राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
४४ राजतरंगिणी के प्राय. निवास-स्थान खाली पड़े थे । अक्तूबर मास के पश्चात् शीत एवं तुषार पात आरम्भ हो जाता है । उससे बचने और ढोरों की रक्षा करने के हेतु पूरी गृहस्थी खच्चरों पर लादकर ढोरों के साथ गरम स्थान अर्थात् श्रीनगर की तरफ चल देते हैं । वहाँ से जम्मू प्रदेश की तरफ जहाँ बरफ नहीं गिरती डाल लेते हैं । मुझे इस नीरव स्थान में, प्रकृति की इस गम्भीर अभिरामता में, भयंकरता का बोध हो रहा था । कुछ आगे बढ़ने पर ढोल बजने की आवाज सुनाई पड़ने लगी । मन एक बार कबीले वालों का स्मरण कर कांप उठा । कबीलों के सम्बन्ध में अनेक क्रूर गाथाऐं सुन रखा था । उनसे सम्बन्धित अमानुषी कहानियाँ पढ़ चुका था । मैं हिन्दू था । शताब्दियों पूर्व गूजरों की जाति हिन्दू थी । किन्तु आज बात उल्टी थी । सभ्यता की किरण यहाँ तक नहीं पहुँच सकी थी । साहस केवल इसलिए था कि हमारे अश्वी मुहम्मद तथा खच्चर वाले दोनों मुसलमान थे । उन पर अविश्वास करने का मुझे कारण नहीं दिखाई पड़ा । तथापि बस्ती से सहस्रों मील दूर, इस एकाकी स्थान में, यदि कोई मुझे मार दे, मेरा सामान, रुपया-पैसा छीन ले तो मैं ऐसी अवस्था में क्या कर सकूँगा ? विचार आते ही सिहर गया । बहुत दुनिया घूम चुका था । प्राय: अकेला ही घूमा था । अपने जीवन में कुछ और करना बाकी नहीं था । मैने खच्चर को चाबुक लगाया । आगे बढ़ता चला गया । कुछ दूर चलने पर देखता हूँ कि दो व्यक्ति ढोल बजा रहे थे । और लगभग पचास गूजर एक साथ पंक्तिबद्ध घास काट रहे थे । उनके हाथों में चमकती हुंतिया थी । ये इतनी धारदार थीं कि दूर से ही चमक रही थी । वे काटते आगे बढ़ते जाते थे । ढोल वाला व्यक्ति पंक्ति के एक भाग में एक छोर से ढोल बजाता हुआ दूसरे छोर तक आता और पुनः बजाते हुए पहले छोर तक लौट जाता था । यह पंक्ति के पृष्ठ भाग में आता और जाता था । वे हमें देखकर और उत्साह से ढोल बजाने लगे । उपत्यका ढोलों की गम्भीर ध्वनि एवं उसकी प्रतिध्वनि से मुझे भयावनी लगने लगी । किन्तु घास काटने वालों पर उसकी प्रतिक्रिया भिन्न होती थी । उनमें उत्साह उत्पन्न होता था । एक ही काम करते रहने वाली नीरसता दूर होती थी । हाथ तेजी से चलते थे । वे घास काटते पीठ के पीछे जमीन पर डाली की तरह जुट्टों में रखते, खिसकते आगे बढ़ते थे । जैसे जैसे भेदा देवी का स्थान समीप आता गया जंगल गम्भीर होता गया । देवदार तथा चीड़ के वृक्षों की आवलिया घनी होने लगी । भूमि पर वृक्षों की सघनता के कारण सूर्य की किरणें पड़ना कठिन हो रहा था । कुछ दूर और आगे बढ़ने पर पुनः घास का एक छोटा मैदान मिला । यहां भी गूजर ढोल बजाकर घास काट रहे थे । पूछने पर मालूम हुआ कि जिन गूजरों की जीविका उपत्यका में उपजे मक्का की फसल पर निर्भर थी, वे अपने ढोरों सहित शीत ऋतु में भी खेतों पर रह जाते हैं । तुषार किंवा हिमपात के समय घास नहीं रह जाती । वृक्षों में हरी पत्ती नहीं दिखाई देती । पतझड जैसा दृश्य उपस्थित हो जाता है । गूजर तथा स्थानीय कृषक घासों का बण्डल अपने आवास में रख लेते हैं । एक ही कोठरी में घास, पशु तथा अपने कुटुम्ब के साथ रहते हैं । यह जीवन बड़ा कठिन है । उनके शरीर पर पड़े वस्त्रों से दुर्गन्धि निकलती है । वे मैले रहते हैं । दाढ़ी तथा बाल बड़े हो जाते हैं । इस समय भी मैने जितने गूजरों को देखा सबकी दाढ़ी लम्बी, बाल लम्बे तथा सर पर कुल्लहड़ के ऊपर पगड़ी थी । वे काबुली पठान जैसे लगते थे । केवल रंग कुछ पठानों से झांवरा था । ढोरों के साथ रात-दिन रहते रहते उनके आचार-विचार पर पशु जीवन का प्रभाव दिखाई पड़ता था । सरिता की धारा के दोनों पार्श्व में पगडण्डी है । वाम तटीय मार्ग से चलना अच्छा होगा । मार्ग में
परिशिष्ट 'घ' ४५ बहुत घना जंगल है । यहां के वन की लकड़ियां किंवा वनों के घन का उपयोग अभी तक नहीं हो रहा है । कल्हण ने मार्ग को भेदा वनपथ कहा है । यह विरानी उपत्यका कही जाती है । मालूम होता है कि यहां आने का मार्ग उस समय सुगम नहीं था । श्रीवर ने जैनराज तरगिणी (४:४९२) में भी भेदा वनपथ का उल्लेख किया है । महाभारत वनपर्व (८४ : ६५) में गंगोद्भेद तीर्थ का उल्लेख है । इस तीर्थ में तीन रात्रि उपवास करने वाले व्यक्तियों को वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है । वह सदा सर्वदा के लिए ब्रह्मभूत हो जाता है । मार्ग में बड़े-बड़े मोटे देवदार के वृक्ष टूटकर गिरे थे । सरिता की धारा के मध्य वृक्ष धराशायी थे । जल, धूप, वायु, वर्षा, ऋतुओं का थपेड़ा खाते शताब्दियों से वे अपनी काया बिखेरते पड़े थे । इतना घना जंगल आस्ट्रेलिया के पश्चात् मैंने यहीं देखा था । वृक्ष स्वतः गिरते हैं । स्वतः उगते हैं । सहस्रो वर्षों से निरन्तर यह क्रम अबाधगति से चला आ रहा है । इन गिरे वृक्षों में कहीं-कहीं गूजर लोग अग्नि लगा देते हैं । जंगल में जहां सलाई नहीं मिलती वहां अग्नि जीवित रखने का यह बड़ा अच्छा तरीका है । एक बार आग बुझ जाने पर पाच-सात मील चलकर दूसरे गांव से अग्नि लानी पडती है । अग्नि धराशायी वृक्ष के मूल में गोझला बनाकर रख देते हैं । वृक्ष की यह आग वर्षों सुलगती रहती है । अग्नि के लिए वृक्ष का अग्निवाला भाग नीचे कर देने हैं । बून्दें उनमें पड़ती नहीं । इस प्रकार वर्षा मे अग्नि की रक्षा हो जाती है । शीत से बचने तथा अग्नि के उपयोग का अच्छा तरीका ढूंढ निकाला गया था । चलते हुए हम अचानक एक पहाड़ी के मूल में पहुँच गये । पृष्ठ भाग में उत्तुंग हिमाच्छादित शिखर था । तीन तरफ हरित पर्वतमाला थी और सम्मुख विरानी अर्थात् उपत्यका थी । यहा के गूजर अपनी कोठरी शीत ऋतु प्रारम्भ होने के कारण छोड़कर चले गये थे । दो एक गूजर जलौनी लकड़ी काट रहे थे । वे मक्का की फसल काटकर जाना चाहते थे । इस उपत्यका में शाली की कृषि का अभाव था । यह उपत्यका कश्मीर की अन्य उपत्यकाओं से सौन्दर्य में कम नहीं है । गुलमर्ग जैसा विशाल मैदान नहीं मिलता । किन्तु