राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३० राजतरंगिणी तक्षक उस समय कुरुक्षेत्र गया था अतएव उसकी प्राण रक्षा हो गयी थी । उसका पुत्र अश्वसेन भी दाह काण्ड से बच गया था । अश्व असुर अपनी रक्षा होता न देखकर अर्जुन की शरण गया था । ( महा० : आदि० : १ . १२५:७' १ . २१८ . ४, ५, १ : २१९ : ९; १ : २२० : ३७ ) परीक्षित की हत्या पर तक्षक नाग अपनी राजधानी तक्षशिला भाग गया था । इससे प्रगट होता है । षड्यन्त्र का आश्रय लेकर प्रतिहिंसा के कारण किसी प्रकार परीक्षित के राजभवन मे प्रवेश कर उसकी हत्या का कारण हुआ था । परीक्षित पुत्र राजा जनमेजय ने तक्षशिला पर तक्षक नाग को दण्ड देने के लिये आक्रमण किया था । नाग जाति का सहार राजा जनमेजय ने किया था । इसी को पौराणिक भाषा में नाग यज्ञ कहते है । किन्तु आस्तीक मुनि के अनुरोध पर यह सहार बन्द कर दिया गया । ( महा० आदि० ४२ २२; ३ १८, १२:५२, १३ ३९ ) । आर्य तथा नाग जाति मे परस्पर विवाह सम्बन्ध होता था । राजा जनमेजय के पुरोहित सौमश्रय तथा ब्राह्मण ऋषि आस्तीक की माताएँ नाग कन्याएँ थी । चित्रागद तथा नागराज चित्रवाहन की कन्या का विवाह इसी प्रकार हुआ था । वासुदेव के प्रपितामह आर्यक नाग राजा थे । महा० आदिः १:१४; २२७: ६३; ) महाभारत सभा पर्व मे नाग जाति को वरुण के सभासद के रूप मे उपस्थित देखा जाता है । वरुण का स्थान सुमेरु किंवा मेरु पर्वत है । अतएव नाग जाति यदि कश्मीर के हुंजा नगर के समीप में रहती थी तो वहीं उसका वरुण की राजसभा मे उपस्थित रहना स्वाभाविक प्रतीत होता है । ( महा० सभाः तथा रा०; अरण्य० ३.१३१४ ) । भागवत में नाग जाति का वर्णन आता है । कश्यप तथा कद्रू की सन्तान ये कहे गये है । उनका निवास-स्थान मेरु पर्वत के निकट बताया गया है । मेरु पर्वत के दक्षिण हुंजा नगर है अतएव डाक्टर ग्रिय- र्सन ने इसी प्रमाण पर सम्भवत. नागो का स्थान हुंजा माना होगा । ( महा० ५:६-२६ ) । कश्यप के द्वारा प्रमुख नागो—अनत, वासुकी, तक्षक, कर्कोट, पद्म, महापद्म, शंख तथा कुलिक की उत्पत्ति हुई थी । पद्मपुराण सृष्टिखण्ड मे उनका वर्णन आता है । पद्म पुराणः सृष्टि० ३१ भविष्य पुराण के ब्राह्म पर्व में उनकी जाति आदि पर विशेष प्रकाश डाला गया है । ( भविष्य. ब्राह्म पर्व ३३-३६ ) प्रमुख नागो की तालिका निम्नलिखित बनती है : नाम वर्ण रंग दृष्टि दिशा चिन्ह अनंत ब्राह्मण शुक्ल सम्मुख पूर्व पद्म वासुकी क्षत्रिय आरक्त बायीं ओर आग्नेय उत्पल तक्षक वैश्य पीत दायी ओर दक्षिण स्वस्तिक कर्कोटक शूद्र कृष्ण पीछे नैर्ऋत्य कमल पद्म (नाम) शूद्र कृष्ण चंचल पश्चिम पद्म महापद्म वैश्य पीत नीचे वायव्य शूल शंखपाल क्षत्रिय अरुण निश्चेष्टित उत्तर छत्र कुलिक (कम्बल) ब्राह्मण शुक्ल सर्वत्र (कपिल) ईशान अर्धचन्द्र उक्त विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि नाग एक जाति थी। उसमे ब्राह्मण, क्षत्री, वैश्य, शूद्र वर्ण होते थे । उनका चिन्ह भी दिया गया है । यह चिन्ह उनके जाति तथा वर्ण विशेष का प्रतीक था । विशेष द्रष्टव्य है ( भवि० ब्राह्म० ३३-३६ ) ।