राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट 'घ' ४५ बहुत घना जंगल है । यहां के वन की लकड़ियां किंवा वनों के घन का उपयोग अभी तक नहीं हो रहा है । कल्हण ने मार्ग को भेदा वनपथ कहा है । यह विरानी उपत्यका कही जाती है । मालूम होता है कि यहां आने का मार्ग उस समय सुगम नहीं था । श्रीवर ने जैनराज तरगिणी (४:४९२) में भी भेदा वनपथ का उल्लेख किया है । महाभारत वनपर्व (८४ : ६५) में गंगोद्भेद तीर्थ का उल्लेख है । इस तीर्थ में तीन रात्रि उपवास करने वाले व्यक्तियों को वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है । वह सदा सर्वदा के लिए ब्रह्मभूत हो जाता है । मार्ग में बड़े-बड़े मोटे देवदार के वृक्ष टूटकर गिरे थे । सरिता की धारा के मध्य वृक्ष धराशायी थे । जल, धूप, वायु, वर्षा, ऋतुओं का थपेड़ा खाते शताब्दियों से वे अपनी काया बिखेरते पड़े थे । इतना घना जंगल आस्ट्रेलिया के पश्चात् मैंने यहीं देखा था । वृक्ष स्वतः गिरते हैं । स्वतः उगते हैं । सहस्रो वर्षों से निरन्तर यह क्रम अबाधगति से चला आ रहा है । इन गिरे वृक्षों में कहीं-कहीं गूजर लोग अग्नि लगा देते हैं । जंगल में जहां सलाई नहीं मिलती वहां अग्नि जीवित रखने का यह बड़ा अच्छा तरीका है । एक बार आग बुझ जाने पर पाच-सात मील चलकर दूसरे गांव से अग्नि लानी पडती है । अग्नि धराशायी वृक्ष के मूल में गोझला बनाकर रख देते हैं । वृक्ष की यह आग वर्षों सुलगती रहती है । अग्नि के लिए वृक्ष का अग्निवाला भाग नीचे कर देने हैं । बून्दें उनमें पड़ती नहीं । इस प्रकार वर्षा मे अग्नि की रक्षा हो जाती है । शीत से बचने तथा अग्नि के उपयोग का अच्छा तरीका ढूंढ निकाला गया था । चलते हुए हम अचानक एक पहाड़ी के मूल में पहुँच गये । पृष्ठ भाग में उत्तुंग हिमाच्छादित शिखर था । तीन तरफ हरित पर्वतमाला थी और सम्मुख विरानी अर्थात् उपत्यका थी । यहा के गूजर अपनी कोठरी शीत ऋतु प्रारम्भ होने के कारण छोड़कर चले गये थे । दो एक गूजर जलौनी लकड़ी काट रहे थे । वे मक्का की फसल काटकर जाना चाहते थे । इस उपत्यका में शाली की कृषि का अभाव था । यह उपत्यका कश्मीर की अन्य उपत्यकाओं से सौन्दर्य में कम नहीं है । गुलमर्ग जैसा विशाल मैदान नहीं मिलता । किन्तु मार्ग में छोटे मैदान कई स्थानों पर मिले । उपत्यका की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ के पर्वत सूखे नहीं हैं । हरे भरे वृक्षों से लदे एवं भरे हैं । चारो ओर हरियाली दिखाई देती है । देव- दार के वृक्षों का घना वन मीलों छाया करता चला जाता है । सूर्य के दर्शन कठिनता से मिलते हैं । भेदगिरी पहाड़ी के मूल में पहुँचा । खच्चरवाले ने कहा ! हम पहुँच गये । अब लौटना चाहिए । मैने कहा । यह स्थान वह नही है जहां हम आना चाहते थे । उसने सरिता में मिलता एक नाग अर्थात् सोता दिखाकर कहा था । यहो नाग था । मैं उस नाग के पास गया जल में गन्धक की गन्ध थी । टट्टू वाला हुज्जत करने लगा । उसने कहा । इसी गन्धक पानी के लिए लोग यहा आते थे । वह क्या जाने । मै देव- स्थान देखने आया था । जिसे लोग भूल चुके थे । स्टीन ने इसका वर्णन किया था । उसे मैने पढा था । अतएव मैं स्वीकार करने के लिए तैयार नही था कि यह वही स्थान था । मैने उसे और आगे चलने के लिए कहा । पहाड़ी पर एक गूजर की कोठरी थी । हमलोग ऊपर चढ़ गये । खच्चरवाला उस कोठरी में पहुँचा । हम भी पीछे-पीछे गये । दूध पीने के लिए वहां के गूजर ने कहा । गूजरों की गन्दगी देखकर दूध पीने का साहस नहीं हुआ ।