राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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-वृद्धि कर गया था। हूण आक्रमणों के पश्चात् कश्मीर का बहिर्व्यापार मार्ग प्रायः बन्द हो गया। और आर्थिक ढाँचा का आधार केवल कृषि तथा पंजाब और तिब्बत से व्यापार रह गया था। नीलमत के अनुसार व्यापारी तथा व्यवसायी गणों का समाज में समादर होता था। नीलमत पुराण कश्मीर के सामाजिक जीवन के उल्लासमय, आह्लादमय, आनन्दमय जीवन का चित्रण करता है। प्रकृति की गोद में काश्मीरी पर्वों, उत्सवों की श्रृंखलाओं में प्रसन्नता पूर्ण जीवन, खेल- कूद, पठन पाठन, आदि में व्यतीत करते थे। उनका समाज प्रगतिशील था। नीलमत सभी उत्सवों की पीठिका में धर्म को स्थित रखता है। संगीत का सम्बन्ध गन्धर्वों से जोड़ा गया है। प्रत्येक पर्व एवं उत्सवों पर संगीत का कार्यक्रम होता था। शास्त्रीय संगीत प्रचलित था। पेशेवर गायक, सूत, मागध, वन्दी एवं चारण थे। वाद्य, वादिन एवं वाद्य भाण्ड प्रचलित था। घन, वितत, तत, शुषिर, तन्तु तथा चर्म वाद्य उस समय भारत में प्रचलित थे। नीलमत आनद्धवाद्य तथा तन्त्रि- वाद्य का उल्लेख करता है। इसके अतिरिक्त वेणु, शंख, घण्टा का भी उल्लेख मिलता है। वीणा का नीलमत पुराण तीन बार उल्लेख करता है। कश्मीर का सत्तूर वीणा का ही विकसित रूप है। वेणु का उल्लेख केवल एक बार नीलमत में भगवान् विष्णु के जगाने के सम्बन्ध में किया गया है। शंख का उल्लेख दो बार किया गया है। पटह का उल्लेख नीलमत में दो बार वीणा के प्रसंग में किया गया है। पटह नगाड़ा या दुग्गी की तरह बाजा है। इसका प्रचलन आज भी कश्मीर में है। नृत्य संगीत के साथ होता था। नीलमत नृत्य के प्रकार का वर्णन नहीं करता परन्तु नृत्य धार्मिक उत्सवों, सामाजिक गोष्ठियों, ऋतुओं के आगमन, कृषि उत्सवों, फलों के पकने के समय होता था। हरवान के पुरातत्त्व खनन कार्य में एक टाइल मिला है। उसपर खरोष्ट्री लिपि अंकित है। मध्यवर्ती मूर्ति झांझ बजा रही है। वामवर्ती बंशी बजा रही है। और दक्षिणवर्ती एक जोड़ा नगाटा अर्थात् दुक्कड़ बजा रहा है। एक में नृत्यशील स्त्री चित्रित की गयी है। एक महिला ढोल बजा रही है। कोटिसर मन्दिर से भी महिला नर्तकी की मूर्ति मिली है। धार्मिक कृत्यों के साथ नृत्य खूब प्रचलित था। कश्मीर के नृत्यों ने सीमावर्ती देशों तथा अंचलों की नृत्य कला को प्रभावित किया था। सावित्री विसर्जन पर्व आज भी काश्मीरी महिलायें मानती हैं। किसी नदी के तट पर सात बार मूर्धा पर हाथ रख कर जाती और आती हैं। वह प्राचीन नृत्य का प्रती- कात्मक रूप रह गया है। वसन्त आगमन काल में इरा पुष्प की मालाओं से विभूषित काश्मीरी महिलायें नृत्य एवं गान करती थीं। अशोकाष्टमी पर्व पर भी नृत्य तथा गान होता था। खेलों का काश्मीरी जीवन में बहुत महत्त्व था। श्रावणी पर्व पर कुमारियाँ जल क्रीडा करती थीं। नीलमत में मल्ल विद्या अर्थात् कुष्टतोप्रियता का उल्लेख मिलता है। दीपावली पर जूआ खेलने की परिपाटी प्रचलित थी। शिकार खेलने की प्रथा थी। हरवान के टाइल्स पर शिकारी बाण चलाता दिखाया गया है। इसे नीलमत धनुर्घोष शब्द से व्यक्त करता है। नीलमत में स्कन्द पूजा के दिन खिलौना तथा पक्षियों के पैर में सूत बाँधकर उड़ाना प्रचलित था। नीलमत में भवन, गृह, आलय, वेश्म, आयतन, अट्टालक आदि शब्द विभिन्न शैलियों के मकानों के लिये प्रयुक्त हुए हैं। श्रमणों के निवास स्थान को शाक्यवास तथा पूजा स्थान को चैत्य कहा जाता था। हिन्दू मन्दिरों के बहुत नाम मिलते हैं। परन्तु उनकी रचना शैली पर नीलमत प्रकाश नहीं डालता। हरवान के भग्नावशेष देखने से पता चलता है। मण्डप तथा गर्भ गृह मन्दिरों में होता था। मकानों पर सफेदी की जाती थी। वे पुष्प, माला, फल, पत्तों तथा शाली से सजाये जाते थे। सडकों तथा चतुष्पथ का उल्लेख मिलता है।