राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट ग २५ देविका : रावी की एक सहायक नदी है। उमा का रूप है। रावी और चेनाव के मध्य बहती है कुहू : कुभा अर्थात् काबुल नदी गोमती : गोमेल (ऋग्वेदीय गोमती) नीलमत मे गौतमी है। कही कही गोमती छप गया है। शतद्रु : सतलज चन्द्रभागा : चिनाव सरस्वती : सरस्वती सिन्धु : महानद तथा दूसरी इसी नाम की छोटी नदी कश्मीर मे है जो बान्दीपुर के पास वितस्ता में मिलती है। दोनों नदियाँ कश्मीर मण्डल में बहती है। सिन्धु नदी लद्दाख, लेह, गिलगिट, चिलास होती पाकिस्तान में निकल जाती है। छोटी सिन्धु सोनमर्ग के पर्वत के किनारे-किनारे बहती वितस्ता में मिलती है। कश्मीर मण्डल की जो नदियाँ सिन्धु में मिलती है उनमें तथा सिन्धु में स्नान करने पर मनुष्य मरणोपरान्त स्वर्गगामी होता है। इसका स्पष्ट उल्लेख किया गया है। उत्तरकुरु को ऐतरेय ब्राह्मण (९:१४) में परेण हिमवन्तं कहा गया है। एक अन्य स्थान पर (८:२३) में वसिष्ठ सातहव्य ने उत्तरकुरु को देवक्षेत्र कहा है। सातवीं शताब्दी में चीनी लेखकों के अनुसार सिन्धु नदी से चेनाव नदी और दक्षिण माल्दरेज तक था। हुएनसांग के अनुसार उरसा कश्या पश्चिम तक्षशिला तथा सिंहपुर दक्षिण-पश्चिम पूंछ और राजौरी दक्षिण था। उरसा भूखण्ड कश्मीर तथा तक्षशिला के मध्य में था, (कनिंघम) पूर्व तथा पूर्व-दक्षिण की सीमा कहाँ तक विस्तृत थी पता नहीं चलता। परन्तु रावी नदी तक यह सीमा विस्तृत थी यह बात मानी जाने लगी है। उत्तर में सिन्धु नदी की उपत्यका में हिमालय पर्वतमाला में स्थित भूखण्ड था। उस समय जालन्धर हर्षवर्द्धन के राज्य में था। आठवीं शताब्दी का नक्शा ठीक नहीं मिलता परन्तु शंकर वर्मा ने कांगड़ा उपत्यका विजय किया था। इस प्रकार कश्मीर सिन्धु नदी से शतद्रु सतलज तक पर्वतीय प्रदेश में था। हुएनसांग के मत से ११६६ मील है।