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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

नीलमत पुराण से निम्नलिखित बातें मालूम होती हैं : (१) कश्यप नाग, पिशाच, दैत्य, दानव एवं गरुड़ के पूर्व पुरुष थे । (२) गरुड़ तथा नाग में शत्रुता थी । गरुड़ नागो का विनाश कर देता परन्तु विष्णु के हस्तक्षेप के कारण नागों की रक्षा हुई । गरुड़ विष्णु का वाहन बना और शेष नाग भगवान् की शय्या हुए । (३) कश्मीर के मूल निवासी नाग थे । उनसे पिशाचों से मेल नहीं था । परन्तु मानव एवं पिशाचों में जब चुनना पड़ा तो वे मानव के साथ रहने के लिये तत्पर हो गये । (४) प्रारम्भ में नाग तथा पिशाच में शत्रुता थी । कालान्तर में नाग तथा पिशाचों में मेल हो गया था । नागराज नील के यहाँ चन्द्रदेव जब गये थे तो पिशाचराज निकुम्भ ने उनका आदर सत्कार किया था । नील ने निकुम्भ तथा पिशाच पूजा का विधान किया था । (५) नागराज नील ने काश्मीर उपत्यका में मानवो का स्वागत किया था । (६) नीलमत के नाग वर्णन में फण के अतिरिक्त और कोई विशेष बात मानवों से नागो में नही थी । उनके विष आदि का कहीं वर्णन नही किया गया है । (७) नागाओं का नाम पुराकालीन वीरों के सदृश मिलता है । (८) नाग पूजा कश्मीर की धर्मप्रथा का मुख्य अंग था । मत्स्य पुराण में नाग वर्ग में अनेक जातियों का उल्लेख मिलता है : प्रयुज्यंते गिरिशयशोविसारिणं प्रकीर्णकं बहुतरनागजातयः ॥ ४ : ६४२ बौद्ध साहित्य में मुर्चालिद नाग का उल्लेख आता है। मुख्यत' जातको, यथा शंखपाल तथा मणिकण्ठ जातक में नाग जातिका उल्लेख मिलता है । संखपाल नाग भविष्य पुराण के अनुसार क्षत्रिय था । उसका जाति चिन्ह छत्र था । उल्लेख मिलता है कि शाक्य मुनि ने नागो को दार्शनिक तथा धार्मिक अधिक उपदेश दिया था । उन्होने भगवान् बुद्ध के उपदेशों को ग्रहण किया था । (शंखपाल जातक मणि कंठ जातक ) एक तिब्बती वर्णन के आधार पर यह प्रकट होता है कि पर्वतीय स्थानों में निवासित नागा जाति को भगवान् बुद्ध ने उपदेश देने के लिये बुलाया था । उसीसे यह भी प्रकट होता है कि गरीब नाग अमीर हो गये थे । उन्होंने भूसम्पत्ति लिया था । पाली साहित्य से ज्ञात होता है कि उत्तर भारत में भगवान् बुद्ध के अनेक नागराज वंश थे । ( श्री आर. एन. मेहता ) ( श्री बुद्धिस्ट इण्डिया ) भगवान् बुद्ध के जीवन से भी नाग वंशो राजाओ का निकट सम्पर्क महावंश के द्वारा प्रकट होता है । भगवान् बुद्धत्व प्राप्ति के पाँचवें वर्ष जेतवन में विहार करते थे । उस समय महोदर तथा चूलोदर दो मामा भानजा नागो को मणिमय सिंहासन प्राप्ति हेतु संग्राम में सदल उपस्थित देखा । उस समय उन पर अनुकम्पा करने के लिये भगवान् ने नाग द्वीप मे प्रवेश किया । उस समय नागराज महोदर समुद्र के नाग भवन में निवास करता था । उसकी कनिष्ठ भगिनी कर्णवर्धमान पर्वत के नागराज से ब्याही गयी थी । चूलोदर उसका पुत्र था । उसका नाना मणिमय सिंहासन देकर मर गया । यह पर्वत निवासी नाग महाऋद्धिमान थे । ( महावंश १ : ४५-५१ ) नागे मनुष्य थे । मानव थे । उनका राज्य था । यह बात महावंश स्पष्ट करता है । यह देवता पूर्व जन्म में इसी भाग द्वीप में मनुष्य था । ( महावंश : १ : ५४-५६ ) एक मत है कि यह नाग द्वीप श्री लंका का उत्तर पश्चिमोय अंचल था । ५

३४ राजतरंगिणी महावंश में नाग जाति के कश्मीर में रहने का उल्लेख मिलता है—'उस समय कश्मीर-गान्धार देश में बड़ी दिव्य शक्ति वाला अरवाल नाम का एक क्रूर राजा रहता था। वह समस्त पकी फसल ओला और वर्षा कर समुद्र में डाल देता था। उस समय मज्झत्तिक स्थविर आकाश मार्ग से वहाँ आये—उन्होंने धर्म का उपदेश दिया। तत्पश्चात् नागराज ने और हिमालय प्रदेश के चौरासी हजार नागों, बहुत गन्धर्वों, यक्षो तथा कूष्माण्डो ने शरण तथा शील धारण किया। कश्मीर और गन्धार के निवासी मनुष्य नागराजा को पूजने के लिये आये—उस समय से लेकर अब भी कश्मीर और गन्धार देश काषाय से प्रकाशित और त्रिग्न परायण हैं। (महावंश १२ : ९ : २८) जिस स्थान पर भगवान् का नागद्वीप में लंका के उतरना कहा जाता है उस स्थान पर जम्बूकोल विहार तथा तिष्य महाविहार निर्माण किये गये थे। नग्न द्वीप तथा नाग द्वीप विभिन्न द्वीप थे। कही कही भ्रम में लेखकों ने उन्हें एक समझ लिया है। उक्त उद्धरण से दो बातें प्रकट होती है। नागराज की कथा जलोद्भव असुर से मिलती है तथा नाग जाति तथा काश्मीर के मनुष्यो किंवा आर्य वंश वालो से मेल हो गया था। निष्कर्ष निकलता है। वैदिक आर्यो के पूर्व नाग जाति कश्मीर तथा उत्तर भारत के पर्वतीय भूभाग में निवास करती थी। उनका निवास-स्थान हिमालय पर्वतीय खण्ड किंवा प्रखण्ड थे। यदि वे मैदानों में कभी रहते भी थे तो आर्यों के आने पर वे पर्वतीय क्षेत्रों में चले जाते थे। वह कोई नयी बात नही है। मुस्लिम आक्रमण के समय नेपाल में राणा, हिमालय में आबाद महाराष्ट्र तथा राजपूत लोग मुसलमानों के आगमन तथा उनके आक्रमणो से त्रस्त होकर हिमालय के पर्वतीय भागों में सुरक्षा निमित्त चले गये। नाग जाति को आर्यों के आगमन पर एक नवीन बली जाति के धर्म, संस्कृति, सभ्यता तथा विचारों का सामना करना पड़ा। अतएव रक्षा निमित्त वे हिमालय के पर्वतीय भागों में चले गये। हिमालयीय क्षेत्र में नाग जाति के रहने का एक और कारण हो सकता है। असम किंवा नागालैंड में नाग जाति पर्वतीय क्षेत्र में रहती है। शक जाति कश्यप गोत्रीय थी। कास्पियन सागर अर्थात् कश्यप सागर के आस- पास इनका निवास स्थान था। अतएव पुराणों में शक के साथ नाग जाति को रखा गया है। कश्यप की पत्नी कद्रू की जिन सन्तानो का उल्लेख ऊपर किया गया है वे दानव, खश, मुदादि थे। वे जातियाँ पर्वतीय क्षेत्र में निवास करती थी। इस समय भी वे पर्वतीय हैं। मैदान में आकर रहती है परन्तु वे अपवाद कही जायेंगी। तक्षक नाग की राजधानी तक्षशिला थी। वह पर्वतीय अंचल में पड़ता है। खाण्डव वन दाह का एक सरल अर्थ है। वह इन्द्रप्रस्थ के समीप रहने वाली नाग जाति को उद्वासित कर उसे आर्य स्थान सुरक्षा की दृष्टि से परिणत करना था। महाभारत काल में पाण्डव अपनी राजधानी के समीपस्थ अंचलो में इसी जाति को रखना चाहते थे जो उनके अनुकूल थी। राजा जनमेजय के नाग यज्ञ का एक और अर्थ है। तक्षक राज के कारण जनमेजय के पिता परी- क्षित की मृत्यु हुई थी। प्रतिहिंसा की इस भावना से प्रेरित होकर जनमेजय ने नाग यज्ञ किया था। उन्हें यह भी भय था कि नाग जाति पुनः सर उठाकर राज्य के लिए खतरा उत्पन्न कर सकती थी। एतदर्थ नाग यज्ञ अर्थात् नाग जाति के संहार का निश्चय जनमेजय ने किया था। अतएव नाग मानव थे। मानव प्राणी थे। उनमें और आर्यों में विवाह सम्बन्ध था। उन्हें विषधर सर्प मान लेना मूढ़ता होगी। नाग कश्मीर के मूल निवासी थे। नाग लोगों ने पिशाच तथा आर्य जातियों के प्रवेश का कश्मीर में स्वागत नहीं किया। प्रश्न उपस्थित होता है। कश्मीर में आर्यों अथवा पिशाचों इन में किसका रहना नागा जाति पसन्द करती थी। नाग जाति पिशाचों को नापसन्द करती थी। पिशाच उनके पड़ोसी