मार्ग में छोटे मैदान कई स्थानों पर मिले । उपत्यका की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ के पर्वत सूखे नहीं हैं । हरे भरे वृक्षों से लदे एवं भरे हैं । चारो ओर हरियाली दिखाई देती है । देव- दार के वृक्षों का घना वन मीलों छाया करता चला जाता है । सूर्य के दर्शन कठिनता से मिलते हैं । भेदगिरी पहाड़ी के मूल में पहुँचा । खच्चरवाले ने कहा ! हम पहुँच गये । अब लौटना चाहिए । मैने कहा । यह स्थान वह नही है जहां हम आना चाहते थे । उसने सरिता में मिलता एक नाग अर्थात् सोता दिखाकर कहा था । यहो नाग था । मैं उस नाग के पास गया जल में गन्धक की गन्ध थी । टट्टू वाला हुज्जत करने लगा । उसने कहा । इसी गन्धक पानी के लिए लोग यहा आते थे । वह क्या जाने । मै देव- स्थान देखने आया था । जिसे लोग भूल चुके थे । स्टीन ने इसका वर्णन किया था । उसे मैने पढा था । अतएव मैं स्वीकार करने के लिए तैयार नही था कि यह वही स्थान था । मैने उसे और आगे चलने के लिए कहा । पहाड़ी पर एक गूजर की कोठरी थी । हमलोग ऊपर चढ़ गये । खच्चरवाला उस कोठरी में पहुँचा । हम भी पीछे-पीछे गये । दूध पीने के लिए वहां के गूजर ने कहा । गूजरों की गन्दगी देखकर दूध पीने का साहस नहीं हुआ ।
४६ राजतरंगिणी
उस गूजर से मालूम हुआ । पहाड़ी पर एक और नाग है । उसका नाम क्या है । कैसा है । यह बता नही सका । हम लोग खच्चर को छोड़कर पहाड़ी पर चढे । यह पहाड़ी आसपास की भूमि तल से ७५ फिट से कुछ ऊपर ऊँची है । इसके तीन ओर सरिता की धारा बहती है । एक तरफ ढालुआ भूमि है । उसी ढाल से चढ़कर भेदा देवी किंवा गगोद्भेद तीर्थ पर पहुँचे । कल्हण ने स्थान की संज्ञा भेडगिर नाम से दी है । तीर्थ का नाम गंगोद्भेद कहा है । भेडगिरी, भेदगिर, भैट, ब्राडू, एक ही शब्द के विभिन्न अपभ्रंश है । स्तीन इस स्थान पर सन् १८९५ मे आये थे । उस समय कश्मीर का ब्राह्मण वर्ग तथा अन्य हिन्दू इस तीर्थ को भूल गये थे । यह तीर्थ लुप्त हो गया था । स्तीन ने इसे पुन शारदा तीर्थ तुल्य खोज निकाला है । दूसरी भेदा देवी की स्थापना तथा मार्ग दुर्गम होने के कारण यहा को यात्रा बन्द हो गयी है । मार्ग कष्टसाध्य तथा खतरे से खाली न होने के कारण लोग आना पसन्द नही करते । यहा के रहने वाले गूजरो से मैने पूछा । कभी कोई व्यक्ति या पर्यटक उनकी जानकारी मे यहा आया था ? उन्होने उत्तर दिया । उनकी जानकारी मे कोई नही आया था । उन्हें लगभग ४० या ५० वर्षों की बातें अच्छी तरह याद थी । हमने शंका की । शायद कोई आया हो । उन्होने विश्वास के साथ कहा । ऐसा हो नही सक्ता । हम लोग स्थान छोड़कर कभी हटे नही । स्तीन को अपनी यात्रा के समय इसी प्रकार का अनुभव हुआ था । बुद्धार में उन्हें खैरा नामक ७५ वर्षीय गूजर से मुलाकात हुई थी । वह यहा पर ४० वर्षों से रहता था । उसने स्तीन को बताया था कि उसकी युवावस्था में कभी-कभी ब्राह्मण यहा पर आते थे । स्नान करने के पश्चात् श्राद्ध करते थे । कालान्तर में ब्राह्मणो का आना दुर्लभ हो गया । पाकिस्तान तथा हिन्दुस्तान के बीच कश्मीरी संघर्ष के समय सैनिको द्वारा विभिन्न पथों, जंगलों तथा दरों की खोज हुई । यहाँ भी कुछ लोग आये थे । कुछ दिन पहले मार्ग साफ करते एक जिप आई थी । शायद सड़कों की पैमाइश की बात थी । उसे भी हुए तीन वर्ष बीत चुके थे । सम्भव है राज्य सरकार यहाँ तक शीघ्र ही सड़क बनवाये ।
