भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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परिशिष्ट ग २३ डल अर्थात् ढल का वर्णन इस नाम से कल्हण ने कही नहीं किया है । श्रीवर ने इसे 'डल' नाम से सम्बोधित किया है । वितस्ता माहात्म्य में डल का वर्णन मिलता है ( २१ : १९ ) श्रीवर ने डल के दो द्वीपो का वर्णन किया है । एक का नाम 'रूप लांक' ( चान्दी की लंका ) और दूसरे का नाम 'सूनलांक' ( स्वर्ण लंका ) है । डल के तटवर्तीय तथा जल के अनेक स्थानों का नाम दिया गया है । 'हस्तवालिक' अर्थात् हस्तबोल का पता चलता है । गोपाद्रि, ज्येष्ठेश्वर, थेदा, सूरेश्वरी आदि स्थान अपने अनेक नामों के साथ डल के पूर्वीय तट पर स्थित हैं । शालीमार, निशात तथा नसीम बाग मुगलों ने निर्माण कराया था । त्रिप्रस्था नदी धुर उत्तर में डल में मिलती है । वितस्ता श्रीनगर में तीन मिल बहती है । उसके तट पर मकान बने हैं । उनमे लगे शिलाखण्ड प्राचीन काल के ध्वन्सावशेषों से प्राप्त किये गये हैं । वे पूर्व काल में अधिकतर मन्दिरो तथा अन्य देवस्थानों में लगे थे । उनके देखने तथा उन पर हुए नक्काशी के कामो से पता चलता है कि प्राचीन काल में कितनी सुन्दर भवनों की रचना वितस्ता तट पर रही होगी । वह काशी से कम सुन्दर काशी उसके लघुरूप में नही रही होगी । नगर में प्रथमतः नदी उत्तर वाहिनी है । चौथे पुल के समीप मोड लेकर दक्षिण-पश्चिम की तरफ घूमती है । यहाँ पर कुतकुल अर्थात् प्राचीन 'क्षितिका कुल्या' है । क्षितिका का वर्णन कल्हण ने किया है । (रा० : ८ : ७३२) कुछ आगे चलकर वितस्ता में 'दुग्ध गगा' अर्थात् वत्सकुल मिलती है । श्रीनगर के अधोभाग में वितस्ता के दोनो तरफ कच्छ भूमि अर्थात् दलदलीय भूखण्ड मिलता है । वह कुछ दूर तक चला गया है । वाम तट पर सुखसर तथा पंचनोर नम्बल को पर्वतीय लघु स्रोतस्विनियां जल पूरित करती है । नदी के उत्तर में दलदल अधिक फैला है । वितस्ता की सहायक नदी सिन्ध का डेल्टा है । दुदरहोम प्राचीन 'दुग्धाधम' के समीप नदी की शाखाएँ हो जाती हैं । उनका डेल्टा बन जाता है । वे उथले दलदल हो जाते हैं । उन्हें अंचार कहते है । इसका उत्तरीय भाग ऊँची भूमि के साथ सिन्ध उपत्यका के साथ श्रीनगर को सम्बन्धित करता है । पश्चिमी दिशा का डेल्टा एक कछार अधित्यका है । यह सिन्ध उपत्यका के पश्चिमीय अधोभाग को सम्बन्धित करता हुआ वितस्ता-सिन्धु संगम तक पहुँच जाता है । शादी- पुर के ठीक दूसरी तरफ सिन्धु वितस्ता से मिलती है । वितस्ता सिन्धु संगम प्रयाग तुल्य कश्मीर का पवित्र तीर्थ स्थान है । सुदूर पूर्व काल में वह संगम त्रिगाम के समीप था । कश्मीर के हिन्दू जीवन मे महत्वपूर्ण स्थान रखता है । इसकी पवित्रता प्रयाग संगम समान मानी गयी है । माहात्म्य में इस तीर्थ की पवित्रता का अत्यधिक गुणगान किया गया है । जहां दो नदियो का संगम है वहाँ ईंटों का निर्मित किया एक द्वीप है । उस पर एक चिनार का वृक्ष लगा है । यह चिनार का वृक्ष प्रयाग के वट वृक्ष तुल्य पवित्र माना जाता है । मैं यहाँ वितस्ता के बाढ़ के समय सितम्बर सन् १९६२ में आया था । वितस्ता-सिन्धु-संगम प्रयाग कहा गया है । त्रिकोटि संगम से रोपेश्वर हर, पावना के संगम और राजो बिन्दु विनर्मला से क्षीर मोचन तक का क्षेत्र वाराणसी के समान पवित्र माना गया है । (नील० १३०१, १३२७) गाँव सम्बल में श्रीनगर से उलर लेक को उत्तर जाने वाला मार्ग आता है । नदी को पार करता त्रागबल दर्रा तक जाता है । इस मार्ग के वाम दिशा में प्राचीन जयपुर है । मध्य आठवी शताब्दी में जया- पीड ने यहाँ अपनी राजधानी स्थापित की थी । यह सम्बल के दलदल तथा नोर नाला के मध्य एक द्वीप पर स्थित है । इसे अन्दर कोट कहते है । (रा० : ४ : ५०६-५११)