राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ राजतरंगिणी भारतवर्ष के निम्न लिखित तीर्थों का उल्लेख नीलमत में प्राप्य है : गंगा द्वार, कुशावर्त, वृद्धजाह्न, नील पर्वत (कनखल), नैमिसार, हयशिरप, प्रयाग, वाराणसी, गंगा सागर संगम, नदी वरुणा, असी, ब्राह्मणी, वैतरणी, महानदी, तमसा, शोण, सरयू, इक्षुमती, शतकुम्भा, वेद- स्मृति, केदार, बदर, भृगुतुंग, यह सब तीर्थ पूर्व, पूर्व दक्षिण, तथा उत्तर पूर्व वर्तमान कनखल के हैं । पंच- नद, कुरुक्षेत्र, पृथूदक, प्रभास, पुष्कर, रैवत, सिन्धु सागर संगम, कनकाबल के पश्चिम दिशा में स्थित हैं । क्षिप्रा, शाकम्भरी, विशाला, गोकर्ण, अगस्त्याश्रम, सुवर्ण, नर्मदा, रुद्रकोटि, सुमन्धा, गोदावरी, ताम्र- वर्णी, उत्पलावती, तथा कावेरी कनखल के दक्षिण स्थित है । शिवकी वाराणसी से हरमुकुट की यात्रा के प्रसंग में नीलमत पुराण मे, प्रयाग, अयोध्या नैमिष, गंगाद्वार, स्थानेश्वर, कुरुक्षेत्र, शतद्रु, विपाशा, तथा इरावती का उल्लेख मिलता है । कपटेश्वर माहात्म्य के सम्बन्ध में कुछ सामग्री नीलमतपुराण से प्राप्त होती है । कपटेश्वर वर्तमान कोठर ग्राम है । शिव तथा शैवमत से सम्बन्धित तीर्थों के पश्चात् विष्णु भगवान् से सम्बन्धित तीर्थों तथा देव-स्थानों का वर्णन मिलता है । काश्मीर में शिव माहात्म्य तथा शिव एवं पार्वती के संदर्भ में जितनी अधिक सामग्री, साहित्य तथा लेख मिलते हैं, उसकी अपेक्षा भगवान् विष्णु के विषय में स्वल्प साहित्य, सामग्री तथा लेख प्राप्य हैं । नीलमत पुराण के प्राप्य संस्करण के अनुसार प्रकट होता है । उसके रचना अथवा संस्करण के समय कश्मीर में शैव मत तथा शिव पूजा का विशेष प्रचार था । शिव तथा पार्वती सम्बन्धी अनेक व्रत, उपवास, उपासना तथा पूजा का प्रकार कश्मीर में प्रचलित था । विष्णु पूजा का महत्व जनता में शिव के पश्चात् था । प्रारम्भ से ही शिव भक्ति तथा उपासना कश्मीर में अधिक लोकप्रिय भी है । इससे प्रकट होता है । शिव उपासना तथा तत्सम्बन्धी गाथाओं का प्रमुख स्थान कश्मीरी जन जीवन में था । उनका जीवन शैव दर्शन तथा तन्त्र द्वारा प्रभावित था । ( ११६९-१२४८ ) कश्मीर के तीर्थों का विस्तृत वर्णन नीलमत पुराण के श्लोक संख्या १२७१-१३७२ मे किया गया है । इनका अध्ययन कश्मीर के तत्कालीन भौगोलिक ज्ञानवर्धन निमित्त विशेष महत्व रखता है । तीर्थों, उनके स्थानीय महत्वों और उनसे सम्बन्धित गाथाओं एवं जनश्रुतियों तथा उनके माहात्म्यों का विशद वर्णन सम्पूर्ण नीलमत पुराण में मिलता है । नीलमत पुराण के वर्णनों तथा भौगोलिक स्थितियों के कारण तीर्थों तथा उल्लिखित स्थानों का पता निश्चयात्मक ढंग से लगाया जा सकता है । नीलमत पुराण के भौगोलिक वर्णनों के आधार पर आधु- निक विद्वानों ने अनेक स्थानो का सफलतापूर्वक पता लगाया है । तीर्थों तथा देव-स्थानों के मूल नाम तथा उनकी भौगोलिक स्थिति के भूल जाने का कारण कश्मीर की ९० प्रतिशत जनता का हिन्दू धर्म त्याग कर मुस्लिम धर्मावलम्बी हो जाना है । उनकी दृष्टि में इन तीर्थों तथा देव-स्थानों का कोई धार्मिक महत्व नही रह गया था । इस समय शायद ही कोई प्राचीन देव-स्थान तथा तीर्थ होगा जो मुस्लिम जियारत, मस्जिद या कब्रिस्तान में परिणत न कर दिया गया हो अथवा उनके पास जियारतें आदि न बना दी गयी हों । इसमें मुसलमानों को दोष नहीं दिया जा सकता । उन तीर्थों की कोई खबर लेने वाला नही था । उनकी पूजा, उपासना, मरम्मत आदि समाप्त हो गयी । ये काल के थपेड़ों में नष्ट होने लगे । उनका इतिहास लोग भूल