परिशिष्ट 'च' ४७
मोचनी एक सरिता जिसका नाम 'अभया' होगा निकलेगी । वह अनवरत प्रवाहित रहेगी । वह पहाड़ी के ढाल से उछलती नीचे नहीं बहेगी । मैने इसे सत्य देखा । सरोवर से कुछ नीचे जल निकलता दिखायी पड़ता है । वहाँ चरणामृत लिया जाता है । उसी स्थान पर जल पुनः पहाड़ी में समाविष्ट हो जाता है । उसका पता नहीं चलता । नीचे जहाँ जल प्रवाह है वहाँ उपरोक्त गन्धक का स्रोत मिलता है । इस शांतस्थान को जल शुद्ध रखने के लिए गूज़रों ने शिलाखण्डों से ढंक दिया था । देवी सरस्वती ने यह भी भविष्यवाणी की थी कि प्रत्येक मास के तृतीयांश में ही जलधारा प्रवा- हित रहेगी । शेष समय में गंगा स्वर्ग में बहती रहेगी । देवी ने ऋषि से वर माँगने के लिए कहा । ऋषि ने वर माँगा । जल सदा सर्वदा एक रूप प्रवाहित होता रहे । देवी ने वर स्वीकार किया । पुलस्त्य के पास जल निरन्तर बहता रहा । गंगोद्भेद तीर्थ प्रकाश में आया । देवी के दर्शन निमित्त ऋषि पुलस्त्य ने पुनः एक सहस्र वर्ष तक तपस्या की । देवी सरस्वती ने राजहंसी के रूप में ऋषि को दर्शन दिया । ऋषि ने देवी की पूजा चैत्र शुक्ल अष्टमी तथा नवमी को की । देवी ने ६ प्रकृतियों का वर्णन ऋषि से किया । छओ प्रकृतियो के भेदों का वर्णन करने के कारण देवी का नाम ऋषि ने भेद रखा । देवी की पूजा हंस वागेश्वरी भेदा रूप से चैत्र शुक्ल चतुर्दशी तथा पूर्णमासी को होने लगी । गंगोद्भेद माहात्म्य भेदा देवी का उल्लेख करते हुए गोवर्धन धर विष्णु का वर्णन करता है । वह एक आश्चर्यजनक प्राकृतिक अलौकिक थान का वर्णन करता है । गोवर्धनधर के १२५ हस्त दूरी तक कभी तुषारपात नही होता (श्लोक ० ७५, ८७, ८९, ९९, १०३९ ) । उसी स्थान में ऋषि निमित्त थौजस यम की मूर्ति स्थापित हुई । यम की पूजा माघ कृष्ण अर्थात् आश्वयुज १४ होने का विधान निर्धारित किया गया । माहात्म्य यहाँ रामाश्रम, रामुष, सप्त ऋषि आश्रम, वैतरणी नदी आदि तीर्थों का उल्लेख करता है । उनकी यात्रा गंगोद्भेद तीर्थ यात्रा के समय करनी चाहिए । नीलमत पुराण गंगोद्भेद तीर्थ के संदर्भ में भेदा देवी का उल्लेख करता है । नीलमत पुराण अमा- वस्या के दिन, आश्वयुज, नारायण अर्थात् गोवर्धनधर से देवस्थान, रामतीर्थ अर्थात् रामाश्रम, सप्तऋषि तथा वैतरणी का उल्लेख करता है । (नील० 1312-1319) उक्त स्थानो में रामुष स्थान जिसका वर्णन कल्हण ने राजतरंगिणी मे किया है । श्रीनगर सुपियान सड़क पर रामुह ग्राम है (रा० त० २:५५; ८ : २८१३ ) । आइने अकबरी में अबुलफजल वर्णन करता है कि शुकरोह के पास एक नीची पहाड़ी है । उसके शिखर पर एक जल-स्रोत