राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ राजतरंगिणी काश्मीर के तत्कालीन सामाजिक तथा आर्थिक संगठन एवं व्यवस्था पर नीलमत प्रकाश डालता है। वर्ण तथा आश्रम की उत्पत्ति तथा दर्शन पर नीलमत विचार नहीं करता । किन्तु उनकी मुख्य प्रक्रियाओं तथा अंगों पर प्रकाश डालता है। चारों वर्णों के कर्त्तव्य का वर्णन करता है (नील० १४-१६ श्लोक) कर्मकाण्ड, वेदाध्ययन, पुराण पाठ आदि, दान-दक्षिणा, राजनीति, तथा ब्राह्मणों के सम्बन्ध में समाज की साधारण स्थिति क्या थी प्रकाश डालता है। क्षत्रियों को समाज में क्या स्थिति थी क्या कर्त्तव्य था, ब्राह्मणों से क्या सम्बन्ध था आदि का वर्णन नीलमत में मिलता है। वैश्य तथा शूद्रों के कर्त्तव्य पर प्रकाश डालता है। शूद्रों की निम्नस्थिति उस समय नहीं थी। जैसी आज है और समझी जाती है। ये राजाओं के अभिषेक में भाग लेते थे। ये अस्पृश्य किंवा समाज में निम्नस्तरीय वर्ग नहीं थे। नीलमत में विभिन्न जातियों का उल्लेख यथा औरभ्रुष, मल्ल, नट, एवं नर्तक, है। वर्णसंकर का उल्लेख नहीं मिलता । सूत, मागध, वन्दी का उल्लेख मिलता है । चारों आश्रमों के धर्म एवं कर्त्तव्यो के विषय पर नीलमत प्रकाश नहीं डालता । ब्रह्मचारी शब्द का प्रयोग किया गया है। परन्तु उसका सम्बन्ध आचार से अधिक है, न कि विद्यार्थी जीवन से। नीलमत में बाल विवाह प्रथा का उल्लेख नहीं है। संन्यास तथा वानप्रस्थ आश्रमों का उल्लेख है। नीलमत गृहस्थाश्रम तथा तत्सम्बन्धी विधियों का विशेष वर्णन करता है। तत्कालीन महिलाओं की स्थिति तथा समाज में इनका क्या स्थान था नीलमत वर्णन करता है। वह ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। कश्मीर की स्त्रियाँ परदा नहीं करती थीं। विरक्तों के मतानुसार नरक का साधन नहीं थी। मनुष्यों के पतन का कारण नहीं थी। ये पुरुषों के समान समाज के सभी कार्यों में समान भाग लेती थीं। वे घरों में बन्द नहीं थी। उनका स्थान, पर्वों, उत्सवों, धार्मिक कृत्यों में पुरुष के समान था। वे कौमुदी उत्सव में भाग लेती थी। वे सुयोग्य गृहिणी रूप में चित्रित की गयी हैं। वह खेतों के जोतने के उत्सव में गाती थी, नाचती थी, बाजा बजाती थी, इरामंजरी पूजा में वह वृक्ष देवता के पास पूजन हेतु जाती थी। कश्मीर में प्रचुर मात्रा में सर्वत्र जल है। नाग, सरोवर, तड़ाग, हृद एवं सरिताओं के तट पर सर्वदा कोई न कोई उत्सव होता रहता था। नर नारी जल क्रीड़ा साथ करते थे। नीलमत आदेश देता है। कुमारी विशेषतः इन जल उत्सवों में अवश्य भाग लें। यह उत्सव श्रावणी के दिन होता था। महिलायें सुसज्जित होती थी। पुरुषों के साथ क्रीडा करती थी। इस उत्सव का नाम महिमान था । विभिन्न वर्ग की स्त्रियों की पूजा के लिये विभिन्न दिन निश्चित थे। माघ शुक्ल चतुर्थी, आश्वयुज, ज्येष्ठ की चौथ, मार्गशीर्ष पूर्णमासी को महिलाओ की विभिन्न रूपों एवं प्रकारों से पूजा की जाती थी । मदन त्रयोदशी के दिन पत्नी पति से पवित्र जल प्राप्तकर स्नान करती थी। दीप मालिका के दिन शय्या गृह सजाया जाता था। महिलायें अकेले भी चन्द्रोदेव की पूजा करती थी। नीलमत में देवताओं के साथ ही साथ उनकी देवियों का नाम है। उनकी पूजा का भी विधान किया गया है। कश्मीर की नदियां विभिन्न देवियों के रूप हैं। उनके पूजा का विधान तथा समय निश्चित किया गया है। अन्य पुराणों में महिलाओं को वह स्थान नहीं दिया गया है, जो नीलमत पुराण में प्राप्त होता है। नीलमत देवदासी प्रथा को मानता है। परन्तु उनका काम मन्दिरों में नृत्य एवं गान करना भी भगवान की सेवा करना था। वह काम की साधन नहीं मानी जाती थी। अतिथियों की सेवा तथा उनके सुख के लिये कार्य करना पुण्य कर्म माना जाता था । कश्मीर की आर्थिक समृद्धि केवल कृषि पर ही निर्भर नहीं थी। कश्मीर का व्यापार, तिब्बत, तुर्किस्तान, मध्यएशिया, अफगानिस्तान तथा पंजाब से था । कुशान राजाओं के काल में यह व्यापार बहुत