परिशिष्ट घ ३५ थे। पिशाच उत्तरी पंजाब एवं त्रिगर्त के पर्वतीय क्षेत्रों में रहते थे। अतएव नागों से किसी बात पर पिशाचों का वैमनस्य होना स्वाभाविक था। आर्य अधिक सहिष्णु तथा उदार थे। कश्मीर के लिए नवीन थे। अत- एवं उन्होंने पिशाचों की अपेक्षा आर्यों के साथ रहना अधिक पसन्द किया। आर्य कश्मीर में आने लगे तो नागों ने उन्हें कश्मीर में बसने की स्वीकृति दे। उनके साथ अपने पड़ोसी पिशाचों की अपेक्षा अधिक हिल-मिल गये। मानवों के उपनिवेशों का स्वागत किया। यहां मानव का अर्थ मनुवंशजों किंवा आर्यों से लेना चाहिए। कश्मीर में मूल निवासी नाग थे। कालान्तर में पिशाचों ने कश्मीर में प्रवेश किया। अन्त में मानव लोगों का कश्मीर में प्रवेश हुआ। ये आज भी कश्मीर में आबाद हैं। कश्मीरियों के वेशभूषा, रंग-रूप तथा मानवाकृति में क्षेत्र की भिन्नता के अनुसार भिन्नता मिलने का यही कारण है। नाग जाति भारत तथा अफगानिस्तान आदि पश्चिमोत्तर क्षेत्रों के निवासी थे। श्री ग्रियर्सन का सुझाव कि वे हुँजा के निवासी थे कहना कठिन है। हुंजा प्राचीन हुंस द्वार है इस पर भी अभी विद्वानों में मतभेद है। महाभारत में नाग तीर्थ का उल्लेख दो स्थलों पर आया है। दोनों का उल्लेख वन पर्व में है। प्रथम नाग तीर्थ कुरुक्षेत्र की सीमा पर स्थित था। द्वितीय गंगद्वार तथा कनखल के समीप नागराज कपिल का स्थान था। इस तीर्थ में स्नान करने पर सहस्र कपिला गोदान का पुण्य प्राप्त होता है। (वन पर्व ८३:१४, ८४,३३) वर्णन मिलता है। तृतीय शताब्दी तक शक पूर्वोत्तर प्रदेश तक फैल गये थे। वे गंगा के दक्षिण तट से लेकर सरयू की घाटी तक विस्तृत थे। जैन ग्रन्थों से प्रतीत होता है कि पाटलीपुत्र के मुरुण्डों के अधीन था। सिंहासन बत्तीसा जैन ग्रन्थ से मालूम होता है कि कान्यकुब्ज मुरुण्डों के अधीन था। मुरुण्ड कौन थे यह प्रश्न उठता है। प्रयाग के समुद्र गुप्त के शिला लेख में मुरुण्ड का उल्लेख मिलता है। मुरुण्डों का स्थान लम्पक किंवा लघ- मान था। प्रयाग के स्तम्भ से प्रकट होता है। समुद्र गुप्त के प्रभुत्व को शक स्वीकार करते थे। चन्द्रगुप्त द्वितीय ने शक क्षत्रपों का राज्य समाप्त किया था। मथुरा में शक राजाओं के काल में जैन तथा बौद्ध धर्म विकसित हुआ था। कनकलेरा अभिलेख से पता चलता है कि शक जाति कुशाणों के समान महासेन अर्थात् कार्तिकेय की पूजा करती थी। कार्तिकेय को स्कन्द भी कहते हैं। समुद्रगुप्त के नाम के साथ देव पुत्र शाही शाहानुशाही की उपाधि अभिलेखों में प्रयुक्त की गयी है। इस उपाधि का मूल शक पर- म्परा है। नाग पूजा अत्यन्त प्राचीन काल से प्रचलित है। नाग पूजक शिवभक्त होते हैं। शिव का आभूषण नाग है। इस रूपक का यह अर्थ निकलता है कि, शिव के नाग भक्त थे। शैव थे। शिव उपासक थे। पुरा- तन शैवधर्म किंवा मत का भूषण नाग जाति थी। शिव मत की अनुयायी थी। नाग, भूत, प्रेत, पिशाच आदि जातियां शिव उपासक थीं। उन्हें शिव के अनुचरों के रूप में प्रकट किया गया है। कालान्तर में नाग, पिशाच आदि जातियों के मूलरूप को लोग भूल गये होंगे। किसी अतीत गाथा अथवा रूप के आधार पर उन्हें अनु- चर मान लिया गया। इस रूपक को सत्य मानकर शिव की मूर्ति की कल्पना उसी आधार पर की गयी होगी। शिव का मानव आकार किंवा मूर्ति नागादि से मण्डित कर दी गयी। नागेश्वर नाम से शंकर के अवतार की कल्पना की गयी। दारुक राक्षस को शंकर ने मारा था। शिव को नागनाथ कहा जाने लगा। (शिव शतक रुद्र- संहिता ४२।) नागनाथ का उपलिंग भूतेश्वर रूप में पूजा जाने लगा। (शिव कोटि रुद्र संहिता ४ : १)।

३६ राजतरंगिणी नागेश्वर नागनाथ आदि नाम भगवान् शंकर के रखे गये । उनका शाब्दिक अर्थ होता है नागों के ईश्वर अर्थात् राजा । इसी प्रकार नागनाथ का अर्थ होता है नाग जाति के स्वामी । प्रकट होता है कि राक्षस तथा नाग जाति में संघर्ष हुआ था । उस संघर्ष में नागेश्वर अर्थात् नागा के राजा जिन्हें सम्भवतः कालान्तर में शंकर का अवतार मान लिया गया होगा । दक्षिण में बहुत लोग शिवाजी महाराज को शिव का अवतार मानते नहीं हिचकते । कुछ इसी प्रकार की बात पुराकाल में हुई होगी । राक्षस पिशाच तथा नाग तीनो जातियाँ हिमा- लय की पर्वतीय जातियां थी । उनमें युद्ध हुआ होगा । राक्षस तथा नागजाति के युद्ध में नागजाति विजयी हुई थी । उसके नेता नागेश्वर थे । नागेश्वर को उनकी वीरता किंवा अपने जाति के नेता किंवा उद्धारक होने के कारण अनेक गाथाएँ तथा आख्यायिकाएँ उनके सम्बन्ध में बन गयी होंगी । कुछ शताब्दियों पश्चात् विशिष्ट गुणो के कारण नागा जाति ने अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित करने के लिए उन्हें अवतार मान लिया । नाग देवो की मूर्तिया बनायी जाती थी । नाग मूर्तियो किंवा प्रतिमाओ की विशेषता यह होती थी कि कटि से अधोभाग नाग की पूंछ का रूप होता था । अर्थात् कटि से नीचे का हिस्सा सर्प तुल्य तथा वाटि से ऊपर अर्थात् ऊर्ध्व भाग मनुष्य का होता था । यदि नागिन हुई तो उसमे स्त्री आकार नारी या होता था उसे कंकण, भुजबन्ध, माला आदि स्त्रीजनोचित आभूषण द्वारा आभूषित किया जाता था । यदि नाग किंवा पुरुष देवता हुए तो यज्ञोपवीत, मुकुट, कण्ठहार आदि से अलंकृत किया जाता था । छत्र के स्थान पर फैला फण होता है। इस प्रकार की पूर्वकालीन पाषाण मूर्तियां प्राय. खण्डित बहुत मिलती है। मुस्लिम काल में मन्दिरो तथा मूर्तियो के नष्ट करने के उत्साह में उन्हे खण्डित कर फेंक दिया गया । आधुनिक काल की मूर्तियो में केवल नाग किंवा सर्प का रूप बना मिलता है । कालिय नाग की मूर्तियां निस्संदह मध्य तथा वर्तमान युग में अधोभाग नाग तथा ऊर्ध्वभाग मनुष्य रूप में मिलती है । यहो पर एक दूसरी मूर्ति शयनावस्था में है । मूर्ति का अधोभाग नाग तथा कटि से ऊपर का पुरुष का है । मस्तक के पृष्ठभाग के ७ फण उठे शिरोभाग की रक्षा कर रहे हैं । कानोंमें कुण्डल हैं, स्कन्ध प्रदेश पर यज्ञोपवीत है । मस्तक पर मुकुट तथा कण्ठ में मुक्तामाला है । कोनार्क मन्दिर भुवनेश्वर (उड़ीसा) में नाग की विभिन्न प्रकार की मूर्तियां खुदी लगी है । किन्तु सब का कटि से नीचे अधोभाग नाग की पूंछ तथा ऊर्ध्वभाग मनुष्य का है । महाबलीपुरम में चट्टान पर किरातार्जुन की गाथा मूर्तियों में उत्कीर्ण है । उनमें तपस्वी, यक्ष, गन्धर्व के साथ अनेक देवी देवता दिखाये गये हैं । वहाँ चट्टानो की बीच में एक गहरा स्थान ऊपर से नीचे तक गया है । वह दोनो चट्टानो को एक प्रकार से अलग करता है । उसी धंसे हुए अथवा गलियारे जैसे स्थान में नाग मूर्ति ऊपरसे नीचे तक खोदी गयी है। उसका कटि प्रदेश अधोभाग सर्प तथा ऊपरी मनुष्याकृति हैं। मस्तक पर फण की छाया है । वह मूर्ति सन् ६४८-६७५ की कृति है । इससे स्पष्ट होता है कि नाग पूजा समस्त भारतवर्ष में कश्मीर से लेकर धुर दक्षिण तक प्रचलित थी । अफगानिस्तान में एक बहुत बड़ा वर्ग है वह अपने को पुरातन नाग वंशीय मानता है । इस प्रकार भारत के पश्चिम अफगानिस्तान अर्थात् आर्याना से लेकर पूर्व भाग प्रदेश तक नाग पूजा का महत्त्व था । एक बहुत बड़ा वर्ग नाग जाति किंवा वेष से अपनी वंश परम्परा जोड़ता था । एक काल था जब मनुष्येतर प्राणियों में मनुष्यो की कल्पना की गयी थी । मत्स्य अवतार की कथा तथा भगवान् का मत्स्य रूप इसी प्रकार दिखाया गया है । अधोभाग मत्स्य तथा ऊर्ध्वभाग मनुष्य का है । नरसिंह अवतार में यह कल्पना उलट दी गयी । अधोभाग मनुष्य तथा ऊर्ध्वभाग सिंह का दिखाया गया है ।

