भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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परिशिष्ट घ ३५ थे। पिशाच उत्तरी पंजाब एवं त्रिगर्त के पर्वतीय क्षेत्रों में रहते थे। अतएव नागों से किसी बात पर पिशाचों का वैमनस्य होना स्वाभाविक था। आर्य अधिक सहिष्णु तथा उदार थे। कश्मीर के लिए नवीन थे। अत- एवं उन्होंने पिशाचों की अपेक्षा आर्यों के साथ रहना अधिक पसन्द किया। आर्य कश्मीर में आने लगे तो नागों ने उन्हें कश्मीर में बसने की स्वीकृति दे। उनके साथ अपने पड़ोसी पिशाचों की अपेक्षा अधिक हिल-मिल गये। मानवों के उपनिवेशों का स्वागत किया। यहां मानव का अर्थ मनुवंशजों किंवा आर्यों से लेना चाहिए। कश्मीर में मूल निवासी नाग थे। कालान्तर में पिशाचों ने कश्मीर में प्रवेश किया। अन्त में मानव लोगों का कश्मीर में प्रवेश हुआ। ये आज भी कश्मीर में आबाद हैं। कश्मीरियों के वेशभूषा, रंग-रूप तथा मानवाकृति में क्षेत्र की भिन्नता के अनुसार भिन्नता मिलने का यही कारण है। नाग जाति भारत तथा अफगानिस्तान आदि पश्चिमोत्तर क्षेत्रों के निवासी थे। श्री ग्रियर्सन का सुझाव कि वे हुँजा के निवासी थे कहना कठिन है। हुंजा प्राचीन हुंस द्वार है इस पर भी अभी विद्वानों में मतभेद है। महाभारत में नाग तीर्थ का उल्लेख दो स्थलों पर आया है। दोनों का उल्लेख वन पर्व में है। प्रथम नाग तीर्थ कुरुक्षेत्र की सीमा पर स्थित था। द्वितीय गंगद्वार तथा कनखल के समीप नागराज कपिल का स्थान था। इस तीर्थ में स्नान करने पर सहस्र कपिला गोदान का पुण्य प्राप्त होता है। (वन पर्व ८३:१४, ८४,३३) वर्णन मिलता है। तृतीय शताब्दी तक शक पूर्वोत्तर प्रदेश तक फैल गये थे। वे गंगा के दक्षिण तट से लेकर सरयू की घाटी तक विस्तृत थे। जैन ग्रन्थों से प्रतीत होता है कि पाटलीपुत्र के मुरुण्डों के अधीन था। सिंहासन बत्तीसा जैन ग्रन्थ से मालूम होता है कि कान्यकुब्ज मुरुण्डों के अधीन था। मुरुण्ड कौन थे यह प्रश्न उठता है। प्रयाग के समुद्र गुप्त के शिला लेख में मुरुण्ड का उल्लेख मिलता है। मुरुण्डों का स्थान लम्पक किंवा लघ- मान था। प्रयाग के स्तम्भ से प्रकट होता है। समुद्र गुप्त के प्रभुत्व को शक स्वीकार करते थे। चन्द्रगुप्त द्वितीय ने शक क्षत्रपों का राज्य समाप्त किया था। मथुरा में शक राजाओं के काल में जैन तथा बौद्ध धर्म विकसित हुआ था। कनकलेरा अभिलेख से पता चलता है कि शक जाति कुशाणों के समान महासेन अर्थात् कार्तिकेय की पूजा करती थी। कार्तिकेय को स्कन्द भी कहते हैं। समुद्रगुप्त के नाम के साथ देव पुत्र शाही शाहानुशाही की उपाधि अभिलेखों में प्रयुक्त की गयी है। इस उपाधि का मूल शक पर- म्परा है। नाग पूजा अत्यन्त प्राचीन काल से प्रचलित है। नाग पूजक शिवभक्त होते हैं। शिव का आभूषण नाग है। इस रूपक का यह अर्थ निकलता है कि, शिव के नाग भक्त थे। शैव थे। शिव उपासक थे। पुरा- तन शैवधर्म किंवा मत का भूषण नाग जाति थी। शिव मत की अनुयायी थी। नाग, भूत, प्रेत, पिशाच आदि जातियां शिव उपासक थीं। उन्हें शिव के अनुचरों के रूप में प्रकट किया गया है। कालान्तर में नाग, पिशाच आदि जातियों के मूलरूप को लोग भूल गये होंगे। किसी अतीत गाथा अथवा रूप के आधार पर उन्हें अनु- चर मान लिया गया। इस रूपक को सत्य मानकर शिव की मूर्ति की कल्पना उसी आधार पर की गयी होगी। शिव का मानव आकार किंवा मूर्ति नागादि से मण्डित कर दी गयी। नागेश्वर नाम से शंकर के अवतार की कल्पना की गयी। दारुक राक्षस को शंकर ने मारा था। शिव को नागनाथ कहा जाने लगा। (शिव शतक रुद्र- संहिता ४२।) नागनाथ का उपलिंग भूतेश्वर रूप में पूजा जाने लगा। (शिव कोटि रुद्र संहिता ४ : १)।