भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 804, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 804

परिशिष्ट क ९ पुराण शिव को त्रिमूर्ति में एक मानता है। उमा को वह शिव से भी अधिक महत्त्व देता है। वितस्ता का रूप उमा कश्मीर में धारण करती है। दुर्गा तथा शारदा की पूजा का भी विशेष महत्त्व था। शिवमत के साथ गणेश, स्कन्द, शाख, विशाख, नैगमेश, की पूजा का भी विधान किया गया है। विष्णु तथा शिव मत केअतिरिक्त ब्रह्मा, वरुण, अग्नि, रैवत, यम, इन्द्र, सूर्य, चन्द्रमा, कुबेर, बलदेव, चन्दो देव, आदित्य, वसु, साध्य, विश्व देव, एवं मरुत की उपासना तथा पूजा देवता स्वरूप मान कर की गई है। लक्ष्मी, उमा के अतिरिक्त सरिता देवियाँ यथा वितस्ता, विशोका, त्रिकोटि, हर्षपथा, तथा चन्द्रा- वती क्रमशः उमा, लक्ष्मी, अदिति, शची, एवं दिति की रूप मानी गयी है। नीलमत बुद्ध को विष्णु का अवतार मानता है। वैशाख मास में बुद्ध जन्मोत्सव मनाने का विधान करता है। बुद्ध जन्म के समय चैत्य तथा शाक्यों के स्थानो को चूना पोत कर सफाई कराकर दीवालों को चित्रकारी से सजाना चाहिए। गरीबों को दान, तथा भोज्य पदार्थों को चढाना चाहिये। उस दिन बुद्धप्रतिमा को पवित्र सुगन्धित जल से स्नान कराना चाहिए। अन्य पुराणों तथा नीलमत पुराण के बुद्ध आदि में अन्तर है। अन्य पुराण बुद्ध को अवतार मानकर भी उनके मत से लोगो को विरत होने के लिये प्रेरित करते हैं। परन्तु नीलमत उनके मत का आदर कर उनकी उपासना की विधि प्रस्तुत करता है। कश्मीर में भी कल्हण के काल तक विचारो में अन्तर पड़ गया था। क्षेमेन्द्र, वरदराज, कल्हण एवं जयरथ के लेखों में बौद्ध धर्म को हिन्दू धर्म के विरोधो रूप में चित्रित किया गया है। नाग पूजा का विशेष स्थान कश्मीर के प्रारम्भिक काल में है। मिश्र, यूनान, रोम, चीन, जापान, फोनोशियन तथा अरबों में इस पूजा का विधान मिलता है। नीलमत शिव को व्याल यज्ञोपवीती कहा है। वैष्णव मत ने भी नाग को भगवान् विष्णु की शय्या बनाकर स्वीकार किया है। विष्णु पुराण में विष्णु को नाग का स्वामी कहा गया है। नीलमत में नाग देवता का अधिकार वर्षा, तूफान, तुषारपात पर था। वे नाग, सरोवर तथा तड़ागों में निवास करते हैं। उनकी पूजा का विधान विस्तृत रूप से नीलमत पुराण देता है। नीलमत पुराण तत्कालीन कश्मीर के व्रत, उत्सव आदि का विस्तृत वर्णन करता है। उनमें अश्व- युज, कौमुदी, सुखसुप्तिका, देवोत्थान, नव संवत्सर महोत्सव, सप्तमी, मार्गशीर्ष पूर्णमासी, नव हिमप्रतोत्सव, अष्टमी त्रय, पौष पूर्णमासो, उत्तरायण, तिल द्वादशी, तारा रात्रि, श्रावण अमाबस्या, चतुर्थ्यः, माघ पूर्णिमा, महिमान, श्रावण द्वादशी; चित्ररात्रि, द्वितीय महिमान, फाल्गुनी, राजगीरस्नापन, कुष्पारम्भ, चन्दो देव पूजा, पिशाच चतुर्दशी, चैत्रामा, नव संवत्सर, श्री पंचमी, चैत्र षष्ठी, चैत्र नवमी, वास्तु पूजा, चैत्र द्वादशी, मदन त्रयोदशी, पिशाच प्रयाण, इरामंजरी पूजा, अक्षय तृतीया, बुद्ध जन्म, वैशाख पूर्णिमा, यवाग्रायण, विनायकाक्ष तपः, स्वाति योग, प्रस्वापन, वैश्वदेव पूजा, दक्षिणायन, रोहिणी संयोग, श्रावणी, कृष्ण जन्म, मघामावसी, भाद्रपद शुक्लकृत्य, षाढ पक्ष, महानवमी, अगस्त्य दर्शन, नवान्नविधान, वरुण पंचमी, अशोकिष्काष्टमी, वितस्तोत्सव, चतुर्थ्यत्रितयं, अश्वदीक्षा, हस्तिदीक्षा, भद्रकाली पूजन, गृहदेव पूजा, श्यामा देवी पूजा यात्रो- त्सव हैं। नीलमत में दर्शन का प्रसंगवश वर्णन मिलता है। उसमें सर्ग, त्रिभुवन, सूर्य्य, चन्द्र, नक्षत्र, ग्रह, ऋतु, पंच तत्त्व, महाभूत, प्रकृति, अनेक देवता वाद, एकेश्वर बाद, नरपशु रूप देव, आत्मवाद, विश्वदेवैवय वाद, अद्वैत वाद, पूर्वजन्म, कर्मकाण्ड, भक्ति सम्प्रदाय, आचार, शैव पांचरात्र आदि पर प्रकाश पड़ता है। नीलमत के १३९६ छन्दों में १३५७ अनुष्टुप् छन्द है। २