परिशिष्ट घ ३७

मत्स्य तथा नरसिंह दोनों अवतार माने गये हैं। उन्हें मान्यता दी गयी है। नाग भगवान् का रूप नहीं हो सकता। उसे भगवान् की शय्या अर्थात् शेषशय्या कहा गया है। नाग को आर्य देवता विष्णु से निम्न स्थान अर्थात् उनकी शय्या के रूप में चित्रित किया गया है। कालान्तर में इस विषय पर विवाद चला होगा। अतएव मध्य का मार्ग निकालकर नाग तथा मनुष्य दोनों के मिश्रित रूप की कल्पना नरसिंह तथा मत्स्याव- तारों की तरह की गयी। अनन्त नाग को मनुष्य तथा नाग का मिश्रित आकार देकर उन्हें भगवान् का रूप दे दिया गया। उनका अधोभाग नाग और ऊर्ध्वभाग मनुष्य का बनाया गया। सिन्धु सभ्यता काल में नाग पूजा प्रचलित थी। मोहेंजोदारो की सील से प्रगट होता है कि फणधर नाग के पृष्ठ भाग में दो उपासक खड़े हैं। उनसे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि सिन्धु-सभ्यता काल में नागों का तथा उनकी पूजा का महत्त्व था। हरप्पा में प्राप्य संग्रह में नाग के सम्मुख बैठ कर पूजा करते लोगों की आकृतियाँ मिली हैं। भारत के अतिरिक्त अन्य देशों में नाग पूजा अत्यन्त प्रचलित थी। ईरान, एशिया माइनर, मिश्र, अबीसीनिया, यूनान, इटली, उत्तरो पश्चिमी यूरोप, मेक्सिको, पेरू, संयुक्त राष्ट्र अमेरिका, चीन, जापान तथा श्री लंका में नाग पूजा प्रचलित थी। अत्यन्त प्राचीन लुप्त जाति कोनोशिया तथा मिश्र का नाग दैवी प्रतीक था। पेरू तथा मेक्सिको के प्राचीन मन्दिरों पर नाग मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। उत्तरी अमेरिका के आदम कन्ट्री तथा ओहियो में १००० लम्बी मिट्टी की बनी नाग मूर्ति मिली है। केल्ट जाति में नाग सम्बन्धित अनेक गाथायें प्रचलित हैं। चीन में नाग पूजा के लिए मन्दिरों का निर्माण किया गया है। जापान में नाग का रूप भगवान् की आत्मा का द्योतक माना जाता रहा है। बाइबिल वर्णित सिनाई एपिदोरस तथा जरमेशिया लोगों के कुटियो में नाग स्वास्थ्य तथा सौभाग्य का प्रतीक माना जाता था। अरब, यूनान, रोम, यहूदी, अमेरिका, रेड इण्डियन, चोगा तथा एनिप्रेस जाति में सर्पदंश के स्थान पर नाग को मार कर उसकी मज्जा तथा मांस लगाया जाता था। उसका मांस भी खिलाया जाता था। विश्वास था कि सर्पदंश से व्यथित व्यक्ति इस प्रकार आरोग्य प्राप्त करता था। सीरिया (अमरदेश) तथा मिश्र में नाग Wisdom गुण का देवता माना जाता था। फरोहा के शरीर पर नाग तथा गरुड़ दोनों की देवतुल्य मूर्तियाँ मिलती हैं। हेब्रो अथवा चाल्डियन जाति की गाथाओं में नाग के सम्बन्ध की अनेक गाथाएं मिलती हैं। नाग को सूर्य का वंशज मानते थे। उसके फण को अपने गोत्र का चिह्न मानते थे। कृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता बलराम जी के विषय में कथा है कि उनमें नाग रक्त का अंश था। महाभारत की कथा के अनुसार वासुकी नाग ने अपने बहिन का विवाह जरत्कारु ऋषि से किया था। विरूपाक्ष गण नाग कहे गये हैं। नहुष देवता के शाप से नाग हो गये थे। अर्थात् उन्हें जाति च्युत कर दिया गया था। बात यहीं तक नहीं समाप्त होती। मैं लिख चुका हूँ कि मथुरा अर्थात् ब्रज मण्डल के समीप नाग जाति का प्रभुत्व था। इस जाति की आबादी थी। भगवान् श्री कृष्ण को भी भारतीय विद्वानों का एक प्रवल मत नाग वंशीय कहता है। कालिय नाग के मारने की गाथा इससे सम्बन्धित की जा सकती है कालिय नाग जो वास्तव में नागवंशीय जाति का शक्तिशाली व्यक्ति था। कृष्ण की स्पर्धा करता था। कृष्ण ने उसे मारकर यमुना उपत्यका को कालिय नाग के अत्याचार से मुक्त किया था। यह कथा पुराणों में तोड़-

३८ राजतरंगिणी मटोर कर लिखी गयी है। कृष्ण के समय जबसे कश्मीर का इतिहास प्रारम्भ होता है नाग जाति का प्रभाव राजनैतिक तथा सामाजिक क्षेत्र में पाया जाता है। पुराणो से ज्ञात होता है। नाग वंशी नरेश विदिशा, पद्मावती, मथुरा एवं कांतिपुर में राज्य करते थे। गुप्त वंश के उत्थान के पूर्व एवं कुषाण राज्य के अन्तिम चरण में विभिन्न राजवंशों का शासन उत्तर एवं मध्य भारत में था। दूसरी तथा चौथी शताब्दी के अन्तर्गत नागो का उत्तर भारत में राज्य समृद्धि पर था। वाकाटक एवं गुप्त वंशी अभिलेखों एवं मथुरा के समीपवर्ती भूखण्ड से प्राप्त मुद्राओं के अध्ययन से नाग वंश के राजाओं तथा उनके विभिन्न स्थानों पर प्रकाश पड़ता है। उनसे प्रकट होता है। ईशा पूर्व प्रथम शती से चौथी शताब्दी तक उत्तर भारत में नाग वंश राज्य करता था। वाकाटक के अभि- लेखो में नाग के लिये भारशिव शब्द प्रयुक्त किया गया है। पूना ताम्र पत्र से ज्ञात होता है कि भारत सम्राट् द्वितीय चन्द्रगुप्त के समय नागवंश से सम्बन्ध था। चंपक ताम्र पत्र से ज्ञात होता है कि वाकाटक राजा भारशिव महाराज भव नाग का दौहित्र था। उस लेख से ज्ञात है कि नागराजा भवनाग शिवलिंग को मूर्धा पर रखता था। शिव का भार वहन करने के कारण 'भारशिव' नामकरण हो गया था। नागवंश विदिशा से लेकर कांतिपुर, उत्तरप्रदेश तक शासन करता था। वायु पुराण से प्रकट होता है कि पद्मावती में नव नाग शासन करते थे। मुद्राओ के अभिलेखो से दश नाग राजाओ के काल पर प्रकाश पडता है। उनमे विभु नाग, भीम नाग, देव नाग, व्याघ्र नाग आदि का नाम मुद्राओ से ज्ञात होता है। गणपति तथा नागसेन का नाम प्रयाग के स्तम्भ पर अंकित है। हर्षचरित में भी नागसेन का उल्लेख मिलता है। नागसेन को समुद्रगुप्त ने पराजित किया था। पद्मावती नाग शाखा का वह अंतिम राजा था। पद्मावती के नाग राजाओ में भव नाग का विस्तृत इतिहास ज्ञात है। उसका राज्य काल सन् ३०५-३४० के मध्य था। उसकी कन्या का विवाह वाकाटक युवराज गौतमौपुत्र से हुआ था। मथुरा में नाग मुद्रायें दो वर्गों की मिली है। राजाओं के नामांत में 'मित्र' शब्द है जैसे गोमित्र, सूर्य्यमित्र, विष्णुमित्रादि। वे मुद्रायें ईशा पूर्व प्रथम शती की है। द्वितीय प्रकार की मुद्राओं पर राजाओं का नामाग्त 'दत्त' शब्द से यथा-पुरुषदत्त, उत्तमदत्त, रामदत्त आदि से होता है। वे मथुरा के शक राजाओं के समकालीन थे। द्वितीय शताब्दी में नाग वंश राजाओं की स्वतन्त्र स्थिति ज्ञात होती है। उनका राज्य बुंदेलखण्ड तथा वाराणसी तक विस्तृत दिखाई देता है। कुषाण राजाओं की अवनति के साथ नाग राजाओं की उन्नति होने लगी थी। प्रथम नाग सम्राट् वीरसेन अन्तिम कुषाण तथा क्षत्री राजाओ को पराजित किया था। उसकी मुद्रायें उत्तर प्रदेश तथा पंजाब में प्राप्त होती है। मध्य चौथी शताब्दी में गुप्त सम्राट् समुद्रगुप्त ने उत्तरी भारत में नाग राज गणपति नाग तथा नाग- सेन को पराजित किया था। नागो से मैत्री सम्बन्ध स्थापित करने के लिये समुद्रगुप्त ने द्वितीय चन्द्रगुप्त का विवाह नागकन्या कुबेरनाग से किया था। उससे उत्पन्न राजकुमारी प्रभावती गुप्ता का विवाह वाकाटक नरेश रुद्रसेन से हुआ था। पाँचवी शताब्दी के एक लेख से पता लगता है कि शर्व नाग सम्राट् स्कन्दगुप्त के काल में अतर्वेद के किसी अंचल का सामन्त था। मेरे निवासस्थान दशाश्वमेघ-घाट वाराणसी का नामकरण वाकाटक अभि- लेख से पता चलता है कि नाग भारशिव ने कुषाणों को नष्टकर वहाँ दश अश्वमेघ यज्ञ कराया था।