है । वह पूरे वर्ष भर चलता रहता है । इस पर्वत के बाहु मूल पर तुषारपात नहीं होता । शुकरोह अर्थात् वर्तमान शूकरु रामुह से दक्षिण दिशा में मिलता है । वह नाम भेदा गिरि के लिए आइने अकबरी में आया है । (आइने अकबरी : २ : ३६२ ) भेदगिरि पहुँचने पर परिश्रम सार्थक समझा । मार्ग की थकान दूर हो गयी । वहाँ चुपचाप बैठने में एक अभूतपूर्व आनन्द का अनुभव हो रहा था । उस अनुभव का वर्णन करना कठिन है । उसका सम्बन्ध केवल कायिक किंवा इन्द्रियगम्य सुख से नहीं अपितु आत्मा से जैसे था । भेदगिरि शिखर चारों तरफ के स्थानों से ऊँचा है । स्टीन की गणना के अनुसार उत्तर-पूर्व उसे
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परिशिष्ट च ५१ वर का जल निरन्तर ताजा तथा स्वच्छ बना रहता है। शुद्धता बनी रहती है। यदि सरोवर साफ कर दिया जाय तो जल में और शुद्धता आ जायेगी। मैं समझता हूँ कि सरोवर का जीर्णोद्धार लगभग छह सौ वर्षों से नहीं हुआ होगा। सम्भव है कभी किसी धर्मप्राण व्यक्ति ने सरोवर को साफ करा दिया हो। सबसे आश्चर्यजनक बात जल के न जमने तथा तुषार के न होने का वर्णन, कल्हण तथा नीलमत पुराण ने नही किया है। मालूम होता है। यह बात उस समय लोगों में इतनी प्रचलित तथा साधारण थी कि इसके वर्णन की आवश्यकता का अनुभव नही किया गया होगा। यहाँ पर कोई विशाल भग्नावशेष अथवा कोई विशेष चामत्कारिक बात नही देखकर मेरे काश्मीरी मित्रों ने मुझसे पूछा। इस स्थान का इतना महत्त्व क्यों दिया गया? यहाँ आते समय मैं थी स्तीन का वर्णन ध्यानपूर्वक पढ़कर नही आया था। स्तीन द्वारा लिखित सब बातों का मुझे ज्ञान नही था। आधुनिक जगत् के लोग सर्वत्र कुछ आकर्षक, कुछ भव्य, कुछ तुरन्त प्रभावकर, वस्तुओं से प्रभावित होते हैं। मैने तुरन्त उत्तर दिया। यहाँ की सबसे बड़ी विशेषता यह है। यह पहाड़ी इस उपत्यका में तीनों तरफ के भूमि तल से ७० फीट ऊँची है। दक्षिण-पश्चिम की तरफ ढालू जमीन होती कम से कम ५० फीट तक नीची पहुँच गयी है। इसके तीन दिशाओं में सरिता का प्रबल प्रवाह है। सरिता का वेगशाली प्रवाह निर- न्तर एक रूप बहता चला जा रहा है। फिर भी जल नदी के जल स्तर से ७० फीट ऊँचाई पर कैसे पहुँच- कर निर्झर हो गया, यह वास्तव में प्रकृति की एक विचित्र लीला है। शिखर पर जहाँ सरोवर है, यह स्थान उपत्यका में सबसे ऊँचा है। उससे ऊँचा और कोई स्थान वहाँ पर नहीं है। इसके दक्षिण तथा वाम पार्श्व में ऊँचे पर्वत हैं। वाम पार्श्व का उत्तुंग पर्वत सरिता पार है, तो दूसरी ओर ढालू भूमि के छोर के पश्चात् पुनः ऊँचा पर्वत खड़ा है। इस प्रकार जल का इस शिखर पर पहुँचना उसी प्रकार हो रहा है, जैसे किसी नगर के पानी कल (वाटर वर्क्स) के लिए इंजन तथा पाइप द्वारा जल संग्रह हेतु ऊपर पहुँचाया जाता है। जहाँ भी शिखरों पर जल मिलता है, वहाँ या तो एकत्रित किया हुआ वर्षा जल रहता है, अथवा किसी उत्तुङ्ग शिखर से जलप्रपात का जल आता संग्रहीत हो जाता है। यहाँ दोनों बातें नहीं