भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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५२ राजतरंगिणी

तुल्य समझा जाने लगा है। सोलहवीं शताब्दी तक इस तीर्थ का अवश्य महत्त्व रहा होगा। अग्यशः अबुल फजल इसका वर्णन नही करता । भेदा तीर्थ के अन्य स्थानों के विषय में कुछ कहना आवश्यक है। भेदागिरि की पहाड़ी को अग्नि दिशा मे कुछ दूर पर एक पहाड़ी १०० फीट ऊँची है । यहाँ गूजर रहते हैं। इस समय यहाँ कोई नही था । इस स्थान के मध्य में एक कुँवा डूबा था। वहाँ पकाई ईंटें तथा बेदौल इमारत बनाने के पत्थर बिगरे जमीन में मिले थे। यहा एक दीवाल का भग्नावशेष ईशान दिशा से नैर्ऋत्य दिशा तक ८० फीट तक फैला है। इस स्थान का स्तीन के मत से धर्मशाला अथवा यहाँ के रहने वाले पुरोहितों के आवास निमित्त निर्माण किया गया था। मुझे यहाँ केवल दीवाल का सूक्ष्म आभास मात्र मिला । पत्थर ईंटा उठाकर लोग अपने निवास स्थानों में लगा लिये हैं। गोवर्धनधर तथा यम ओजस देवस्थानों का पता स्तीन को लगा था। मेरे पास स्तीन जैसे साधन प्राप्त नही थे। यदि चाहता तो सरकारी मदद से साधन एकत्रित हो जाते, परन्तु अपनी न भागने वाली दुर्बलता का सर्वदा शिकार होता रहा हूँ। कष्ट उठा लेना मैने पसन्द किया है। परन्तु मुझ किसी के आगे किसी वस्तु के लिए न खुले यही इच्छा तथा कामना रही है। इसमे काम में कठिनाई होती है। परन्तु आत्मा सुखी रहती है। जो मेरे लिए सबसे बड़ा सुख है। मैं भी उनका पता लगाना भूल गया । कारण यह था कि सन्ध्या के पूर्व वहाँ से लौट जाना आवश्यक था । अन्यथा खतरा था। कही ठहरने का स्थान नही था । भोजन का महत्त्व मेरे जीवन में कभी नही था परन्तु अपने साथियो का ध्यान रखना आवश्यक था । इस स्थान से में एक मील तक खच्चर से आया । यहाँ से पैदल चलकर मेहल्लरमात्तपुर पहुँचा । वहा पर मोटर और मोटर ड्राइवर छोडकर आया था। जब गंगोद्भेद तीर्थ को लोग भूल गये थे तो छोटे-छोटे स्थानो तथा तीर्थों को स्मरण रखना कठिन था। हमे आशा है। इस दिशा मे कुछ प्रयास भविष्य में इतिहास लेखकगण करेंगे। नारायण नाग से भी मुझे यह स्थान अच्छा लगा । नारायण नाग में किंचित् भय का बोध पर्वत श्रृंखलाओ के अत्यन्त विशाल तथा ऊँचेपन और कंकनी नदी के धाराप्रवाह के गर्जन से होता है। भेदा देवी का स्थान शान्त है। सुरम्य हैं। भय का बोध नही होता । प्रकृति की सुषमा मे, गम्भीरता नही मनोहरता है। मन मे हलकेपन का बोध होता है। शरीर हल्का मालूम पडता है। दिमाग का बोझिल पन समाप्त हो जाता है। सरोवर के पास यदि मनुष्य बैठ जाय, तो पृष्ठभाग की ओर उसे नदी उछलती चौड़ी उपत्यका से आती दिखाई देगी । गंगोद्भेद पहाड़ी की जैसे परिक्रमा करती हुई चली जाती है । शिखर एक दीप-सा प्रतीत होता है । चारो ओर से पर्वतों का ढाल आता इस पहाड़ीके मूल में मानो समा जाता है। चारों ओर की पर्वतमालाएँ और नदी की उज्ज्वल जल धाराएँ बहती भेदागिरि की सीमा बना देती हैं। भेदादेवी गिरि के पृष्ठभाग में देवदार पूर्ण पर्वत और उसके ऊपर कुछ पीछे उठे दीपक तुल्य तुषार मण्डित शिखर हैं। वह जैसे दीपदान की थाली लिए चिरकाल से भेदादेवी की वन्दना कर रहे है। शिखर के सम्मुख लम्बी उपत्यका देवदार तथा चोड़ के हरे वृक्षों से भरी है। उनके मध्य नदी की धारा चुपचाप बहती चली जा रही है। इस धारा के दोनो ओर चलने की पगडंडिया हैं। मै धारा के वाम तट से आया था। उसके दक्षिण तट से लौट चला । दक्षिण तट का मार्ग वाम तट से सुगम है।