परिशिष्ट घ ३९ तैत्तिरीय ब्राह्मण में नागपूजा का वर्णन मिलता है : ये दो रोचने दिवो ये वासूर्य रश्मिपु । येषामप्सु सदः कृते तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः ॥ काण्ड ४ : प्रपाठक २ अनुवाद ८ महाभारत मे नागपूजा के विषय में विस्तार के साथ उल्लेख किया गया है । ( वनः८२ : १११३; ८३ : १४ द्रोण : २०२ : ७३; कर्ण : ५७ : ७० ) नीलमत पुराण में नाग पूजा के सम्बन्ध में निम्नलिखित उल्लेख के अतिरिक्त और भी श्लोक संख्या 16, 182, 400, 670, 845, 849, में मिलते है । फणावलीरत्नसहस्रचित्रे शेषस्य भोगे विमले विशेपे । लोकस्य सर्वस्य तु चिन्तयानः शुभाशुभं रक्ष ममाद्यदेव ॥ 64 = १०२, १०३ × × × भक्ष्यमाणेषु नागेषु गरुडेन महात्मना । वासुकिः शरणं प्रायाद् देवदेवं जनार्दनम् । 59 = ९७ × × सतोदेशे च ये नागा वत्स्यन्ति महाबलाः । तेषां राज्ये महाभाग त्वं नीलमभिषेचय ॥ 69 = १०९ × × × मक्तानुसम्प्री भक्तश्च देवदेवे जनार्दने । तस्यातिदयितश्चासि यथा नाग स वासुकिः = 355 = ४५८ × × × भागस्य यस्य ये स्थाने निवसिष्यन्ति मानवाः । ते तं संम्पूजयिष्यन्ति पुष्पधूपानुलेपनैः ॥ = 216 = २८९ × × × मम पूजा च कर्तव्या स्नानं नागस्य चाप्यथ । फलपत्रे प्रदातव्ये नगे मेरुद्भवे तथा ॥ 462 = ५८१ इरावते तु यः पूजां करोति मम काश्यप ॥ इरापुष्पैर्भृशं तेन तुष्टिर्मेऽपि प्रजायते ॥ 678 = ८०२, ८०३ × × × पञ्चमी द्वादशी चैव पूर्णमामी तथैव च । सर्वेषामेव नागानां यात्राकर्माणि पूजिता ॥ 845 = १०१६, १०१७ × × ×

४० राजतरंगिणी चतुर्दशेऽहनि कर्तव्यं विशाखानां च पूजनम् । पञ्चदशेऽहनि कर्तव्यं स्थाननागस्य पूजनम् । ४।१ = १०२०, १०२१ भारत-बर्मा की सीमा पर नागवासुकी मठ था । उस मठमें नाग वासुकी की मूर्ति थी । उनका शरीर मनुष्य किन्तु मुख फणाकार भयंकर सर्प का था । उसके सम्मुख नरों की बलि दी जाती थी । दक्षिण पूर्व एशिया के इतिहास में नाग जाति का मुख्य स्थान है। कश्मीर के समान आर्यों के प्रवेश के पूर्व वहाँ नाग जाति रहती थी । कम्बुज अर्थात् कम्बोडिया के विषय में चीनी गाथा है—लगभग दो सहस्र वर्ष पूर्व कम्बुज निवासी नंगे रहते थे । शरीर पर गुदना गुदवाते थे । नौकरों तथा सम्बन्धियों को मार कर मृतक शव के साथ कब्रमें गाड देते थे । स्त्री एव पुरुषों में लज्जा का अभाव था । उन का जीवन अरण्यवासी था । वहाँ धर्म एवं मानवीय विचार उत्पन्न नहीं हुए थे । कौण्डिन्य भारतवासी थे । सोम वंशी ब्राह्मण थे । वे जहाज द्वारा कम्बुज उत्तर आये । यहाँ की रानी का नाम सोमा था । वह नाग कन्या थी । चम्बा चम्पा अर्थात् वीतनाम के आलेख में उसका नाम नागिन दिया गया है । कौण्डिन्य का जहाज लूटने सोमा आयी । संघर्ष में सोमा ने आत्म समर्पण कर दिया । कौण्डिन्य की विजय हुई । राजकन्या सोमा के साथ कौण्डिन्य ने विवाह कर लिया । उन्होंने राज्य स्थापित किया । भारतीय संस्कृति तथा सभ्यता फैलायी । उनके नाम पर देश का नाम कम्बुज पड़ा । भवपुर में अपनी राजधानी स्थापित की । जनता को वस्त्र पहनना सिखाया । अक्षर ज्ञान कराया । उसके वंशजों ने २ शताब्दी तक राज्य किया । उस वंश का अन्तिम राजा वनपण था । एक दूसरी गाथा है । इन्द्रप्रस्थ के राजा आदित्य थे। अपने एक पुत्र से अप्रसन्न हो गये । उसे राज्य से निर्वासित कर दिया । वह कम्बुज आया । कम्बुज में उस समय चम्पा का एक राजा राज्य करता था । राजा को उसने मार भगाया । एक दिन समुद्र तट पर 'नामो' अर्थात् एक नाग कन्या से भेंट हुई । दोनों में अनुराग हो गया । नागी का पिता नाग राजा था । उसका नागी से विवाह हो गया । उसने अपने राज्य की राजधानी इन्द्रप्रस्थपुर अर्थात् वर्तमान एंगकोर बनाया । तमिल काव्य में एक नगर नागपुरम् का वर्णन मिलता है । वह जावा में था । यहाँ के राजा इन्द्रवंशीय भूमिवन्द्र तथा पुत्रराज थे । नागो गाथा कांची के पल्लवो में प्रचलित है। द्रोण के पुत्र अश्वस्थामा ने नामो कन्या से विवाह किया था । उनकी सन्तानें स्कन्दशिष्य नाम से विख्यात हुईं । ये पल्लवो के पूर्वज थे । नवी शताब्दी के शिला- लेख से प्रकट होता है । उत्तरी आरकट से इसका शिलालेख मिला है । उसके अनुसार विरूपाक्ष ने एक नागी से विवाह किया था । उसमें उसे राजचिन्ह मिला । तत्पश्चात् स्कन्द शिव आए । नाग जाति के सम्बन्ध में एक कथा प्रचलित है। विश्व के आदि काल में केंग काग ( शेषनाग ) थे । एक पुरुष तथा स्त्री भी थे । भारतीय गाथा के अनुसार महाप्रलय के पश्चात् शेषशायी विष्णु तथा लक्ष्मी शेष रह जाती है । उक्त पुरुष अम्बर का व्यापार करने के लिए पर्यटन आरम्भ किया। उसकी स्त्री का नाम 'री' था । बच्चा का नाम 'एल' था । एकदिन 'री' जंगल में लकड़ी काटने गयी । उसकी कुल्हाड़ी अकस्मात् नाग पर

पड़ी । नाग ने कुल्हाड़ी ले ली । री ने अनुनय विनय किया । नाग इस शर्त पर कुल्हाड़ी वापस करने के लिए तैयार हुआ कि री उसके साथ विहार करेगी । री ने शर्त मान ली । उनकी सन्तान नाग जाति कहलाई । कम्बुज में विवाह के समय वर तथा कन्या को राजा तथा नागिन का अभिनय करना पड़ता है । चारों ओर बान्धव बैठते हैं । एक तस्तरी में जलती मोमबत्ती आती है। बैठे लोग एक दूसरे को थाली पास करते हैं । नागिन देवी का गीत गान होता है । दक्षिण तथा मध्य भारत में नाग वंश, नागजाति तथा उनके सबल राज्यों का उल्लेख चौदहवीं शताब्दी तक मिलता है । सेन्द्रक वंश का राज्य बम्बई से मैसूर तक मिले भूखण्ड पर पांचवी शताब्दी से ७ वीं शताब्दी तक फैला था । प्रथम ये कदम्ब तत्पश्चात् पश्चिमी चालुक्य वातापी के नियन्त्रण मे थे । ये अपने को भुजेन्द्र वंशीय कहते थे । दक्षिण में सिन्द का राज्य १० वीं से १२ वीं शताब्दी तक कायम रहा । उनकी तीन शाखाएँ मगल- कोट के सिन्द येलगबर्गी के सिन्द तथा एलपुरम के सिन्द हो गयी थी । मध्यप्रदेश स्थित बस्तर के राजा कश्यप गोत्रीय छिन्दक वंश के नाग जातीय राजा थे । उनकी राजधानी वारसुरू अर्थात् वर्तमान बरसर स्थान है । इस राज्य का सन् १३२४ ई० तक ऐतिहासिक अस्तित्व मिलता है। इसी प्रकार बेल्लारी का नाग वंश तथा जाति प्रसिद्ध हैं ।

