकाश डालता है ।