राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 840, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंनीलमत पुराण से निम्नलिखित बातें मालूम होती हैं : (१) कश्यप नाग, पिशाच, दैत्य, दानव एवं गरुड़ के पूर्व पुरुष थे । (२) गरुड़ तथा नाग में शत्रुता थी । गरुड़ नागो का विनाश कर देता परन्तु विष्णु के हस्तक्षेप के कारण नागों की रक्षा हुई । गरुड़ विष्णु का वाहन बना और शेष नाग भगवान् की शय्या हुए । (३) कश्मीर के मूल निवासी नाग थे । उनसे पिशाचों से मेल नहीं था । परन्तु मानव एवं पिशाचों में जब चुनना पड़ा तो वे मानव के साथ रहने के लिये तत्पर हो गये । (४) प्रारम्भ में नाग तथा पिशाच में शत्रुता थी । कालान्तर में नाग तथा पिशाचों में मेल हो गया था । नागराज नील के यहाँ चन्द्रदेव जब गये थे तो पिशाचराज निकुम्भ ने उनका आदर सत्कार किया था । नील ने निकुम्भ तथा पिशाच पूजा का विधान किया था । (५) नागराज नील ने काश्मीर उपत्यका में मानवो का स्वागत किया था । (६) नीलमत के नाग वर्णन में फण के अतिरिक्त और कोई विशेष बात मानवों से नागो में नही थी । उनके विष आदि का कहीं वर्णन नही किया गया है । (७) नागाओं का नाम पुराकालीन वीरों के सदृश मिलता है । (८) नाग पूजा कश्मीर की धर्मप्रथा का मुख्य अंग था । मत्स्य पुराण में नाग वर्ग में अनेक जातियों का उल्लेख मिलता है : प्रयुज्यंते गिरिशयशोविसारिणं प्रकीर्णकं बहुतरनागजातयः ॥ ४ : ६४२ बौद्ध साहित्य में मुर्चालिद नाग का उल्लेख आता है। मुख्यत' जातको, यथा शंखपाल तथा मणिकण्ठ जातक में नाग जातिका उल्लेख मिलता है । संखपाल नाग भविष्य पुराण के अनुसार क्षत्रिय था । उसका जाति चिन्ह छत्र था । उल्लेख मिलता है कि शाक्य मुनि ने नागो को दार्शनिक तथा धार्मिक अधिक उपदेश दिया था । उन्होने भगवान् बुद्ध के उपदेशों को ग्रहण किया था । (शंखपाल जातक मणि कंठ जातक ) एक तिब्बती वर्णन के आधार पर यह प्रकट होता है कि पर्वतीय स्थानों में निवासित नागा जाति को भगवान् बुद्ध ने उपदेश देने के लिये बुलाया था । उसीसे यह भी प्रकट होता है कि गरीब नाग अमीर हो गये थे । उन्होंने भूसम्पत्ति लिया था । पाली साहित्य से ज्ञात होता है कि उत्तर भारत में भगवान् बुद्ध के अनेक नागराज वंश थे । ( श्री आर. एन. मेहता ) ( श्री बुद्धिस्ट इण्डिया ) भगवान् बुद्ध के जीवन से भी नाग वंशो राजाओ का निकट सम्पर्क महावंश के द्वारा प्रकट होता है । भगवान् बुद्धत्व प्राप्ति के पाँचवें वर्ष जेतवन में विहार करते थे । उस समय महोदर तथा चूलोदर दो मामा भानजा नागो को मणिमय सिंहासन प्राप्ति हेतु संग्राम में सदल उपस्थित देखा । उस समय उन पर अनुकम्पा करने के लिये भगवान् ने नाग द्वीप मे प्रवेश किया । उस समय नागराज महोदर समुद्र के नाग भवन में निवास करता था । उसकी कनिष्ठ भगिनी कर्णवर्धमान पर्वत के नागराज से ब्याही गयी थी । चूलोदर उसका पुत्र था । उसका नाना मणिमय सिंहासन देकर मर गया । यह पर्वत निवासी नाग महाऋद्धिमान थे । ( महावंश १ : ४५-५१ ) नागे मनुष्य थे । मानव थे । उनका राज्य था । यह बात महावंश स्पष्ट करता है । यह देवता पूर्व जन्म में इसी भाग द्वीप में मनुष्य था । ( महावंश : १ : ५४-५६ ) एक मत है कि यह नाग द्वीप श्री लंका का उत्तर पश्चिमोय अंचल था । ५