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परिशिष्ट 'च' ४३ के लिए तैयार नहीं हो रहा था। मुझे धोती चट्टी नंगे सर देखकर कौतूहल के कारण ग्रामीण यहां एकत्र हो गये थे। हाजी साहब तथा गाँव वाले उसे समझाने लगे। मार्ग मे एक घुडसवार गुलाम मुहम्मद शाह साकिन मथवादा मिले। हम कुछ दूर तक चले थे। वे कभी आगे और कभी पीछे रुक जाते थे। कभी आगे निकल जाते थे। हमारी कार उनके टट्टू से भी मन्द गति से चल रही थी। वे मेवे के व्यापारी थे। एक जगह उन्हें हमने रुका देखा। मध्याह्न काल था। व्यवहार पटु थे। तुरन्त अपने लडकों से नाक मंगाया। वे इतने मीठे तथा रसदार थे कि हाथों से नाक काटते ही रस चूने लगा। निकटवर्ती एक वृक्ष से उनका लडका नाक तोड रहा था। उन्होने बड़े मुहब्बत तथा आत्मीयता के साथ हमें अपना मेहमान बना लिया। हमें भूख और प्यास दोनों लगी थी। इस समय नाक अमृत फल प्रतीत हुआ। उनकी बहुत शुक्रिया अदा किया। हमारा उद्देश्य जानकर उन्होंने अपने पुत्र अली मुहम्मद शाह को साथ कर दिया। वह ब्रिजवरारी तथा 'भेदा देवी' का स्थान जानता था। वह सहर्ष तैयार हो गया। उसमें युवक जन्य उत्साह था। उसमें मानवीय समवेदना थी। सड़क बहुत खराब थी। पत्थर के टुकड़े सड़क में पड़े थे। पत्थरो को हटाकर बार- बार चढ़ना-उतरना पड़ता था। अली मुहम्मद पत्थरों को उठाकर रास्ता बनाते पैदल चलने लगा। उसे इस काम में जैसे अद्भुत रस मिलता था। बेलरमाशपुर मे हाजी साहब तथा अली मुहम्मद के प्रयास से काफी किराया देने पर खच्चर ठीक हो गया। शर्त ठहरी। थापमी मे केवल एक मील खच्चर हमें पहुँचाकर लौट जायेगा। शेष मार्ग पैदल वापस आना होगा। कोई दूसरा उपाय नही था। विवश होकर तैयार होना पड़ा। जंगली सड़क भेदगिर अर्थात् गंगोदभेद तीर्थ तक जाती है। जिप गाड़ी वहाँ अभी नहीं पहुँच पाती। मार्ग में मीलो दूर पीछे रह जाती है। विरानो नदी की उपत्यका से चलना पड़ता है। कुछ दूर चलने पर गाँव नहीं मिलते। केवल गूजरो के लकड़ी के बने मकान यत्र-तत्र मिलते हैं। गूजर गाय, भेड़ तथा बकरी पालते हैं। बड़े परिश्रमी होते हैं। उनका जीवन संकट तथा तूफानों के बीच गुजरता है। गूजरो के मकान नहीं होते। जंगली लकड़ियों की शहतीर काट लेते हैं। उन्हें चारों ओर खड़ाकर द्वार विहीन घोंखुटा, तीन तरफ से बन्द स्थान कोठरीनुमा बना लेते हैं। छत लट्ठे से पाटकर उस पर मिट्टी रख देते हैं। मिट्टी पर घास जम जाती है। मिट्टी और घास के कारण वर्षा काल में जल कोठरी में चूता नही। इस प्रकार वर्षा से रक्षा कर लेते हैं। एक ही कोठरी में पशु, घास तथा स्वयं रहने की व्यवस्था करते हैं। मक्का की रोटी और दूध अथवा मक्का की रोटी मिर्च लगाकर खाते हैं। उपत्यका देवदार के वृक्षों से भरी है। सरिता जल कल-कल करता चिर गीत गाता, प्रवाहित रहता है। आदि काल से उपत्यका वह गीत सुनती आई है। प्रलय काल तक सुनती रहेगी। इस गीत को सुनते न तो उपत्यका थकी है और न गाने वाला प्रवाह कभी गतिहीन हुआ है। उपत्यका की हरियाली, शान्त निस्तब्ध वातावरण, उत्तुंग मंदिराकार देवदार तरुओं का चुपचाप प्रकृतिक़ी सुन्दरता निरखते-निरखते शता- ब्दियों तक खड़े रहना। फिर गिर जाना। फिर अपने आप उगना। यह क्रम विश्व के इस कोने में जारी है। जारी रहेगा। मनुष्य इन निरीह वृक्षों का अपने लिए नाश कर उनकी ज्योति में अपना घर उजाला करने का प्रयास करेंगे। अनेक विचार आते-जाते हृदय पर विचित्र प्रभाव डालते थे। उपत्यका के दोनो पाशर्वो में ऊँचे पहाड़ हैं। उनकी ढालों पर कहीं-कहीं गूजरों के आवास हैं। उपत्यका में जहाँ कही झुको समतलभूमि मिल गयी थी उन्होंने कुछ खेती कर ली गयी थी। मेरी यात्रा के समय गूजरों

४४ राजतरंगिणी के प्राय. निवास-स्थान खाली पड़े थे । अक्तूबर मास के पश्चात् शीत एवं तुषार पात आरम्भ हो जाता है । उससे बचने और ढोरों की रक्षा करने के हेतु पूरी गृहस्थी खच्चरों पर लादकर ढोरों के साथ गरम स्थान अर्थात् श्रीनगर की तरफ चल देते हैं । वहाँ से जम्मू प्रदेश की तरफ जहाँ बरफ नहीं गिरती डाल लेते हैं । मुझे इस नीरव स्थान में, प्रकृति की इस गम्भीर अभिरामता में, भयंकरता का बोध हो रहा था । कुछ आगे बढ़ने पर ढोल बजने की आवाज सुनाई पड़ने लगी । मन एक बार कबीले वालों का स्मरण कर कांप उठा । कबीलों के सम्बन्ध में अनेक क्रूर गाथाऐं सुन रखा था । उनसे सम्बन्धित अमानुषी कहानियाँ पढ़ चुका था । मैं हिन्दू था । शताब्दियों पूर्व गूजरों की जाति हिन्दू थी । किन्तु आज बात उल्टी थी । सभ्यता की किरण यहाँ तक नहीं पहुँच सकी थी । साहस केवल इसलिए था कि हमारे अश्वी मुहम्मद तथा खच्चर वाले दोनों मुसलमान थे । उन पर अविश्वास करने का मुझे कारण नहीं दिखाई पड़ा । तथापि बस्ती से सहस्रों मील दूर, इस एकाकी स्थान में, यदि कोई मुझे मार दे, मेरा सामान, रुपया-पैसा छीन ले तो मैं ऐसी अवस्था में क्या कर सकूँगा ? विचार आते ही सिहर गया । बहुत दुनिया घूम चुका था । प्राय: अकेला ही घूमा था । अपने जीवन में कुछ और करना बाकी नहीं था । मैने खच्चर को चाबुक लगाया । आगे बढ़ता चला गया । कुछ दूर चलने पर देखता हूँ कि दो व्यक्ति ढोल बजा रहे थे । और लगभग पचास गूजर एक साथ पंक्तिबद्ध घास काट रहे थे । उनके हाथों में चमकती हुंतिया थी । ये इतनी धारदार थीं कि दूर से ही चमक रही थी । वे काटते आगे बढ़ते जाते थे । ढोल वाला व्यक्ति पंक्ति के एक भाग में एक छोर से ढोल बजाता हुआ दूसरे छोर तक आता और पुनः बजाते हुए पहले छोर तक लौट जाता था । यह पंक्ति के पृष्ठ भाग में आता और जाता था । वे हमें देखकर और उत्साह से ढोल बजाने लगे । उपत्यका ढोलों की गम्भीर ध्वनि एवं उसकी प्रतिध्वनि से मुझे भयावनी लगने लगी । किन्तु घास काटने वालों पर उसकी प्रतिक्रिया भिन्न होती थी । उनमें उत्साह उत्पन्न होता था । एक ही काम करते रहने वाली नीरसता दूर होती थी । हाथ तेजी से चलते थे । वे घास काटते पीठ के पीछे जमीन पर डाली की तरह जुट्टों में रखते, खिसकते आगे बढ़ते थे । जैसे जैसे भेदा देवी का स्थान समीप आता गया जंगल गम्भीर होता गया । देवदार तथा चीड़ के वृक्षों की आवलिया घनी होने लगी । भूमि पर वृक्षों की सघनता के कारण सूर्य की किरणें पड़ना कठिन हो रहा था । कुछ दूर और आगे बढ़ने पर पुनः घास का एक छोटा मैदान मिला । यहां भी गूजर ढोल बजाकर घास काट रहे थे । पूछने पर मालूम हुआ कि जिन गूजरों की जीविका उपत्यका में उपजे मक्का की फसल पर निर्भर थी, वे अपने ढोरों सहित शीत ऋतु में भी खेतों पर रह जाते हैं । तुषार किंवा हिमपात के समय घास नहीं रह जाती । वृक्षों में हरी पत्ती नहीं दिखाई देती । पतझड जैसा दृश्य उपस्थित हो जाता है । गूजर तथा स्थानीय कृषक घासों का बण्डल अपने आवास में रख लेते हैं । एक ही कोठरी में घास, पशु तथा अपने कुटुम्ब के साथ रहते हैं । यह जीवन बड़ा कठिन है । उनके शरीर पर पड़े वस्त्रों से दुर्गन्धि निकलती है । वे मैले रहते हैं । दाढ़ी तथा बाल बड़े हो जाते हैं । इस समय भी मैने जितने गूजरों को देखा सबकी दाढ़ी लम्बी, बाल लम्बे तथा सर पर कुल्लहड़ के ऊपर पगड़ी थी । वे काबुली पठान जैसे लगते थे । केवल रंग कुछ पठानों से झांवरा था । ढोरों के साथ रात-दिन रहते रहते उनके आचार-विचार पर पशु जीवन का प्रभाव दिखाई पड़ता था । सरिता की धारा के दोनों पार्श्व में पगडण्डी है । वाम तटीय मार्ग से चलना अच्छा होगा । मार्ग में

