राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट क १३ गये। उनसे सम्बन्धित गाथाओं का लोप हो गया । इनके स्थान पर नए धर्म के इतिहास, गाथा तथा कथा- नकों का प्रचलन हो गया। खण्डित मूर्तियों, मन्दिरों, देवस्थानो, तीर्थों के उपेक्षित ध्वंसावशेषो, उनके पत्थरों तथा ईंटों का महत्व उनके इतिहास के इतिवृत्त के साथ खण्डहरों के ईंट पत्थरों से अधिक नहीं रह गया। इन्हें नवीन धर्म ग्रहण करने वाली जनता अपने नवीन जियारतों, मजारो, मस्जिदों तथा मकानों में लगाने लगी। सिख तथा डोंगरा काल में पुराने तीर्थों, देवस्थानों आदि को पुनः जानने की इच्छा हुई । इस दिशा में आधुनिक विद्वानों तथा अन्वेषकों ने स्तुत्य प्रयास किया है । प्राचीन पुस्तकें पढ़ी जाने लगी। उनके आधार.पर तीर्थों तथा.देवस्थानों की खोज होने लगी। ध्वंसावशेषों, खण्डित मूर्तियों, मन्दिरो के खण्डहरो को अन्वेषक विद्वान् खोजने लगे। इस विषय पर साहित्य का निर्माण होने लगा । लोकतन्त्र की स्थापना के पश्चात् तथा उसके पूर्व उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम चरण में खनन कार्य तथा वैज्ञानिक ढंग पर अध्ययन आरम्भ हुआ। इस समय केन्द्रीय तथा राज्य सरकार दोनों द्वारा संचालित पुरातत्व विभाग कार्य कर रहा है। कश्मीर के इतिहास पर नवीन प्रकाश पड़ा है। उनका यथास्थान वर्णन किया गया है। नीलनाग के जल स्रोत अर्थात् (वीर नाग) के भौगोलिक चित्रण से आरम्भ होकर बारहमुला की गहरी घाटी में नीलमत पुराण का आख्यान समाप्त होता है । नीलमत पुराण पर डाक्टर वेद कुमारी द्वारा काशी विश्व विद्यालय की थीसिस नीलमत पुराण द्रष्टव्य है । उसमें आलोचना के साथ अंग्रेजी में अनुवाद भी दिया गया है । अनुवाद के अतिरिक्त थीसिस का शेष भाग पुस्तकाकार रूप में जम्मू तथा कश्मीर एकेडमी आफ आर्ट कलचर एण्ड लैग्वेज श्रीनगर जम्मूसे सन् १९६८ में प्रकाशित हो चुका है ।