राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट ग २१ है। यदि बुध श्रवण पर पड़ जाय तो उसे अत्यन्त महती द्वादशी कहते हैं। संनिहिति स्नान का फल प्राप्त होता है। यदि द्वादशी श्रवण को पड़ जाय तो उस दिन वितस्ता सिन्धु संगम प्राप्त मृतिका स्नान का फल 'उनके संगम स्नान फल के समान होता है। (नीलमत ७६७-७७५) मार्तण्ड अधित्यका के धुर पश्चिम इस्लामाबाद अर्थात् अनन्त नाग नगर है। इसका प्राचीन नाम अनन्त नाग है। अनन्त नाग के कारण नगर का नाम अनन्त नाग पड़ा है। अनन्त नाग जलस्रोत नगर के दक्षिण दिशा में है। हरचरित चिन्तामणि तथा कुछ माहात्म्यों में इसका उल्लेख मिलता है। अनन्त नाग का सरोवर चौखूटा काफी बड़ा है। पृष्ठ भाग से जल निकलता है। सरोवर सर्वदा पूर्ण रहता है। यहाँ लोग स्नान करते हैं। तैरते हैं। यहाँ का कोलाहल तथा बच्चों की जल क्रीडा मुझे आजन्म स्मरण रहेगी। नी० ˙८८२, ११६०, ११८० हरचरित चिन्तामणि १०:२५१ नगर के उत्तर और भवन मार्तण्ड के मार्ग में गौतम नाग है। जिसका वर्णन मार्तण्ड माहात्म्य तथा नीलमत में दिया गया है। नी० : १०५ अनन्त नाग के समीप वितस्ता को नदी का वास्तविक रूप प्राप्त होता है। यहाँ सान्द्रन, भृंग, आर- पथ तथा लिद्दर स्रोतस्विनियों का संगम वितस्ता में होता है। रानबल के पश्चात् वितस्ता नदी नाव चलते योग्य हो जाती है। समस्त कश्मीर उपत्यका में इस स्थान के पश्चात् नावों द्वारा परिवहन बारहमूला तक होता है। मूलस्रोत अर्थात् नीलकुण्ड किंवा वैरी नाग से डल लेक के समीप तक नदी में केवल २२० फीट का ढाल है। नदी की धारा में विशेष परिवर्तन नही हुआ है। वह अपने मूल स्थान अथवा प्रवाह को पकड़े प्रवा- हित है। उसका प्रवाह कछारी अथवा जलोढ भूमि से होकर होता है। शीत ऋतु में नदी का जल स्तर नीचा हो जाता है। जल घट जाता है। तट नदी के निम्न जलस्तर से १५ फीट ऊँचा उठ जाता है। वसंत ऋतु में हिम के गलने पर नदी में बाढ़ आती है। कभी-कभी तट से उफनकर वितस्ता बहने लगती है। ग्रीष्म कालीन मूसलाधार वृष्टि से भी नदी में बाढ आ जाती है। कृषि को बाढ़ से अपार क्षति उठानी पड़ती है। कल्हण ने इस प्रकार के बाढों का बहुत वर्णन किया है। रा० . ७:१११६, ७:१६१४, ८:२४४६, ८:२७८६, ०:१४१७, ८:१४२३, जोन : ४०३ । जलप्लावन से कश्मीर उपत्यका को बचाने के लिए सेतुओ जिसका अपभ्रंश 'सम' है प्राचीन समय में निर्माण कराया गया था। उनमें जल प्रवेश तथा नि स्रुत करने के लिए द्वार बने रहते थे। इन द्वारों को अब कुलावा कहते हैं। उनका विशद उल्लेख कल्हण, जोन तथा श्रीवर की राजतरंगिणियों में निम्नलिखित स्थानों पर मिलेगा—रा० : १ : १५९, ३ : ४८३, ५ : ९१, ५ : १०३, १२०, ८ : २३८०, रा० : जोन ४०४, . ८८७ रा० : श्रीवर ३ : १८९ । नीलमत के श्लोक ३००-३०१ से प्रकट होता है कि कश्यप ने वितस्ता से निवेदन किया था। 'सुभगे ! वितस्ता ! तुम हल मार्ग से गमन करो अन्यथा यह देश जलसे सर स्वरूप हो जायगा।' इससे प्रकट होता है कि वितस्ता का मार्ग कश्मीर उपत्यका का जल बहाने के लिये बनाया गया था। हल जोतते समय जिस प्रकार भूमि में गहरी प्रणाली बन जाती है। उसी प्रकार गहरे पात्र को बनाने का संकेत वहाँ किया गया है। प्राचीन काल में सड़कें बहुत कम थी। लगभग १०० वर्ष पूर्व सड़कों का अस्तित्व नगण्य था। व्यापार, परिवहन आदि का कार्य नदी द्वारा होता था। सन् १८९१ ई० की जनगणना के अनुसार लगभग ३४०० हाजी अर्थात् नाविक जल परिवहन कार्य में लगे थे। नावें परिवहन की प्रधान साधन थीं। आज इनकी संख्या बहुत कम रह गयी है। रा० ५ : ८४, ७ : १६२८।