राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट घ ३१ वीरों, महापुरुषों, महात्माओं, श्रेष्ठराजाओं की पूजा तथा उनकी स्मृति में श्राद्धादि करने की प्रथा सनातन काल से चली आई है । नागों की पूजा से सम्बन्धित अनेक व्रतो की कथा मिलती है । नाग जाति के महान् नेताओं तथा राजाओं की स्मृति किंवा सम्मान मे मनाया जाता रहा होगा । श्रेष्ठ नागों की स्मृति में स्मारक भी बने होंगे । प्रत्येक जाति में यह प्रथा प्रचलित थी । इस प्रकार के स्मृति, स्मारक तथा वीर पूजादि कालान्तर में रूढ हो गये । नाग शब्द का मूल अर्थ लोग भूल गये । अनेक जातियो के सम्पर्क, सम्बन्ध तथा विचारों के आदान-प्रदान के कारण नाग जाति मे वर्ग संकरता आ गयी होगी । मूल नागस्थान मे जातियों के इन पारस्परिक मिलने के कारण पिशाच, आर्यादि जाति निवास करने लगे । नाग जाति के पूजा-स्थान, स्मारक तथा पर्व निरन्तर चलते रहे । इनका स्थानीय लोगों तथा स्थानो से सम्बन्ध रहता था। सभी लोग नाग पूजा, नाग मेला, नाग पर्व, नाग व्रत तथा नागों के उत्सव मे भाग लेते रहे । नाग जाति स्वयं अन्य जातियो के रस्म-रीति रिवाज से प्रभावित हुई होगी । उसने नवीन जाति के सम्पर्क में नवीन धार्मिक सिद्धान्तो, पर्वो, पूजाओं एवं व्रतो को मान्यता देकर अपना लिया होगा । वह स्वयं दूसरी जातियों में मिलकर नवीन संस्कार तथा परम्पराओं में अपनी पुरानी बातो के साथ ढाल लिया होगा । नाग जाति के चले जाने अथवा लुप्त हो जाने पर भी वे पूजादि चलते रहे । वे एक परम्परा बन गये होगे । उनका संस्कार पड गया होगा । उन सनातन रूढियों को स्थानीय लोग तोड़ना उचित नही समझे होगे । अतएव नाग जाति की अनुपस्थिति मे भी यह क्रम जारी रहा । कालान्तर मे लोग नाग पुरुषों आदि को मानव न मानकर सर्प समझ बैठे । वे ही नाग पूजा के रूप में प्रचलित हो गये । वे आज तक चलते आ रहे हैं । एक जाति है । चम्बा नाग के भाई गरुड़ है । गरुड़ भी पर्वतीय में ऋहाबोर स्थान मे गरुड़ वंश के लोग हैं । उन्हें इस समय डिगर्ती वंश कहा जाता है । नाग पूजा कश्मोर में खूब प्रचलित थी । कश्मीर में सर्व प्रथम नाग जाति के निवास का पता चलता है । तत्पश्चात् पिशाच जाति का कश्मीर मण्डल में प्रवेश हुआ । उसके पश्चात् आर्य जाति का आग- मन कश्मीर में हुआ । नागों के देश में आकर पिशाच तथा आर्य दोनो ने परस्पर आदान-प्रदान, रक्त मिश्रण तथा वैवाहिक सम्बन्धों के कारण नाग जाति के धार्मिक संस्कारो तथा रीति-रिवाजों को किसी रूप मे मान लिया होगा । उनके द्वारा पूजित उनके नेता, महापुरुष तथा राजाओ की पूजा, स्मृति, पर्व, व्रत, त्योहार को मानना आरम्भ कर दिया होगा । आर्यों की आदत थी । वे जिस देश में जाते थे वहाँवालों से मिल जाते थे । अपनी नैसर्गिक सहिष्णुता के कारण नवीन स्थान तथा देश की परम्परा तथा संस्कार को किसी सीमा तक अपना लेते थे । इस प्रकार आर्यों ने सभी देशों मे प्रवेश कर शान्तमय जीवन आरम्भ किया था । वे सैद्धान्तिक विषयों मे संघर्ष मोल लेना पसन्द नही करते थे । उनमें उदारता होती थी । खुद जीना और दूसरो को जीवित रहने देना चाहते थे । इन व्यवहारों तथा पारस्परिक मिलन के कारण विरोध के स्थान पर जातियों का खूब मिश्रण हुआ । मिश्रण में धर्म, परम्परा, संस्कार, पूजा-पाठ आदि का भी मिश्रण होना स्वाभाविक था । एक साथ रहने वाली जातियों ने एक दूसरे के पर्व-पूजा, रीति-रिवाजों को मान लिया । अथवा पुराने तथा नवीन मिश्रणो के कारण एक नवीन वातावरण नवीन स्थिति उत्पन्न हुई होगी । उनका मूलाधार पारस्परिक- सहयोग था । आदान-प्रदान का परिणाम यह हुआ कि नाग जाति के सत्ताहीन होने पर भी ये चलते रहे । शताब्दियो तक यह पूजा आर्यों तथा अन्य जातियो ने जारी रक्खी । इन पूजाओ तथा पर्वों का मूल स्वरूप लोग भूल गये । उसे अपना ही मानने लगे । नाग शब्द स्मरण रहा । नाग का अर्थ सर्प समझा जाने लगा ।