भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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२४ राजतरंगिणी सम्बल के समीप वितस्ता नदी अहतुंग पहाडी के मूल से गुजरती है। पहाड़ी एक हजार फिट ऊँची होगी। इस पर्वत के छाया में मनसाबल अर्थात् मानस सर सुन्दर झील है। इसका वर्णन नीलमत तथा जोनराज ने किया है। यह सरोवर मीलों लम्बा है। कश्मीर के सब झीलो से अधिक गहरा है। भूगोल के वर्णन के समय इसका वर्णन किया गया है। वितस्ता का सम्बन्ध मनसाबल से एक छोटे नहर द्वारा होता है। ( रा० : जोन ८६४, नील० 890, 1244, 1247, 1334 ) वितस्ता के वाम तट पर 'उच्छकुण्डल' तथा 'मग्कुण्डल' दो ग्राम है। प्राचीन प्रमाणो से प्रतीत होता है कि कभी उलर लेक इन ग्रामो के समीप तक फैला था। कल्हण से मालूम होता है कि उक्त ग्राम रिवलेम कर बनाए गए थे। जोनराज उन्हें ऊलर लेक के तट पर रखता है। श्रीवर ने इन ग्रामो का उल्लेख करते हुए उन्हें समुद्रकोट ( सुग्दर कोट ) से द्वारिका के समीप अन्दर कोट तक उलर के तट पर बताता है। इसी प्रकार 'शुय्य कुण्डल' का उल्लेख मिलता है। ( रा० ५ : १२० रा० जोन १२१० ) सोपोर के पास वितस्ता की बड़ी अन्तिम सहायक नदी कश्मीर मे मिलती है। इसका नाम 'पोहुर' है। वह सोपुर के अधोभाग में चार मील पर है। वितस्ता में मिलने के पूर्व उत्तर-पश्चिम कश्मीर उपत्यका का जल लाती है। कल्हण ने काश्मीर के इस क्षेत्र का बहुत कम वर्णन किया है। राजतरंगिणी मे पोहुर अथवा और किसी नदी के संगम का वर्णन नही मिलता। इस नदी का प्राचीन नाम क्या था निश्चयात्मक रूप से नही कहा जाता। जोनराज ने इस नदी को 'पहर' कहा है। माहात्म्यो में प्रहर तथा प्रहार दोनों पाठ मिलते है। ( रा० जोन ११५०, ११५३, वितस्ता माहात्म्य २७-२, नील० 1322 ) ह्मल स्रोतस्विनी ह्मल परगना में बहती आती है। ह्मल ही 'समाला' नदी ( रा० : ७ : १५९ ) महापद्मसर अर्थात् उलर से लगभग चौदह मील और आगे चलकर बारहमूला के गर्त मे वितस्ता गिरती है। बारहमूला के पश्चात् वितस्ता में नावें नही चल सकती। उसका प्रवाह उत्तरोत्तर वेगमय हो जाता है। जल धारा की भयकर जल वेग ध्वनि द्वारा घाटी निरन्तर गूँजती रहती है। वितस्ता : वायु का ब्रह्माण्ड, कूर्म और मत्स्य पुराणों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है। मार्कण्डेय पुराण वितस्ता का स्थान गंगा, सिन्धु तथा सरस्वती के साथ रखता है। मार्कण्डेय, वायु, ब्रह्माण्ड, कूर्म तथा वाम पुराणों के अनुसार - 'हिमवत्पादामि सृता' रूप से वितस्ता का उल्लेख किया गया है। अलवेरूनी ने हिमालय से निकलने वाली नदियों में 'वियत्त' अर्थात् वितस्ता का उल्लेख किया है। भागवत पुराण ( ५ : १० . १७ ) ने वितस्ता की गणना विश्व की महानदियो मे की है। शतद्रु, चन्द्रभागा, मरुद्वृधा, वितस्ता, असिक्विनी, विश्वेति महानद्यः । निम्नलिखित मुख्य नदियों का वर्णन राजतरंगिणी तथा नीलमत पुराण में मिलता है। उनका प्राचीन तथा आधुनिक नाम दे देना ठीक होगा : इरावती : रावो वितस्ता : झेलम विश्रामा : व्याम