राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४ राजतरंगिणी के प्राय. निवास-स्थान खाली पड़े थे । अक्तूबर मास के पश्चात् शीत एवं तुषार पात आरम्भ हो जाता है । उससे बचने और ढोरों की रक्षा करने के हेतु पूरी गृहस्थी खच्चरों पर लादकर ढोरों के साथ गरम स्थान अर्थात् श्रीनगर की तरफ चल देते हैं । वहाँ से जम्मू प्रदेश की तरफ जहाँ बरफ नहीं गिरती डाल लेते हैं । मुझे इस नीरव स्थान में, प्रकृति की इस गम्भीर अभिरामता में, भयंकरता का बोध हो रहा था । कुछ आगे बढ़ने पर ढोल बजने की आवाज सुनाई पड़ने लगी । मन एक बार कबीले वालों का स्मरण कर कांप उठा । कबीलों के सम्बन्ध में अनेक क्रूर गाथाऐं सुन रखा था । उनसे सम्बन्धित अमानुषी कहानियाँ पढ़ चुका था । मैं हिन्दू था । शताब्दियों पूर्व गूजरों की जाति हिन्दू थी । किन्तु आज बात उल्टी थी । सभ्यता की किरण यहाँ तक नहीं पहुँच सकी थी । साहस केवल इसलिए था कि हमारे अश्वी मुहम्मद तथा खच्चर वाले दोनों मुसलमान थे । उन पर अविश्वास करने का मुझे कारण नहीं दिखाई पड़ा । तथापि बस्ती से सहस्रों मील दूर, इस एकाकी स्थान में, यदि कोई मुझे मार दे, मेरा सामान, रुपया-पैसा छीन ले तो मैं ऐसी अवस्था में क्या कर सकूँगा ? विचार आते ही सिहर गया । बहुत दुनिया घूम चुका था । प्राय: अकेला ही घूमा था । अपने जीवन में कुछ और करना बाकी नहीं था । मैने खच्चर को चाबुक लगाया । आगे बढ़ता चला गया । कुछ दूर चलने पर देखता हूँ कि दो व्यक्ति ढोल बजा रहे थे । और लगभग पचास गूजर एक साथ पंक्तिबद्ध घास काट रहे थे । उनके हाथों में चमकती हुंतिया थी । ये इतनी धारदार थीं कि दूर से ही चमक रही थी । वे काटते आगे बढ़ते जाते थे । ढोल वाला व्यक्ति पंक्ति के एक भाग में एक छोर से ढोल बजाता हुआ दूसरे छोर तक आता और पुनः बजाते हुए पहले छोर तक लौट जाता था । यह पंक्ति के पृष्ठ भाग में आता और जाता था । वे हमें देखकर और उत्साह से ढोल बजाने लगे । उपत्यका ढोलों की गम्भीर ध्वनि एवं उसकी प्रतिध्वनि से मुझे भयावनी लगने लगी । किन्तु घास काटने वालों पर उसकी प्रतिक्रिया भिन्न होती थी । उनमें उत्साह उत्पन्न होता था । एक ही काम करते रहने वाली नीरसता दूर होती थी । हाथ तेजी से चलते थे । वे घास काटते पीठ के पीछे जमीन पर डाली की तरह जुट्टों में रखते, खिसकते आगे बढ़ते थे । जैसे जैसे भेदा देवी का स्थान समीप आता गया जंगल गम्भीर होता गया । देवदार तथा चीड़ के वृक्षों की आवलिया घनी होने लगी । भूमि पर वृक्षों की सघनता के कारण सूर्य की किरणें पड़ना कठिन हो रहा था । कुछ दूर और आगे बढ़ने पर पुनः घास का एक छोटा मैदान मिला । यहां भी गूजर ढोल बजाकर घास काट रहे थे । पूछने पर मालूम हुआ कि जिन गूजरों की जीविका उपत्यका में उपजे मक्का की फसल पर निर्भर थी, वे अपने ढोरों सहित शीत ऋतु में भी खेतों पर रह जाते हैं । तुषार किंवा हिमपात के समय घास नहीं रह जाती । वृक्षों में हरी पत्ती नहीं दिखाई देती । पतझड जैसा दृश्य उपस्थित हो जाता है । गूजर तथा स्थानीय कृषक घासों का बण्डल अपने आवास में रख लेते हैं । एक ही कोठरी में घास, पशु तथा अपने कुटुम्ब के साथ रहते हैं । यह जीवन बड़ा कठिन है । उनके शरीर पर पड़े वस्त्रों से दुर्गन्धि निकलती है । वे मैले रहते हैं । दाढ़ी तथा बाल बड़े हो जाते हैं । इस समय भी मैने जितने गूजरों को देखा सबकी दाढ़ी लम्बी, बाल लम्बे तथा सर पर कुल्लहड़ के ऊपर पगड़ी थी । वे काबुली पठान जैसे लगते थे । केवल रंग कुछ पठानों से झांवरा था । ढोरों के साथ रात-दिन रहते रहते उनके आचार-विचार पर पशु जीवन का प्रभाव दिखाई पड़ता था । सरिता की धारा के दोनों पार्श्व में पगडण्डी है । वाम तटीय मार्ग से चलना अच्छा होगा । मार्ग में