राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
DevanagariHindipublished984 पृष्ठ
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परिशिष्ट च ५३ इस शिखर के वाम पार्श्व से मार्ग राजौरी जाता है। द्रवगाम को पीर पन्तसाल पास से जोड़ता है। सामरिक दृष्टि से महत्त्व का स्थान है। रामपयार नदी की उपत्यका को यह मार्ग सम्बन्धित करता है। वहीं चरुता मार्ग पीरपन्तसल पास के मुख्य मार्ग से दुबजी के पास मिलता है। यदि गंगोद्भेद तीर्थ के विरानी उपत्यका का विकास किया जाय तो कश्मीर के सर्वश्रेष्ठ पर्वतीय दृश्यों में से वह एक होगा। यहां का वन मार्ग शोभनीय है। यहाँ आने पर एक प्रकार की शान्ति तथा मन में आध्या- त्मिक भावना का उदय होता है। यह देखकर मन गौरव से पुलकित हो जाता है कि हमारे पूर्वज कितने प्रकृति प्रेमी थे। मानव के आध्यात्मिक विकास के लिए किस प्रकार सुरम्य स्थानों का प्रकृति के गोद में चयन किया था।