राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ राजतरंगिणी वितस्ता के तट पर कश्मीर की राजधानियों को होने का गौरव प्राप्त है । श्रीनगर, हुष्कपुरस्थान, परिहासपुर आदि इसके तट पर हैं । प्राय प्राचीन तीर्थ स्थान तथा नगर इसके तट पर बसे थे । गाँवों की आबादी नदी के कछार में थी । और आज भी है । नावों द्वारा दालों तथा गल्ले का सामान और उद्योग- धन्धो की वस्तुएँ एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जायी जाती हैं । कल्हण के माण्डूर के वर्णन द्वारा स्पष्ट प्रतीत होता है कि काश्मीरी जनता में नौपरिवहन का कितना महत्त्व था । (रा० . १ : २०१) गनवल स्थान अनन्तनाग नगर का बन्दरगाह या पत्तन था । नीलमत पुराण में गनवल को 'गण्ड पुच्छ नाम' कहते हैं । ना० (नी० ११०, हरचरित चिन्तामणि १५१) गनवल के पश्चात् वितस्ता विजयेश्वर तीर्थ अर्थात् विजय येहरा में प्रवेश करती है । यह वर्तमान नगर बिजत्रोर है । नदी के लगभग एक मील अधोभाग में ऊँची कछार अनिग्नदरा अर्थात् करेवा पड़ता है । बाम तट पर कश्मीर उपत्यका का अत्यन्त प्राचीन स्थान पद्मपुर पड़ता है । उसे आजकल 'पाम्पर उर' कहते हैं । चक्रधर से ३ मील और उतराय की ओर जाने के पश्चात् 'माधवाश्रम' अर्थात् 'मरहोम' पड़ता है । वितस्ता में यहाँ विशोका अर्थात् 'विशौ' तथा 'रमण्यावती' अर्थात् 'रामब्यार' नदियाँ मिलती हैं । माहात्म्य में इस संगम का नाम गम्भीरा संगम दिया गया है । यहाँ की तीर्थ-यात्रा अभी तक लोग करते हैं । रामब्यार अर्थात् रमण्यावती तथा वेशो नदी का जहाँ संगम है उसे 'गम्भीरा' कहते हैं । कल्हण ने गम्भीरा का वर्णन अनेक स्थानो पर किया है । एक मत है कि विशोका की धारा जो ध्वनोपरा के समीप बहती थी पूर्व काल में ध्वान धारिणी कही जाती थी कालान्तर में इसका नाम गम्भीरा पड़ गया । (नील० १२१४-१२१५ तथा १३०५-१३०८) गम्भीरा का ऐतिहासिक महत्त्व है । विजयेश्वर से श्रीनगर के मार्ग में पड़ने के कारण सैनिक महत्त्व का स्थान है । राजा सुस्सल की सेना सन् ११२२ ई० में यहाँ पीछे हटती हुई पूर्णतया पराजित हो गयी थी । लगभग ६ वर्ष के पश्चात् उसके पुत्र के सेनापति ने विद्रोही सेना पर विजय प्राप्त किया था । (रा० : ८ : १०६३ ८ . १४६७) गम्भीरा संगम के पश्चात् वितस्ता में दक्षिण तट से प्राचीन 'होलदा' तथा वर्तमान 'उलर' जिला का जल लेकर एक स्रोतस्विनी मिलती है । तत्पश्चात् नदी 'वैश्ववन' अर्थात् 'वस्तर' वन के शिराबाहु अवन्तिपुर के प्राचीन नगर से होती हुई प्रवाहित होती है । यहाँ से श्रीनगर तक इसमें कोई नदी नहीं मिलती । एक 'रामुस' नदी मिलती है परन्तु वह नाममात्र की स्रोतस्वनी है । श्रीनगर के पूर्वीय भाग का जल डल (डल लेक) में गिरता है । यहाँ डल का पानी एक छोटी कुल्या अर्थात् नहर से वितस्ता में गिरता है । इस कुल्या को 'सुग्य कुल' कहते हैं । प्राचीन काल में इसको 'महासरित्' कहते थे । इस सरित पर सेतु अर्थात् बाँध बँधा है । उसके कारण डल लेक तथा श्रीनगर दोनों की रक्षा होती है । नदी का जल बाँध के कारण डल लेक में नहीं जा सकता । महासरित में 'दुर्गगलिका' पर जल द्वार लगाया गया था । डल लेक का जल महासरित में जाता है । डल लेक अपनी अनुपमेय शोभा के लिए प्रसिद्ध है । यह सर ४ मील लम्बा तथा ढाई मील चौड़ा है । इसका जल करीब ३० फिट से अधिक गहरा नहीं है । इसमें उपह्रद तथा तैरते खेत हैं । जल स्वच्छ तथा ताजा रहता है ।