राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 805, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ें८ राजतरंगिणी वितस्ता माहात्म्य में सेतु अर्थात् पुल का उल्लेख आता है। परन्तु पुल की शैली तथा प्रकार पर कोई प्रकाश नहीं पड़ता । नीलमत प्रतिमा बनाने का उल्लेख करता है। मूर्तियाँ पाषाण, मृण, स्वर्ण, रजत, ताम्र, कांस्य, दारु, बालुका, ग्रास तथा घृत की बनायी जाती थीं। विष्णु की शयन मूर्ति का उल्लेख मिलता है। विष्णु की चतु- रानन मूर्ति तथा आयुध पुरुष का वर्णन मिलता है। चित्रकला का प्रचार था। बुद्ध जन्म के दिन चैत्य सुन्दर चित्रकारियों से सजाये जाते थे। चित्र वस्त्र, भूमि तथा भित्ति पर बनाये जाते थे। भूमिशोभा अर्थात् भूमि पर चित्र बनाना खूब प्रचलित था। नीलमत में परिधान का उल्लेख - वस्त्र, अम्बर, वासा, वसन, संवित, चीनांशुक, कम्बल तथा प्रावरण रूप में मिलता है। चीनांशुक चीन से आयात किया रेशमी वस्त्र था। प्रावरण का महाभारत में भी उल्लेख मिलता है। पाणिनि तथा कौटिल्य को भी इसका ज्ञान था। कौटिल्य इसे प्रावरक कहता है। नये वस्त्र के लिये 'अहत' शब्द का प्रयोग किया गया है। श्रमणों के चीवर तथा बिस्तर के चादर का भी वर्णन नीलमत करता है। उद्वर्तन, उत्सादन तथा अनुलेपन का श्रृंगार के प्रसंग में वर्णन किया गया है। भोजन में सभी प्रकार के खाद्य पदार्थों का वर्णन मिलता है। शाक में सभी सब्जियों तथा शस्य में सभी अन्न पदार्थों का समावेश हो जाता है। मांस भोजन का भी उल्लेख मिलता है। विष्णु के पाँच दिन पूजा के अवसर पर मांस भोजन निषेध किया गया है। एक स्थान पर विष्णु पूजा के प्रसंग में बलि का उल्लेख किया गया है। पिशाच, चण्डोदेव तथा भद्र काली को आमिष प्रसाद चढ़ाया जाता था। सुरापान तथा असुरापान दोनों का उल्लेख मिलता है। राज्य की सात प्रकृति मानी गयी हैं। नीलमत में स्वामी तथा राष्ट्र को प्रकृति पर ही प्रकाश डाला गया है। राजा के दैवी सिद्धान्त को नीलमत मानता है। उसे धर्म तथा राजशास्त्र के अनुसार व्यवहार करने का आदेश देता है। नीलमत मन्त्रियों का उल्लेख करता है। परन्तु उनके कर्त्तव्याकर्त्तव्य पर प्रकाश नहीं डालता। नीलमतपुराण सेना तथा युद्ध के प्रकार तथा संघटन पर प्रकाश डालता है। चतुरंग बल में, पदा- तिक, अश्वारोही, गज तथा रथ सेना थी। युद्ध नियम के सम्बन्ध में नीलमत विस्तृत वर्णन उपस्थित करता है। बालक राजा युद्ध में भाग नहीं ले सकता था। युद्ध क्षेत्र में भयभीत तथा भागते हुए शत्रु पर प्रहार वर्जित था। पराजित राजा के राज्य का अपहरण नहीं किया जाता था। उसके उत्तराधिकारी को राज्य वापस कर दिया जाता था। सन्तानहीन गर्भवती रानी अपने पति के सिंहासन को ले सकती थी। कश्मीर में राजतन्त्र था तथापि उसमें लोक तन्त्र का अंश दिखायी देता है। राजाविहीन नगर के यात्रोत्सव में प्रधान सब संस्कार तथा राजोचित कार्यों को करता था। राजा के वार्षिक अभिषेक के समय गणमुख्य, पौरमुख्य का उल्लेख आता है। गणमुख्य गणराज्य के मुखिया थे। नीलमत पुराण कश्मीर के धार्मिक सम्प्रदाय तथा मतों का उल्लेख करता है। यह मत-मतान्तर वैदिक देवताओं को केन्द्र मानकर चलते थे। बौद्ध भी भिन्न धर्म के स्थान पर एक सम्प्रदाय माना जाता था। मुख्य सम्प्रदाय, विष्णु, तथा उसके अवतारों को लेकर चला था। नील मत में मत्स्य, कूर्म, हंस, अश्वशिर अर्थात् हयग्रीव, नरसिंह, वामन, राम, कृष्ण का वर्णन मिलता है। राम नवमी पर ब्राह्मण तथा बुद्ध जन्म पर दास्यों को पूजा का विधान है किन्तु कृष्ण जन्म तथा तत्सम्बन्धी उत्सव का उल्लेख नीलमत में नहीं है। प्रतीत होता है कि कृष्ण को अवतार प्रारम्भ में नहीं माना गया था। दूसरा सम्प्रदाय शैव था। नीलमत