भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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२० राजतरंगिणी हरचरित चिन्तामणि के लेखक ने नीलमत पुराण की शब्दावली का प्रयोग किया है। वितस्ता को भगवती देवी पार्वती का रूप माना है। कथा है। पिशाचों के सम्पर्क द्वारा कश्मीरियों में उत्पन्न पाप किंवा दोष के मोचनार्थ, भगवती पार्वती ने कश्मीर में वितस्ता का रूप धारण किया है। भगवान् शिव ने नील नाग के स्थान पर शूल द्वारा प्रहार किया। यह स्थान 'नील कुण्ड' है। उसे 'शूल घात' तथा 'वितस्तात्र' कहते हैं। प्रहार एक 'वितस्ति' अर्थात् एक बालिस्त लगभग १२ अंगुल मिलकर जितना माप होता था उतने परिमाण में था। अतएव 'वितस्ति' के आधार पर वितस्ता नामकरण किया गया। पाणिनि ने 'दिष्टि- वितस्त्योश्च' (६.४.८६) शब्द का प्रयोग किया है। वितस्ति तथा दिष्टि शब्द पर्यायवाची हैं। वितस्ति भारत में तथा दिष्टि शब्द ईरान में प्रचलित था। मध्य एशिया के खरोष्ठी लेखों में दीठि शब्द आया है वह दिष्टि का अपभ्रंश है। वितस्ति और दिष्टि दोनों का अर्थ एक बालिस्त होता है। 'वितस्ताख्य' कश्मीर में तक्षक नाग का निवास-स्थान माना है। 'वितस्ताद्रि' एक पहाड़ी है। यह कहाँ है। कहना कठिन है। महाभारत (१११ : ८२ : ६०) में वितस्ता का मूल स्रोत तक्षक नाग का स्थान माना गया है। इस स्थान का पता अभी नहीं लगा है। देवी पार्वती किंवा उमा वितस्ता रूप से जिस स्थान पर प्रकट हुई थीं उसे नील कुण्ड तथा शूल- घात कहते हैं। नीलनाग वर्तमान वैरी या वीर नाग है। गाथा कहती है। पापी लोगों के स्पर्श द्वारा देवी अपवित्र हो जायेंगी अतएव वे लुप्त हो गयीं। काश्यप की प्रार्थना पर भगवती द्वितीय बार पुनः पंचहस्त नाग स्वरूप प्रकट हुईं। यह स्थान दिवसर परगना में पाजय ग्राम है; यहाँ एक पवित्र जलस्रोत है। समी- पस्थ निवासी इसे पवित्र मानते हैं। भगवती यहाँ भी लुप्त हो गयी। पुनः तृतीय बार नरसिंहाश्रम में जाकर देवी 'वितस्ता' रूप में प्रकट हुईं। काश्यप ऋषि देवी पार्वती स्वरूप वितस्ता के संग के लिए लक्ष्मी को विशोका तथा सिन्धु को गंगा रूप कश्मीर में लाये। अतएव देवी उमा वितस्ता; लक्ष्मी विशोका; अदिति त्रिकोटी; शची हर्पपथा; तथा दिति चन्द्रावती, नदियों का रूप धारण कर कश्मीर को पवित्र भूमि पर निवास करने लगीं। वितस्ता के द्वितीय बार प्रकट होने के सम्बन्ध में एक और गाथा है। कुछ कम प्राचीन है। इस गाथा के अनुसार वितस्ता द्वितीय बार वर्तमान विषयितुर ग्राम में जलस्रोत स्वरूप प्रकट हुईं। यह ग्राम वीरनाग से उत्तर-पश्चिम एक मील दूर स्थित है। यह गाथा वितस्ता माहात्म्य में कही गयी है। इससे प्रकट होता है। स्थान का नाम 'वितस्ता वार्तिका' था। कल्हण ने 'वितस्तारा' का वर्णन किया है। यहाँ अशोक ने स्तूप निर्माण कराया था। कल्हण ने वितस्ता का मूलस्रोत 'नीलकुण्ड' बताया है। स्पष्ट है। कल्हण के समय में वैरीनाग वितस्ता का उद्गम माना जाता था। (वितस्ता माहात्म्य २:३७ रा०त०:१:१०२,१०३) गाथा कहती है। उमा देवी हिमालय की कन्या हैं। वितस्ता का रूप लेकर कश्मीर में प्रकट हुई हैं। प्रथम उनका वर्ण नील था। वितस्ता का एक नाम नीलजा भी है। उसने पर्वत शिखर पर तपस्या की। उनका वर्ण गौर हो गया। इसलिये पर्वत का नाम गौरी शिखर पड़ गया। वितस्ता का जन्मदिन भाद्रपद शुक्लपक्ष त्रयोदशी माना जाता है। वितस्ता उत्सव नीलमत पुराण के अनुसार त्रयोदशी के तीन दिन पूर्व तथा तीन दिन पश्चात् तक मनाया जाता है। इस दिन वितस्ता में स्नान तथा विशेषतया सिन्धुवितस्ता संगम पर पूजा का विधान किया गया है। धूप, गन्ध, माला, नैवेद्य, नाटक खेलने के लिये दान, तथा नाटक 'पात्रों के पूजा का विधान किया गया है। वितस्ता उत्सव की द्वादशी को महाद्वादशी कहते हैं। यदि द्वादशी बुध पर पड़े तो उस दिन भगवान् का जप, स्नान, दान, श्राद्ध किया जाय। उसका फल द्वादश गुना मिलता