हैं। यह जल तो भेदगिर पर्वत के शिखर के मध्य स्थान में केवल ६० फीट वर्गाकार समतल भूमि में निकल रहा है। जैसे किसी शिखर पर किसी नगर के जल पूर्ति निमित्त टैंक का निर्माण कर उसमें जल भरा जा रहा था। जल सरोवर द्वार देश के नीचे से अभी तक प्रवाहित होता है। वह कुछ ही गजों के पश्चात् उसी पहाड़ी में लोप हो जाता है। पहाड़ी के नीचे जहाँ पुनः निर्झर निकलता है उसके जल में गन्धक की महक होती है। इस जल में गन्धक की गन्ध नहीं है। अतएव माहात्म्य तथा प्राचीन पुस्तकों में वर्णित जल के लुप्त होने की घटना यहाँ सच दिखायी पड़ती है। इस तीर्थ को यात्रा चैत्र शुक्ल में करने का माहात्म्य है। स्थान दुर्गम होने के कारण, समस्त जनता के मुसलमान हो जाने के कारण, यहां का महत्त्व कम हो गया है। यहाँ के महत्त्व में अधिक कमीका कारण हालमोगलपुर में नवीन भेदा देवी की स्थापना है। वहाँ दर्शन करने का माहात्म्य मूल भेदादेवी के माहात्म्य
५२ राजतरंगिणी
तुल्य समझा जाने लगा है। सोलहवीं शताब्दी तक इस तीर्थ का अवश्य महत्त्व रहा होगा। अग्यशः अबुल फजल इसका वर्णन नही करता । भेदा तीर्थ के अन्य स्थानों के विषय में कुछ कहना आवश्यक है। भेदागिरि की पहाड़ी को अग्नि दिशा मे कुछ दूर पर एक पहाड़ी १०० फीट ऊँची है । यहाँ गूजर रहते हैं। इस समय यहाँ कोई नही था । इस स्थान के मध्य में एक कुँवा डूबा था। वहाँ पकाई ईंटें तथा बेदौल इमारत बनाने के पत्थर बिगरे जमीन में मिले थे। यहा एक दीवाल का भग्नावशेष ईशान दिशा से नैर्ऋत्य दिशा तक ८० फीट तक फैला है। इस स्थान का स्तीन के मत से धर्मशाला अथवा यहाँ के रहने वाले पुरोहितों के आवास निमित्त निर्माण किया गया था। मुझे यहाँ केवल दीवाल का सूक्ष्म आभास मात्र मिला । पत्थर ईंटा उठाकर लोग अपने निवास स्थानों में लगा लिये हैं। गोवर्धनधर तथा यम ओजस देवस्थानों का पता स्तीन को लगा था। मेरे पास स्तीन जैसे साधन प्राप्त नही थे। यदि चाहता तो सरकारी मदद से साधन एकत्रित हो जाते, परन्तु अपनी न भागने वाली दुर्बलता का सर्वदा शिकार होता रहा हूँ। कष्ट उठा लेना मैने पसन्द किया है। परन्तु मुझ किसी के आगे किसी वस्तु के लिए न खुले यही इच्छा तथा कामना रही है। इसमे काम में कठिनाई होती है। परन्तु आत्मा सुखी रहती है। जो मेरे लिए सबसे बड़ा सुख है। मैं भी उनका पता लगाना भूल गया । कारण यह था कि सन्ध्या के पूर्व वहाँ से लौट जाना आवश्यक था । अन्यथा खतरा था। कही ठहरने का स्थान नही था । भोजन का महत्त्व मेरे जीवन में कभी नही था परन्तु अपने साथियो का ध्यान रखना आवश्यक था । इस स्थान से में एक मील तक खच्चर से आया । यहाँ से पैदल चलकर मेहल्लरमात्तपुर पहुँचा । वहा पर मोटर और मोटर ड्राइवर छोडकर आया था। जब गंगोद्भेद तीर्थ को लोग भूल गये थे तो छोटे-छोटे स्थानो तथा तीर्थों को स्मरण रखना कठिन था। हमे आशा है। इस दिशा मे कुछ प्रयास भविष्य में इतिहास लेखकगण करेंगे। नारायण नाग से भी मुझे यह स्थान अच्छा लगा । नारायण नाग में किंचित् भय का बोध पर्वत श्रृंखलाओ के अत्यन्त विशाल तथा ऊँचेपन और कंकनी नदी के धाराप्रवाह के गर्जन से होता है। भेदा देवी का स्थान शान्त है। सुरम्य हैं। भय का बोध नही होता । प्रकृति की सुषमा मे, गम्भीरता नही मनोहरता है। मन मे हलकेपन का बोध होता है। शरीर हल्का मालूम पडता है। दिमाग का बोझिल पन समाप्त हो जाता है। सरोवर के पास यदि मनुष्य बैठ जाय, तो पृष्ठभाग की ओर उसे नदी उछलती चौड़ी उपत्यका से आती दिखाई देगी । गंगोद्भेद पहाड़ी की जैसे परिक्रमा करती हुई चली जाती है । शिखर एक दीप-सा प्रतीत होता है । चारो ओर से पर्वतों का ढाल आता इस पहाड़ीके मूल में मानो समा जाता है। चारों ओर की पर्वतमालाएँ और नदी की उज्ज्वल जल धाराएँ बहती भेदागिरि की सीमा बना देती हैं। भेदादेवी गिरि के पृष्ठभाग में देवदार पूर्ण पर्वत और उसके ऊपर कुछ पीछे उठे दीपक तुल्य तुषार मण्डित शिखर हैं। वह जैसे दीपदान की थाली लिए चिरकाल से भेदादेवी की वन्दना कर रहे है। शिखर के सम्मुख लम्बी उपत्यका देवदार तथा चोड़ के हरे वृक्षों से भरी है। उनके मध्य नदी की धारा चुपचाप बहती चली जा रही है। इस धारा के दोनो ओर चलने की पगडंडिया हैं। मै धारा के वाम तट से आया था। उसके दक्षिण तट से लौट चला । दक्षिण तट का मार्ग वाम तट से सुगम है।
परिशिष्ट च ५३ इस शिखर के वाम पार्श्व से मार्ग राजौरी जाता है। द्रवगाम को पीर पन्तसाल पास से जोड़ता है। सामरिक दृष्टि से महत्त्व का स्थान है। रामपयार नदी की उपत्यका को यह मार्ग सम्बन्धित करता है। वहीं चरुता मार्ग पीरपन्तसल पास के मुख्य मार्ग से दुबजी के पास मिलता है। यदि गंगोद्भेद तीर्थ के विरानी उपत्यका का विकास किया जाय तो कश्मीर के सर्वश्रेष्ठ पर्वतीय दृश्यों में से वह एक होगा। यहां का वन मार्ग शोभनीय है। यहाँ आने पर एक प्रकार की शान्ति तथा मन में आध्या- त्मिक भावना का उदय होता है। यह देखकर मन गौरव से पुलकित हो जाता है कि हमारे पूर्वज कितने प्रकृति प्रेमी थे। मानव के आध्यात्मिक विकास के लिए किस प्रकार सुरम्य स्थानों का प्रकृति के गोद में चयन किया था।
परिशिष्ट 'छ' कुरु ( तरंग १:५१: पृष्ठ ९५ ) ऋग्वेद में कुरुओं का उल्लेख एक जाति के रूप में नहीं किया गया है। कुरुश्रवण नामक एक राजा ( १० ३३ ४ ) और राजा पाकस्थामन् कौरयाण का उल्लेख ( ८:३:२१ ) में किया गया है। अथर्ववेद ( २०:१२७ ) एव अग्रिम खिल ( ५ १० ) में कुरुओं के राजा परीक्षित का उल्लेख किया गया है। जिनके पुत्र जनमेजय शतपथ ब्राह्मण ( १३:५ ४, १३ ५.१.४ ) में अश्वमेध सम्पन्न करने वाले एक महान् राजा के रूप में वर्णित है। कुरुश्रवण जो कि नाम से कुरुओं से संवद्ध प्रतीत होता है त्रासद्दस्यव अर्थात् त्रसदस्यु का वंशज माना गया है। पुरूओ मे प्रसिद्धराजा । था ब्राह्मण साहित्य में कुरु जाति को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। कुरु पांचाल का नाम प्राय. एक साथ मिलता है ( जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण ३:७:६, ८:७, ४.