परिशिष्ट 'घ' ४५ बहुत घना जंगल है । यहां के वन की लकड़ियां किंवा वनों के घन का उपयोग अभी तक नहीं हो रहा है । कल्हण ने मार्ग को भेदा वनपथ कहा है । यह विरानी उपत्यका कही जाती है । मालूम होता है कि यहां आने का मार्ग उस समय सुगम नहीं था । श्रीवर ने जैनराज तरगिणी (४:४९२) में भी भेदा वनपथ का उल्लेख किया है । महाभारत वनपर्व (८४ : ६५) में गंगोद्‌भेद तीर्थ का उल्लेख है । इस तीर्थ में तीन रात्रि उपवास करने वाले व्यक्तियों को वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है । वह सदा सर्वदा के लिए ब्रह्मभूत हो जाता है । मार्ग में बड़े-बड़े मोटे देवदार के वृक्ष टूटकर गिरे थे । सरिता की धारा के मध्य वृक्ष धराशायी थे । जल, धूप, वायु, वर्षा, ऋतुओं का थपेड़ा खाते शताब्दियों से वे अपनी काया बिखेरते पड़े थे । इतना घना जंगल आस्ट्रेलिया के पश्चात् मैंने यहीं देखा था । वृक्ष स्वतः गिरते हैं । स्वतः उगते हैं । सहस्रो वर्षों से निरन्तर यह क्रम अबाधगति से चला आ रहा है । इन गिरे वृक्षों में कहीं-कहीं गूजर लोग अग्नि लगा देते हैं । जंगल में जहां सलाई नहीं मिलती वहां अग्नि जीवित रखने का यह बड़ा अच्छा तरीका है । एक बार आग बुझ जाने पर पाच-सात मील चलकर दूसरे गांव से अग्नि लानी पडती है । अग्नि धराशायी वृक्ष के मूल में गोझला बनाकर रख देते हैं । वृक्ष की यह आग वर्षों सुलगती रहती है । अग्नि के लिए वृक्ष का अग्निवाला भाग नीचे कर देने हैं । बून्दें उनमें पड़ती नहीं । इस प्रकार वर्षा मे अग्नि की रक्षा हो जाती है । शीत से बचने तथा अग्नि के उपयोग का अच्छा तरीका ढूंढ निकाला गया था । चलते हुए हम अचानक एक पहाड़ी के मूल में पहुँच गये । पृष्ठ भाग में उत्तुंग हिमाच्छादित शिखर था । तीन तरफ हरित पर्वतमाला थी और सम्मुख विरानी अर्थात् उपत्यका थी । यहा के गूजर अपनी कोठरी शीत ऋतु प्रारम्भ होने के कारण छोड़कर चले गये थे । दो एक गूजर जलौनी लकड़ी काट रहे थे । वे मक्का की फसल काटकर जाना चाहते थे । इस उपत्यका में शाली की कृषि का अभाव था । यह उपत्यका कश्मीर की अन्य उपत्यकाओं से सौन्दर्य में कम नहीं है । गुलमर्ग जैसा विशाल मैदान नहीं मिलता । किन्तु मार्ग में छोटे मैदान कई स्थानों पर मिले । उपत्यका की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ के पर्वत सूखे नहीं हैं । हरे भरे वृक्षों से लदे एवं भरे हैं । चारो ओर हरियाली दिखाई देती है । देव- दार के वृक्षों का घना वन मीलों छाया करता चला जाता है । सूर्य के दर्शन कठिनता से मिलते हैं । भेदगिरी पहाड़ी के मूल में पहुँचा । खच्चरवाले ने कहा ! हम पहुँच गये । अब लौटना चाहिए । मैने कहा । यह स्थान वह नही है जहां हम आना चाहते थे । उसने सरिता में मिलता एक नाग अर्थात् सोता दिखाकर कहा था । यहो नाग था । मैं उस नाग के पास गया जल में गन्धक की गन्ध थी । टट्टू वाला हुज्जत करने लगा । उसने कहा । इसी गन्धक पानी के लिए लोग यहा आते थे । वह क्या जाने । मै देव- स्थान देखने आया था । जिसे लोग भूल चुके थे । स्टीन ने इसका वर्णन किया था । उसे मैने पढा था । अतएव मैं स्वीकार करने के लिए तैयार नही था कि यह वही स्थान था । मैने उसे और आगे चलने के लिए कहा । पहाड़ी पर एक गूजर की कोठरी थी । हमलोग ऊपर चढ़ गये । खच्चरवाला उस कोठरी में पहुँचा । हम भी पीछे-पीछे गये । दूध पीने के लिए वहां के गूजर ने कहा । गूजरों की गन्दगी देखकर दूध पीने का साहस नहीं हुआ ।

४६ राजतरंगिणी

उस गूजर से मालूम हुआ । पहाड़ी पर एक और नाग है । उसका नाम क्या है । कैसा है । यह बता नही सका । हम लोग खच्चर को छोड़कर पहाड़ी पर चढे । यह पहाड़ी आसपास की भूमि तल से ७५ फिट से कुछ ऊपर ऊँची है । इसके तीन ओर सरिता की धारा बहती है । एक तरफ ढालुआ भूमि है । उसी ढाल से चढ़कर भेदा देवी किंवा गगोद्‌भेद तीर्थ पर पहुँचे । कल्हण ने स्थान की संज्ञा भेडगिर नाम से दी है । तीर्थ का नाम गंगोद्‌भेद कहा है । भेडगिरी, भेदगिर, भैट, ब्राडू, एक ही शब्द के विभिन्न अपभ्रंश है । स्तीन इस स्थान पर सन् १८९५ मे आये थे । उस समय कश्मीर का ब्राह्मण वर्ग तथा अन्य हिन्दू इस तीर्थ को भूल गये थे । यह तीर्थ लुप्त हो गया था । स्तीन ने इसे पुन शारदा तीर्थ तुल्य खोज निकाला है । दूसरी भेदा देवी की स्थापना तथा मार्ग दुर्गम होने के कारण यहा को यात्रा बन्द हो गयी है । मार्ग कष्टसाध्य तथा खतरे से खाली न होने के कारण लोग आना पसन्द नही करते । यहा के रहने वाले गूजरो से मैने पूछा । कभी कोई व्यक्ति या पर्यटक उनकी जानकारी मे यहा आया था ? उन्होने उत्तर दिया । उनकी जानकारी मे कोई नही आया था । उन्हें लगभग ४० या ५० वर्षों की बातें अच्छी तरह याद थी । हमने शंका की । शायद कोई आया हो । उन्होने विश्वास के साथ कहा । ऐसा हो नही सक्ता । हम लोग स्थान छोड़कर कभी हटे नही । स्तीन को अपनी यात्रा के समय इसी प्रकार का अनुभव हुआ था । बुद्धार में उन्हें खैरा नामक ७५ वर्षीय गूजर से मुलाकात हुई थी । वह यहा पर ४० वर्षों से रहता था । उसने स्तीन को बताया था कि उसकी युवावस्था में कभी-कभी ब्राह्मण यहा पर आते थे । स्नान करने के पश्चात् श्राद्ध करते थे । कालान्तर में ब्राह्मणो का आना दुर्लभ हो गया । पाकिस्तान तथा हिन्दुस्तान के बीच कश्मीरी संघर्ष के समय सैनिको द्वारा विभिन्न पथों, जंगलों तथा दरों की खोज हुई । यहाँ भी कुछ लोग आये थे । कुछ दिन पहले मार्ग साफ करते एक जिप आई थी । शायद सड़कों की पैमाइश की बात थी । उसे भी हुए तीन वर्ष बीत चुके थे । सम्भव है राज्य सरकार यहाँ तक शीघ्र ही सड़क बनवाये ।

