राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ राजतरंगिणी सम्बल के समीप वितस्ता नदी अहतुंग पहाडी के मूल से गुजरती है। पहाड़ी एक हज़ार फ़िट ऊँची होगी। इस पर्वत के छाया में मनसावल अर्थात् मानस सर सुन्दर झील है। इसका वर्णन नीलमत तथा जोनराज ने किया है। यह सरोवर मीलों लम्बा है। कश्मीर के सब झीलों से अधिक गहरा है। भूगोल के वर्णन के समय इसका वर्णन किया गया है। वितस्ता का सम्बन्ध मनसावल से एक छोटे नहर द्वारा होता है। (रा० : जोन ८१४, नील० ४90, 1244, 1247, 1334) वितस्ता के बाम तट पर 'उच्छकुण्डल' तथा 'मग्कुण्डल' दो ग्राम हैं। प्राचीन प्रमाणों से प्रतीत होता है कि कभी वूलर लेक इन ग्रामों के समीप तक फैला था। कल्हण से मालूम होता है कि उक्त ग्राम रिक्लेम कर बनाए गए थे। जोनराज उन्हें वूलर लेक के तट पर रखता है। थीवर ने इन ग्रामों का उल्लेख करते हुए उन्हें समुद्रकोट (सुन्दर कोट) से द्वारिका के समीप वग्दर कोट तक वूलर के तट पर बताता है। इसी प्रकार 'सुष्ट्य कुण्डल' का उल्लेख मिलता है। (रा० ५ : १२० रा० जोन १२:०) सोपोर के पास वितस्ता की बडी अन्तिम सहायक नदी कश्मीर में मिलती है। इसका नाम 'पोहूर' है। वह सोपुर के अधोभाग में चार मील पर है। वितस्ता में मिलने के पूर्व उत्तर-पश्चिम कश्मीर उपत्यका का जल लाती है। कल्हण ने काश्मीर के इस क्षेत्र का बहुत कम वर्णन किया है। राजतरंगिणी में पोहूर अथवा और किसी नदी के संगम का वर्णन नही मिलता। इस नदी का प्राचीन नाम क्या था निश्चयात्मक रूप से नही कहा जाता। जोनराज ने इस नदी को 'पहूर' कहा है। माहात्म्यो में प्रहर तथा प्रहार दोनो पाठ मिलते हैं। (रा० जोन ११५०, ११५३, वितस्ता माहात्म्य २७-२, नील० 1322) हमल स्रोतस्विनी हमल परगना में बहती आती है। हमल ही 'समाला' नदी (रा० : ७ : १५९) महापद्मसर अर्थात् वूलर से लगभग चौदह मील और आगे चलकर बारहमूला के गर्त मे वितस्ता गिरती है। बारहमूला के पश्चात् वितस्ता में नावें नही चल सकती। उसका प्रवाह उत्तरोत्तर वेगमय हो जाता है। जल धारा की भयंकर जल वेग ध्वनि द्वारा घाटी निरन्तर गूँजती रहती है। वितस्ता : वायु या ब्रह्माण्ड, कूर्म और मत्स्य पुराणों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है। मार्कण्डेय पुराण वितस्ता का स्थान गंगा, सिन्धु तथा सरस्वती के साथ रखता है। मार्कण्डेय, वायु, ब्रह्माण्ड, कूर्म तथा वाम पुराणो के अनुसार :- 'हिमवत्पादानिःसृता' रूप से वितस्ता का उल्लेख किया गया है। अलवेरूनी ने हिमालय से निकलने वाली नदियों में 'वियत्त' अर्थात् वितस्ता का उल्लेख किया है। भागवत पुराण (५ : १० . १७) ने वितस्ता की गणना विश्व की महानदियो मे की है। शतेद्रु, चन्द्रभागा, मरुद्वृधा, वितस्ता, असिक्किनी, विश्वेति महानद्यः। निम्नलिखित मुख्य नदियो का वर्णन राजतरंगिणी तथा नीलमत पुराण में मिलता है। उनका प्राचीन तथा आधुनिक नाम दे देना ठीक होगा . इरावती : रावी वितस्ता : झेलम विशोका : वेशव