भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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१६ राजतरंगिणी आश्रय ग्रहण किया था। अर्जुन ने हिमवान को जीतकर धवला गिरि पर अपना शिविर स्थापित किया था। (सभा पर्व २७:२९)। कुलिन्द राज सुबाहु का राज्य हिमालय के समीप था। (७८: १४)। कर्ण ने हिमालय पर्वत के समस्त राजाओं को पराजित किया था। (वन पर्व २५४:४-६)। हिमालय छ वर्षपर्वतों में पूर्व से पश्चिम विस्तृत एक वर्ष पर्वत है। (भीष्म पर्व ६.३-५)। हिमालय पर भगवान् श्रीकृष्ण ने उपमन्यु के दिव्य आश्रम को देखा था। (अनुशासन पर्व १४:४३-४५)। महा- प्रस्थान काल में पाण्डवों को मार्ग में हिमालय मिला था। तत्पश्चात् आगे बढ़ने पर उन्हें बालुकार्णव मिला था (महाप्रस्थानिक पर्व : १-२)। बहिर्गिरि तथा अन्तर्गिरि का उल्लेख आता है। बहिर्गिरि 'लेसर' हिमालय अर्थात् जहाँ से चढ़ाई आरम्भ होती है, उसे कहते हैं। इसमें मसूरी, नैनीताल, धर्मशाला, श्रीनगर के भूखण्ड हैं। इसे चूल हिमवन्त भी कहा जाता है। बहिर्गिरि की संज्ञा एक पर्वतीय प्रदेश से भी दी गयी है। इस प्रदेश को उत्तर दिग्विजय काल में अर्जुन ने जीता था। सभा पर्व २७ : ३ इन प्रदेशों की गणना भारतीय जनपदों में की गयी है। भीष्म पर्व ९ : ५० अन्तर्गिरि मध्यवर्ती हिमालय हैं। अंग्रेजी में इसे ग्रेट सेन्ट्रल हिमालय कहते हैं। इसके अन्तर्गत किचिन- चंगा, धवलागिरी, गौरीशंकर, नन्दादेवी तथा नंगा पर्वतादि तथा उनके विभिन्न शिखर हैं। इनका सम्बोधन महा हिमवन्त नाम से भी किया गया है। उपगिरी हिमालय के तराई के क्षेत्र को कहते हैं। महाभारत तथा अष्टाध्यायी में हिमालय की पर्व- तीय शाखा का नाम उपगिरि दिया गया है। वह शैवालिक पर्वतमाला है। (अष्टाध्यायी ४ : २ : ११२) योगिनी तन्त्र (१: १, १: १२, १ : १६) में हिमालय का उल्लेख मिलता है। हिमालय तथा कैलास को मेरु पर्वत के दक्षिण कहा गया है। हिमालय तथा पारियात्र पर्वतो के मध्य के देश को 'मध्यदेश' की संज्ञा दी गयी है। वह मध्यदेश पूर्व में आसाम तथा मणिपुर तक चला गया है। मार्कण्डेय पुराण हिमालय का वर्णन करता है। हिमालय धनुषाकार एक समुद्र से दूसरे समुद्र तक फैला है। पश्चिम में अरब सागर और सिन्धु तथा पूर्व में बंगाल की खाड़ी तक फैली भारतीय सीमा पर स्थित अडिग पर्वतमाला को हिमालय कहना होगा। हिगुल, हिन्दुकुश, कराकोरम, शैवालिक आदि सभी पर्वतमालाएँ हिमालय के अन्तर्गत आ जाती हैं। इस पुराण के अनुसार कैलास की स्थिति हिमालय के उत्तर तथा उसके पूर्व-पश्चिमीय विस्तार के मध्य स्थान पर पड़ेगा। भारत के मानचित्र द्वारा यह सत्य मालूम होता है। पुराणकारो को भारतीय भूगोल का कितना सच्चा ज्ञान था इसका पता चलता है। मत्स्य पुराण (१२० : २) में कैलास को एक प्रकार से हिमालय में सम्मिलित किया गया है। श्रीमद्भागवत के अनुसार हिमालय का विस्तार ७५० कोस कहा गया है। कालिदास ने हिमालय को पृथ्वी का मानदण्ड बताया है- अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः। पूर्वापरौ तोयनिधी वगाह्य स्थितः पृथिव्या इव मानदण्डः॥