परिशिष्ट 'च' ४७

मोचनी एक सरिता जिसका नाम 'अभया' होगा निकलेगी । वह अनवरत प्रवाहित रहेगी । वह पहाड़ी के ढाल से उछलती नीचे नहीं बहेगी । मैने इसे सत्य देखा । सरोवर से कुछ नीचे जल निकलता दिखायी पड़ता है । वहाँ चरणामृत लिया जाता है । उसी स्थान पर जल पुनः पहाड़ी में समाविष्ट हो जाता है । उसका पता नहीं चलता । नीचे जहाँ जल प्रवाह है वहाँ उपरोक्त गन्धक का स्रोत मिलता है । इस शांतस्थान को जल शुद्ध रखने के लिए गूज़रों ने शिलाखण्डों से ढंक दिया था । देवी सरस्वती ने यह भी भविष्यवाणी की थी कि प्रत्येक मास के तृतीयांश में ही जलधारा प्रवा- हित रहेगी । शेष समय में गंगा स्वर्ग में बहती रहेगी । देवी ने ऋषि से वर माँगने के लिए कहा । ऋषि ने वर माँगा । जल सदा सर्वदा एक रूप प्रवाहित होता रहे । देवी ने वर स्वीकार किया । पुलस्त्य के पास जल निरन्तर बहता रहा । गंगोद्भेद तीर्थ प्रकाश में आया । देवी के दर्शन निमित्त ऋषि पुलस्त्य ने पुनः एक सहस्र वर्ष तक तपस्या की । देवी सरस्वती ने राजहंसी के रूप में ऋषि को दर्शन दिया । ऋषि ने देवी की पूजा चैत्र शुक्ल अष्टमी तथा नवमी को की । देवी ने ६ प्रकृतियों का वर्णन ऋषि से किया । छओ प्रकृतियो के भेदों का वर्णन करने के कारण देवी का नाम ऋषि ने भेद रखा । देवी की पूजा हंस वागेश्वरी भेदा रूप से चैत्र शुक्ल चतुर्दशी तथा पूर्णमासी को होने लगी । गंगोद्भेद माहात्म्य भेदा देवी का उल्लेख करते हुए गोवर्धन धर विष्णु का वर्णन करता है । वह एक आश्चर्यजनक प्राकृतिक अलौकिक थान का वर्णन करता है । गोवर्धनधर के १२५ हस्त दूरी तक कभी तुषारपात नही होता (श्लोक ० ७५, ८७, ८९, ९९, १०३९ ) । उसी स्थान में ऋषि निमित्त थौजस यम की मूर्ति स्थापित हुई । यम की पूजा माघ कृष्ण अर्थात् आश्वयुज १४ होने का विधान निर्धारित किया गया । माहात्म्य यहाँ रामाश्रम, रामुष, सप्त ऋषि आश्रम, वैतरणी नदी आदि तीर्थों का उल्लेख करता है । उनकी यात्रा गंगोद्भेद तीर्थ यात्रा के समय करनी चाहिए । नीलमत पुराण गंगोद्भेद तीर्थ के संदर्भ में भेदा देवी का उल्लेख करता है । नीलमत पुराण अमा- वस्या के दिन, आश्वयुज, नारायण अर्थात् गोवर्धनधर से देवस्थान, रामतीर्थ अर्थात् रामाश्रम, सप्तऋषि तथा वैतरणी का उल्लेख करता है । (नील० 1312-1319) उक्त स्थानो में रामुष स्थान जिसका वर्णन कल्हण ने राजतरंगिणी मे किया है । श्रीनगर सुपियान सड़क पर रामुह ग्राम है (रा० त० २:५५; ८ : २८१३ ) । आइने अकबरी में अबुलफजल वर्णन करता है कि शुकरोह के पास एक नीची पहाड़ी है । उसके शिखर पर एक जल-स्रोत है । वह पूरे वर्ष भर चलता रहता है । इस पर्वत के बाहु मूल पर तुषारपात नहीं होता । शुकरोह अर्थात् वर्तमान शूकरु रामुह से दक्षिण दिशा में मिलता है । वह नाम भेदा गिरि के लिए आइने अकबरी में आया है । (आइने अकबरी : २ : ३६२ ) भेदगिरि पहुँचने पर परिश्रम सार्थक समझा । मार्ग की थकान दूर हो गयी । वहाँ चुपचाप बैठने में एक अभूतपूर्व आनन्द का अनुभव हो रहा था । उस अनुभव का वर्णन करना कठिन है । उसका सम्बन्ध केवल कायिक किंवा इन्द्रियगम्य सुख से नहीं अपितु आत्मा से जैसे था । भेदगिरि शिखर चारों तरफ के स्थानों से ऊँचा है । स्टीन की गणना के अनुसार उत्तर-पूर्व उसे

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परिशिष्ट च ५१ वर का जल निरन्तर ताजा तथा स्वच्छ बना रहता है। शुद्धता बनी रहती है। यदि सरोवर साफ कर दिया जाय तो जल में और शुद्धता आ जायेगी। मैं समझता हूँ कि सरोवर का जीर्णोद्धार लगभग छह सौ वर्षों से नहीं हुआ होगा। सम्भव है कभी किसी धर्मप्राण व्यक्ति ने सरोवर को साफ करा दिया हो। सबसे आश्चर्यजनक बात जल के न जमने तथा तुषार के न होने का वर्णन, कल्हण तथा नीलमत पुराण ने नही किया है। मालूम होता है। यह बात उस समय लोगों में इतनी प्रचलित तथा साधारण थी कि इसके वर्णन की आवश्यकता का अनुभव नही किया गया होगा। यहाँ पर कोई विशाल भग्नावशेष अथवा कोई विशेष चामत्कारिक बात नही देखकर मेरे काश्मीरी मित्रों ने मुझसे पूछा। इस स्थान का इतना महत्त्व क्यों दिया गया? यहाँ आते समय मैं थी स्तीन का वर्णन ध्यानपूर्वक पढ़कर नही आया था। स्तीन द्वारा लिखित सब बातों का मुझे ज्ञान नही था। आधुनिक जगत् के लोग सर्वत्र कुछ आकर्षक, कुछ भव्य, कुछ तुरन्त प्रभावकर, वस्तुओं से प्रभावित होते हैं। मैने तुरन्त उत्तर दिया। यहाँ की सबसे बड़ी विशेषता यह है। यह पहाड़ी इस उपत्यका में तीनों तरफ के भूमि तल से ७० फीट ऊँची है। दक्षिण-पश्चिम की तरफ ढालू जमीन होती कम से कम ५० फीट तक नीची पहुँच गयी है। इसके तीन दिशाओं में सरिता का प्रबल प्रवाह है। सरिता का वेगशाली प्रवाह निर- न्तर एक रूप बहता चला जा रहा है। फिर भी जल नदी के जल स्तर से ७० फीट ऊँचाई पर कैसे पहुँच- कर निर्झर हो गया, यह वास्तव में प्रकृति की एक विचित्र लीला है। शिखर पर जहाँ सरोवर है, यह स्थान उपत्यका में सबसे ऊँचा है। उससे ऊँचा और कोई स्थान वहाँ पर नहीं है। इसके दक्षिण तथा वाम पार्श्व में ऊँचे पर्वत हैं। वाम पार्श्व का उत्तुंग पर्वत सरिता पार है, तो दूसरी ओर ढालू भूमि के छोर के पश्चात् पुनः ऊँचा पर्वत खड़ा है। इस प्रकार जल का इस शिखर पर पहुँचना उसी प्रकार हो रहा है, जैसे किसी नगर के पानी कल (वाटर वर्क्स) के लिए इंजन तथा पाइप द्वारा जल संग्रह हेतु ऊपर पहुँचाया जाता है। जहाँ भी शिखरों पर जल मिलता है, वहाँ या तो एकत्रित किया हुआ वर्षा जल रहता है, अथवा किसी उत्तुङ्ग शिखर से जलप्रपात का जल आता संग्रहीत हो जाता है। यहाँ दोनों बातें नहीं हैं। यह जल तो भेदगिर पर्वत के शिखर के मध्य स्थान में केवल ६० फीट वर्गाकार समतल भूमि में निकल रहा है। जैसे किसी शिखर पर किसी नगर के जल पूर्ति निमित्त टैंक का निर्माण कर उसमें जल भरा जा रहा था। जल सरोवर द्वार देश के नीचे से अभी तक प्रवाहित होता है। वह कुछ ही गजों के पश्चात् उसी पहाड़ी में लोप हो जाता है। पहाड़ी के नीचे जहाँ पुनः निर्झर निकलता है उसके जल में गन्धक की महक होती है। इस जल में गन्धक की गन्ध नहीं है। अतएव माहात्म्य तथा प्राचीन पुस्तकों में वर्णित जल के लुप्त होने की घटना यहाँ सच दिखायी पड़ती है। इस तीर्थ को यात्रा चैत्र शुक्ल में करने का माहात्म्य है। स्थान दुर्गम होने के कारण, समस्त जनता के मुसलमान हो जाने के कारण, यहां का महत्त्व कम हो गया है। यहाँ के महत्त्व में अधिक कमीका कारण हालमोगलपुर में नवीन भेदा देवी की स्थापना है। वहाँ दर्शन करने का माहात्म्य मूल भेदादेवी के माहात्म्य

