राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट ख १७ कौटिल्य ने हिमालय को चक्रवर्ती क्षेत्र के अन्तर्गत माना है । हिमालय से समुद्र तक के देश पर शासन करने वाले को चक्रवर्ती राजा तथा उसका क्षेत्र कहा गया है (१ ९ : १) राजशेखर ने काव्य मीमासा में हिमवत से समुद्र तक के देश पर शासन करने वाले को सम्राट् कहा है । हिमालय का वर्णन प्राचीन भारतीय सीमा का निर्धारण करता है । कुमार सम्भव में कालिदास ने हिमालय को भारत की उत्तरीय सीमा पर रखा है । पूर्व तथा पश्चिम दिशाओ में उसे समुद्र तक विस्तृत होना कहा गया है । भारतवर्ष तथा हरिवर्ष के मध्य हिमालय की स्थिति मानी गयी है । हेमकूट को हिमालय के दक्षिण में भी कहा गया है । एकाध लेखको ने किंपुरुष वर्ष को हेमकूट माना है । बौद्ध ग्रन्थों मे हिमालय का वर्णन मिलता है । अंगुत्तर निकाय, संयुक्त निकाय, हिमवंत सुत्त, मक्कट सुत्त, पठम-पव्वतूपमा सुत्त में हिमालय को पर्वतराज कहा गया है । मैनाक पर्वत कैलास के समीप हिमालय में स्थित था । दद्दर, धम्मक, चण्डगिरी, कुलिन्द, विस्म पर्वत हिमालय के अन्तर्गत थे । कदम्ब, कुक्कुट, कौशिक, गोतम, पद्म, भारिक, लम्बक, वस्सभ, सयंग, शोभित, कैलास, केदार, हिमालय पर्वत के भाग कहे गये हैं । अलवेरुनी मेरु तथा निषध पर्वतों को हिमालय के अन्तर्गत मानता है । बौद्ध ग्रन्थ अपदान म कदम्ब, कुक्कुट अथवा कुकुट, भूतगण, कौशिक, गोतम, पदुम, भारक, लम्बक, वसभ, सयंग, शोभित को हिमालय में रखा गया है । हिमालय को तीन हजार योजन वर्ग मीलों में विस्तृत तथा चौरासी हजार शिखरो से मण्डित कहा गया है । हिमालय के अन्तर्गत महापद्म सर अर्थात् कश्मीर के उलर लेक का वर्णन बौद्ध ग्रन्थ अंगुत्तर निकाय करता है । क्षुद्र हिमालय में महापद्म हृद तथा महा हिमवन्त मे भी एक सर का होना मिलता है । उलर लेक साडे बारह वर्ग मील विस्तृत है । उलर का संस्कृत मूल शब्द उल्लोल है । उल्लोल का अपभ्रंश उलर हो गया है । उल्लोल का अर्थ लहर होता है । उलर में लहरो का आरोह तथा अवरोह वायु स्पर्श द्वारा सुन्दर लगता है । विशेषतः प्रातः तथा सायंकाल जब गगन में किंचित् अरुणाई सहित नीलिमा रहती है । उस समय किसी शैल धातु पर बैठकर प्रकृति की इस अनुपम शोभा के नैसर्गिक सौन्दर्य को निरखने में विचित्र अनुभूति होती है । हिमालय का उल्लेख बौद्ध ग्रन्थो मे निम्नलिखित स्थलो पर विशेष रूप से मिलेगा । पाली साहित्य मे हिमवा एवं हिमवन्त हिमालय का नाम दिया गया है । परमत्य जोतिका अध्याय १, २; समन्त पासादिका भाग १; विसुद्धि मग्ग ७; जातक भाग, ४, ६; कुनाल जातक ५:५०१, ५०२ हि०; महा विस्सन्तर जातक ६.३३६, ५३८ हि०; चेतिय जातक, धम्मपदट्ठ कथा भाग १, २, ३, ४; महावंश १:१८ तथा ५:२४ हि०; मिलिन्द प्रश्न पृष्ठ ३४७-६४८ हिन्दी, पव्वजा सुत्त दीघा निकाय पृष्ठ ३६ हि०; अट्ठ सालिनी (देवनागरी) पृष्ठ १४; घेर गाथा २:१३८; जैन ग्रन्थों में उत्तरा- ध्ययन सूत्र ११:२७ पृष्ठ ४९; मनोरथ पुराण २:७५९; द्रष्टव्य है । हिमालय की दस मुख्य नदियाँ है । वे है—गंगा, यमुना, अचिरवती, सरयू, मही, सिन्धु, सरस्वती, वेत्रवती, यीवंसा (वितस्ता), चन्द्रभागा । ३