भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 841

३४ राजतरंगिणी महावंश में नाग जाति के कश्मीर में रहने का उल्लेख मिलता है—'उस समय कश्मीर-गान्धार देश में बड़ी दिव्य शक्ति वाला अरवाल नाम का एक क्रूर राजा रहता था। वह समस्त पकी फसल ओला और वर्षा कर समुद्र में डाल देता था। उस समय मज्झत्तिक स्थविर आकाश मार्ग से वहाँ आये—उन्होंने धर्म का उपदेश दिया। तत्पश्चात् नागराज ने और हिमालय प्रदेश के चौरासी हजार नागों, बहुत गन्धर्वों, यक्षो तथा कूष्माण्डो ने शरण तथा शील धारण किया। कश्मीर और गन्धार के निवासी मनुष्य नागराजा को पूजने के लिये आये—उस समय से लेकर अब भी कश्मीर और गन्धार देश काषाय से प्रकाशित और त्रिग्न परायण हैं। (महावंश १२ : ९ : २८) जिस स्थान पर भगवान् का नागद्वीप में लंका के उतरना कहा जाता है उस स्थान पर जम्बूकोल विहार तथा तिष्य महाविहार निर्माण किये गये थे। नग्न द्वीप तथा नाग द्वीप विभिन्न द्वीप थे। कही कही भ्रम में लेखकों ने उन्हें एक समझ लिया है। उक्त उद्धरण से दो बातें प्रकट होती है। नागराज की कथा जलोद्भव असुर से मिलती है तथा नाग जाति तथा काश्मीर के मनुष्यो किंवा आर्य वंश वालो से मेल हो गया था। निष्कर्ष निकलता है। वैदिक आर्यो के पूर्व नाग जाति कश्मीर तथा उत्तर भारत के पर्वतीय भूभाग में निवास करती थी। उनका निवास-स्थान हिमालय पर्वतीय खण्ड किंवा प्रखण्ड थे। यदि वे मैदानों में कभी रहते भी थे तो आर्यों के आने पर वे पर्वतीय क्षेत्रों में चले जाते थे। वह कोई नयी बात नही है। मुस्लिम आक्रमण के समय नेपाल में राणा, हिमालय में आबाद महाराष्ट्र तथा राजपूत लोग मुसलमानों के आगमन तथा उनके आक्रमणो से त्रस्त होकर हिमालय के पर्वतीय भागों में सुरक्षा निमित्त चले गये। नाग जाति को आर्यों के आगमन पर एक नवीन बली जाति के धर्म, संस्कृति, सभ्यता तथा विचारों का सामना करना पड़ा। अतएव रक्षा निमित्त वे हिमालय के पर्वतीय भागों में चले गये। हिमालयीय क्षेत्र में नाग जाति के रहने का एक और कारण हो सकता है। असम किंवा नागालैंड में नाग जाति पर्वतीय क्षेत्र में रहती है। शक जाति कश्यप गोत्रीय थी। कास्पियन सागर अर्थात् कश्यप सागर के आस- पास इनका निवास स्थान था। अतएव पुराणों में शक के साथ नाग जाति को रखा गया है। कश्यप की पत्नी कद्रू की जिन सन्तानो का उल्लेख ऊपर किया गया है वे दानव, खश, मुदादि थे। वे जातियाँ पर्वतीय क्षेत्र में निवास करती थी। इस समय भी वे पर्वतीय हैं। मैदान में आकर रहती है परन्तु वे अपवाद कही जायेंगी। तक्षक नाग की राजधानी तक्षशिला थी। वह पर्वतीय अंचल में पड़ता है। खाण्डव वन दाह का एक सरल अर्थ है। वह इन्द्रप्रस्थ के समीप रहने वाली नाग जाति को उद्वासित कर उसे आर्य स्थान सुरक्षा की दृष्टि से परिणत करना था। महाभारत काल में पाण्डव अपनी राजधानी के समीपस्थ अंचलो में इसी जाति को रखना चाहते थे जो उनके अनुकूल थी। राजा जनमेजय के नाग यज्ञ का एक और अर्थ है। तक्षक राज के कारण जनमेजय के पिता परी- क्षित की मृत्यु हुई थी। प्रतिहिंसा की इस भावना से प्रेरित होकर जनमेजय ने नाग यज्ञ किया था। उन्हें यह भी भय था कि नाग जाति पुनः सर उठाकर राज्य के लिए खतरा उत्पन्न कर सकती थी। एतदर्थ नाग यज्ञ अर्थात् नाग जाति के संहार का निश्चय जनमेजय ने किया था। अतएव नाग मानव थे। मानव प्राणी थे। उनमें और आर्यों में विवाह सम्बन्ध था। उन्हें विषधर सर्प मान लेना मूढ़ता होगी। नाग कश्मीर के मूल निवासी थे। नाग लोगों ने पिशाच तथा आर्य जातियों के प्रवेश का कश्मीर में स्वागत नहीं किया। प्रश्न उपस्थित होता है। कश्मीर में आर्यों अथवा पिशाचों इन में किसका रहना नागा जाति पसन्द करती थी। नाग जाति पिशाचों को नापसन्द करती थी। पिशाच उनके पड़ोसी