५२ राजतरंगिणी

तुल्य समझा जाने लगा है। सोलहवीं शताब्दी तक इस तीर्थ का अवश्य महत्त्व रहा होगा। अग्यशः अबुल फजल इसका वर्णन नही करता । भेदा तीर्थ के अन्य स्थानों के विषय में कुछ कहना आवश्यक है। भेदागिरि की पहाड़ी को अग्नि दिशा मे कुछ दूर पर एक पहाड़ी १०० फीट ऊँची है । यहाँ गूजर रहते हैं। इस समय यहाँ कोई नही था । इस स्थान के मध्य में एक कुँवा डूबा था। वहाँ पकाई ईंटें तथा बेदौल इमारत बनाने के पत्थर बिगरे जमीन में मिले थे। यहा एक दीवाल का भग्नावशेष ईशान दिशा से नैर्ऋत्य दिशा तक ८० फीट तक फैला है। इस स्थान का स्तीन के मत से धर्मशाला अथवा यहाँ के रहने वाले पुरोहितों के आवास निमित्त निर्माण किया गया था। मुझे यहाँ केवल दीवाल का सूक्ष्म आभास मात्र मिला । पत्थर ईंटा उठाकर लोग अपने निवास स्थानों में लगा लिये हैं। गोवर्धनधर तथा यम ओजस देवस्थानों का पता स्तीन को लगा था। मेरे पास स्तीन जैसे साधन प्राप्त नही थे। यदि चाहता तो सरकारी मदद से साधन एकत्रित हो जाते, परन्तु अपनी न भागने वाली दुर्बलता का सर्वदा शिकार होता रहा हूँ। कष्ट उठा लेना मैने पसन्द किया है। परन्तु मुझ किसी के आगे किसी वस्तु के लिए न खुले यही इच्छा तथा कामना रही है। इसमे काम में कठिनाई होती है। परन्तु आत्मा सुखी रहती है। जो मेरे लिए सबसे बड़ा सुख है। मैं भी उनका पता लगाना भूल गया । कारण यह था कि सन्ध्या के पूर्व वहाँ से लौट जाना आवश्यक था । अन्यथा खतरा था। कही ठहरने का स्थान नही था । भोजन का महत्त्व मेरे जीवन में कभी नही था परन्तु अपने साथियो का ध्यान रखना आवश्यक था । इस स्थान से में एक मील तक खच्चर से आया । यहाँ से पैदल चलकर मेहल्लरमात्तपुर पहुँचा । वहा पर मोटर और मोटर ड्राइवर छोडकर आया था। जब गंगोद्भेद तीर्थ को लोग भूल गये थे तो छोटे-छोटे स्थानो तथा तीर्थों को स्मरण रखना कठिन था। हमे आशा है। इस दिशा मे कुछ प्रयास भविष्य में इतिहास लेखकगण करेंगे। नारायण नाग से भी मुझे यह स्थान अच्छा लगा । नारायण नाग में किंचित् भय का बोध पर्वत श्रृंखलाओ के अत्यन्त विशाल तथा ऊँचेपन और कंकनी नदी के धाराप्रवाह के गर्जन से होता है। भेदा देवी का स्थान शान्त है। सुरम्य हैं। भय का बोध नही होता । प्रकृति की सुषमा मे, गम्भीरता नही मनोहरता है। मन मे हलकेपन का बोध होता है। शरीर हल्का मालूम पडता है। दिमाग का बोझिल पन समाप्त हो जाता है। सरोवर के पास यदि मनुष्य बैठ जाय, तो पृष्ठभाग की ओर उसे नदी उछलती चौड़ी उपत्यका से आती दिखाई देगी । गंगोद्भेद पहाड़ी की जैसे परिक्रमा करती हुई चली जाती है । शिखर एक दीप-सा प्रतीत होता है । चारो ओर से पर्वतों का ढाल आता इस पहाड़ीके मूल में मानो समा जाता है। चारों ओर की पर्वतमालाएँ और नदी की उज्ज्वल जल धाराएँ बहती भेदागिरि की सीमा बना देती हैं। भेदादेवी गिरि के पृष्ठभाग में देवदार पूर्ण पर्वत और उसके ऊपर कुछ पीछे उठे दीपक तुल्य तुषार मण्डित शिखर हैं। वह जैसे दीपदान की थाली लिए चिरकाल से भेदादेवी की वन्दना कर रहे है। शिखर के सम्मुख लम्बी उपत्यका देवदार तथा चोड़ के हरे वृक्षों से भरी है। उनके मध्य नदी की धारा चुपचाप बहती चली जा रही है। इस धारा के दोनो ओर चलने की पगडंडिया हैं। मै धारा के वाम तट से आया था। उसके दक्षिण तट से लौट चला । दक्षिण तट का मार्ग वाम तट से सुगम है।

परिशिष्ट च ५३ इस शिखर के वाम पार्श्व से मार्ग राजौरी जाता है। द्रवगाम को पीर पन्तसाल पास से जोड़ता है। सामरिक दृष्टि से महत्त्व का स्थान है। रामपयार नदी की उपत्यका को यह मार्ग सम्बन्धित करता है। वहीं चरुता मार्ग पीरपन्तसल पास के मुख्य मार्ग से दुबजी के पास मिलता है। यदि गंगोद्भेद तीर्थ के विरानी उपत्यका का विकास किया जाय तो कश्मीर के सर्वश्रेष्ठ पर्वतीय दृश्यों में से वह एक होगा। यहां का वन मार्ग शोभनीय है। यहाँ आने पर एक प्रकार की शान्ति तथा मन में आध्या- त्मिक भावना का उदय होता है। यह देखकर मन गौरव से पुलकित हो जाता है कि हमारे पूर्वज कितने प्रकृति प्रेमी थे। मानव के आध्यात्मिक विकास के लिए किस प्रकार सुरम्य स्थानों का प्रकृति के गोद में चयन किया था।

परिशिष्ट 'छ' कुरु ( तरंग १:५१: पृष्ठ ९५ ) ऋग्वेद में कुरुओं का उल्लेख एक जाति के रूप में नहीं किया गया है। कुरुश्रवण नामक एक राजा ( १० ३३ ४ ) और राजा पाकस्थामन् कौरयाण का उल्लेख ( ८:३:२१ ) में किया गया है। अथर्ववेद ( २०:१२७ ) एव अग्रिम खिल ( ५ १० ) में कुरुओं के राजा परीक्षित का उल्लेख किया गया है। जिनके पुत्र जनमेजय शतपथ ब्राह्मण ( १३:५ ४, १३ ५.१.४ ) में अश्वमेध सम्पन्न करने वाले एक महान् राजा के रूप में वर्णित है। कुरुश्रवण जो कि नाम से कुरुओं से संवद्ध प्रतीत होता है त्रासद्दस्यव अर्थात् त्रसदस्यु का वंशज माना गया है। पुरूओ मे प्रसिद्धराजा । था ब्राह्मण साहित्य में कुरु जाति को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। कुरु पांचाल का नाम प्राय. एक साथ मिलता है ( जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण ३:७:६, ८:७, ४.७:२; वोपनिषीय उपनिषद् ४ १, काठक संहिता १०-६; वाजसनेयी संहिता ११:३:३) । शतपथ ब्राह्मण ( १:७:- २८ ) में कुरुपंचाली यज्ञ प्रणाली सर्वश्रेष्ट कही गयी है। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार ( ३:२:३१५ ) कुरु- पांचाल वाणी का निवास स्थान था। तैत्तिरीय ब्राह्मण ( १:८:४:१-२ ) से प्रकट होता है कि उनके राजा हिम काल में आक्रमण करते थे। ग्रीष्म काल आते ही लौट जाते थे। उपनिषदो में कुरुपांचाल के ब्राह्मणों की अत्यन्त प्रशंसा की गयी है । ( जैमिनीय ब्राह्मण २:७८; जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण ३:३०:६, ४ १:२ ) । ब्राह्मण एवं उपनिषद् काल में कुरु-पाचाल प्रसिद्ध थे। इसी क्षेत्र में भारतीय पुरा कालीन ग्रन्थों की रचनायें विशेष रूप से हुई थी । कुरुजनपद के विशद इतिहास का वर्णन पुराणों एवं महाभारत में मिलता है। उनका प्रारम्भिक इतिहास कौरवो के इतिहास का अंग है। कालान्तर में वे कौरवों के नाम से प्रसिद्ध हुए । रामायण में अयोध्या काण्ड ( ९१:१९ ) में कुरु का सर्वप्रथम उल्लेख आया है। भरद्वाज ने भरत के सत्कार निमित्त जिन वस्तुओं का आयोजन किया था, उसमें उत्तर कुरु के विषय में कहते हैं—उत्तर कुरु वर्ष में दिव्य चैत्ररथ वन है। वहाँ दिव्य वस्त्र एवं आभूषण वृक्षो के पत्र-पुष्प हैं। दिव्य नारियाँ उन वृक्षों में फल हैं। कुबेर का वह शाश्वत वन यहाँ आ जाए।' रामचन्द्र सीता से चित्रकूट की प्राकृतिक शोभा की तुलना करते हुए कहते है—उत्तर कुरु की शोभा भी चित्रकूट के आगे तुच्छ है। ( अयोध्या काण्ड ९४.२६: ) कबन्ध ने सीता के अन्वेषण निमित्त पश्चिम दिशा के वर्णन के समय उत्तर कुरु के वनों की उपमा दी है। ( अरण्यकाण्ड ७३:७: ) रामायण किष्किन्धा काण्ड ( सर्ग ४३:११, ५९ ) में कुरु का दो बार उल्लेख आया है। यहाँ पर श्लोक ११ में केवल कुरु शब्द तथा ५९ में उत्तर कुरु का उल्लेख है। स्पष्ट है रामायणकाल में दो कुरु प्रदेश थे। कुरु, जिसे कालान्तर में कुरुक्षेत्र कहा गया, तथा उत्तर कुरु हिमालय के पास था। उत्तर दिशा में सोम- गिरि के समीप था। गन्धर्व, किन्नर, सिद्ध, नाग, विद्याधर, आदि देशों के पश्चात् उत्तर कुरु से आगे जाने का