भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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परिशिष्ट ख हिमालय ( तरंग १ : २५ पृष्ठ २४ ) वैदिक साहित्य में हिमालय का वर्णन मिलता है । ऋग्वेद—१०:१२१:४, अथर्ववेद—३:१५:३, ४.९.९, ५.५.२-८, ५:२५.७, ६:२४:१, १२.१.१, १६:३९:१, २४:३०, २५:१२, ऐतरेय ब्राह्मण ८ १४: । तैत्तिरीय संहिता ५.५ ११.१ प्रायः सभी पुराणों में हिमालय का वर्णन प्राप्य है । मुख्यतः निम्नलिखित स्थल द्रष्टव्य हैं : भागवत पुराण १:१३:२९; १:१३.५०; मत्स्य पुराण १८० . कूर्म पुराण; पूर्वभाग अध्याय १२; कालिका पुराण १४ तथा ५१; वाल्मीकि रामायण : किष्किन्धा काण्ड · ५३ तथा ५६ श्लोक १ । नीलमत पुराण में हिमालय, हिमाचल, हिमवान, हिमवन्त तथा हिमकूट शब्दों का उल्लेख कभी कभी समानार्थक और कभी भिन्न अर्थों में किया गया है । उनको यहाँ उद्धृत कर देना उचित होगा । हिमालय : कुरुष्व लांगलेन त्वं विदार्याय हिमालयम् । इदं सरोवरं दिव्य निष्तोयं शीघ्रमेव तु ।। 165-166 = २१८ । × × × इति तथ्यं सती ज्ञात्वा हलमार्गात्तु सिन्धुगा । हिमालयान्न प्रययौ पतितात्मा परं नदी ।। 299 = ३९८ समुद्ररूपस्य हरस्य भार्या हिमालयस्याद्रिपतेस्तनूजाम् । सुस्वादुतोयां ऋषिभैर्यजुष्टां तां त्वं पवित्रां प्रणमस्व राजन् ।। 1388 = १६०६ । × × × हिमाचल : नीलाम्बरः कांचनबद्धमौलिः सम्पूज्यमानस्त्रिदशैः समस्तैः । विदारयामास स लाङ्गलेन हिमाचलं शैलवरं पृथिव्याम् ।। 168 = २२० × × × —कुटिलैस्तरंगैः । हिमाचलाग्रैर्गगने स्पृशद्भिः हिमालये तु षण्मासान् स सदा वसते सुखी । अद्य प्रभृति षण्मासान्तस्येह वसतिर्मया ।। 210 = २८३ × × ×