राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट क ५ ( ७ ) कश्मीर के भौगोलिक चित्रण के साथ-साथ भूगर्भीय तथ्य का उल्लेख करता है। वे आधुनिक अनुसन्धानों से सत्य प्रमाणित हुए हैं। ( ८ ) कश्मीर की जनता के लिए एक आचार संहिता उपस्थित करता है। ( ९ ) प्राचीन सनातन धर्म को संक्षिप्त रूप से कश्मीरी जनता के सम्मुख रखता है। नीलमत पुराण में अन्य पुराणों के श्लोकों का किंचित् रूपान्तर के साथ उल्लेख मिलता है। नील- मत पुराण के रचनाकार को पुराणों, तत्कालीन प्रचलित ग्रन्थो तथा शास्त्रों का ज्ञान था। पुराणो के कुछ श्लोकों का नीलमत पुराण में उल्लेख मिलता है। (ब्रह्म० ४३४, १, २, २९) विष्णुधर्मोत्तर पुराण के विषय में मत हैं कि लगभग ४४०-५५० ईस्वी मे लिखा गया था। इस पुराण के श्लोक नीलमत पुराण में मिलते हैं। अनेक स्थानों, घटनाओ तथा प्रसंगो का उल्लेख नीलमत तथा इस पुराण में एक जैसे लगते हैं। राजा मिहिरकुल के लगभग १०० वर्ष पश्चात् तक कश्मीर मे अन्तर्द्रोह चलता रहा है। आन्तरिक द्वेषो के कारण राजा लोग पीड़ित थे। कश्मीर का कोई विकास नही हो सका था। यही काल नीलमत पुराण के प्रस्तुत संस्करण का हो सकता है। नीलमत पुराण का किसी दूसरे रूप में पूरा काल में अस्तित्व होना सम्भव है। किन्तु वर्तमान नीलमत पुराण संस्करण का यहाँ काल है। नीलमत में उल्लेख आया है। नीलमत इस ओर संकेत करता है---स्वभेदेनेह नश्यन्ति बद्धमूला नराधिपा. ( नी० 835 ) कश्मीर भूमण्डल की किस प्रकार रचना हुई ? उसकी वर्तमान भौगोलिक स्थिति का क्या कारण है ? इन प्रश्नों का उत्तर नीलमत पुराण देता है। गाथा रूप में यह सब बातें नीलमत पुराण में कही गयी है। कश्मीर के तीर्थों, देव स्थानों तथा देश की रचना आदि का विषय नीलमत पुराण के लगभग दो-तिहाई भागो में वर्णित है ( रा० १. १४. ) कल्हण ने राजतरंगिणी मे नीलमत के आधार पर सतीसर तथा जलोद्भव की गाथा का वर्णन किया है। (रा० १: २५-२८) यही गाथा किंचित् परिवर्तित रूपमें महावश, सर्वास्तिवादी, चीनी विनय सम्प्रदाय तथा हुयेन सांग ने दी है। आधुनिक भूगर्भीय अनुसन्धानो से प्रमाणित हो गया है। नीलमत वर्णित गाथा तथ्यपूर्ण है। वह केवल कपोलकल्पना नहीं है। नीलमत कश्मीर का भूगोल है। विश्वभूगोल का अन्य पुराणो के समान नीलमत वर्णन करता है। सप्त द्वीप, नव वर्ष, सात कुल पर्वत, आदि का उसमें उल्लेख है। उसमें तीर्थों का भो उल्लेख है। कश्मीर के पवित्र देव स्थानों, तीर्थ स्थानो का वर्णन नीलमत में यथायत् मिलेगा। उसमें नाग, शिव देवस्थान, विष्णु देवस्थान, तीर्थ, वितस्ता के उद्गम स्थान से वारहमूला तक के तीर्थों, देवस्थानो, उसकी सहायक नदियों का उल्लेख है। और कश्मीर के नामकरण पर भी नीलमत प्रकाश डालता है। नदियों तथा उनके स्थलों का विस्तृत उल्लेख करता है। कश्मीर बाहर भारतवर्ष के तीर्थों तथा देवस्थानों का उल्लेख करता है। उससे प्रतीत होता है। कश्मीर के भूगोल के साथ भारत के भूगाल का भी ज्ञान नीलमत रचनाकार को था। नीलमत में प्राचीन जातियों का वर्णन मिलता है। उनमें मुख्य नाग, पिशाच, दार्व, अभिसार, गान्धार, जुहुन्द्रा, शक, खस, तंगण, माण्डव, मद्र, अन्तर्गिरि तथा बहिर्गिरि का उल्लेख है। नाग तथ पिशाच जातियाँ कश्मीर में निवास करती थी। शेष जातियाँ कश्मीर की सीमावर्ती है। यवन शब्द का नाम के लिये उल्लेख किया गया है।