७:२; वोपनिषीय उपनिषद् ४ १, काठक संहिता १०-६; वाजसनेयी संहिता ११:३:३) । शतपथ ब्राह्मण ( १:७:- २८ ) में कुरुपंचाली यज्ञ प्रणाली सर्वश्रेष्ट कही गयी है। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार ( ३:२:३१५ ) कुरु- पांचाल वाणी का निवास स्थान था। तैत्तिरीय ब्राह्मण ( १:८:४:१-२ ) से प्रकट होता है कि उनके राजा हिम काल में आक्रमण करते थे। ग्रीष्म काल आते ही लौट जाते थे। उपनिषदो में कुरुपांचाल के ब्राह्मणों की अत्यन्त प्रशंसा की गयी है । ( जैमिनीय ब्राह्मण २:७८; जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण ३:३०:६, ४ १:२ ) । ब्राह्मण एवं उपनिषद् काल में कुरु-पाचाल प्रसिद्ध थे। इसी क्षेत्र में भारतीय पुरा कालीन ग्रन्थों की रचनायें विशेष रूप से हुई थी । कुरुजनपद के विशद इतिहास का वर्णन पुराणों एवं महाभारत में मिलता है। उनका प्रारम्भिक इतिहास कौरवो के इतिहास का अंग है। कालान्तर में वे कौरवों के नाम से प्रसिद्ध हुए । रामायण में अयोध्या काण्ड ( ९१:१९ ) में कुरु का सर्वप्रथम उल्लेख आया है। भरद्वाज ने भरत के सत्कार निमित्त जिन वस्तुओं का आयोजन किया था, उसमें उत्तर कुरु के विषय में कहते हैं—उत्तर कुरु वर्ष में दिव्य चैत्ररथ वन है। वहाँ दिव्य वस्त्र एवं आभूषण वृक्षो के पत्र-पुष्प हैं। दिव्य नारियाँ उन वृक्षों में फल हैं। कुबेर का वह शाश्वत वन यहाँ आ जाए।' रामचन्द्र सीता से चित्रकूट की प्राकृतिक शोभा की तुलना करते हुए कहते है—उत्तर कुरु की शोभा भी चित्रकूट के आगे तुच्छ है। ( अयोध्या काण्ड ९४.२६: ) कबन्ध ने सीता के अन्वेषण निमित्त पश्चिम दिशा के वर्णन के समय उत्तर कुरु के वनों की उपमा दी है। ( अरण्यकाण्ड ७३:७: ) रामायण किष्किन्धा काण्ड ( सर्ग ४३:११, ५९ ) में कुरु का दो बार उल्लेख आया है। यहाँ पर श्लोक ११ में केवल कुरु शब्द तथा ५९ में उत्तर कुरु का उल्लेख है। स्पष्ट है रामायणकाल में दो कुरु प्रदेश थे। कुरु, जिसे कालान्तर में कुरुक्षेत्र कहा गया, तथा उत्तर कुरु हिमालय के पास था। उत्तर दिशा में सोम- गिरि के समीप था। गन्धर्व, किन्नर, सिद्ध, नाग, विद्याधर, आदि देशों के पश्चात् उत्तर कुरु से आगे जाने का
परिशिष्ट छ ५५ उल्लेख है। अर्थात् सौभागों का मार्ग उत्तर कुरु से होकर जाता था। कुरु शब्द का उल्लेख ११ वें श्लोक में किया गया है। वहां कुरु का उल्लेख शूरसेन, प्रस्मल, कुरु, भरत, मद्र, काम्बोज, यवन, शक, आदि के मध्य आया है। भरत जाति कालान्तर में कुरु में मिल गयी और कुरुक्षेत्र बना। इसका उल्लेख यथास्थान किया गया है। कुरुओं का निवास-स्थान कुरुक्षेत्र प्रदेश है। उनका निवास देश, कुरुक्षेत्र, कुरुजंगल तथा कुरु में विभाजित था। (आदि पर्व १०९:१) शतपथ ब्राह्मण (१३.५ ४:११) में भरत जाति का उल्लेख मिलता है। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार वह देवताओं की यज्ञ भूमि थी। जाबालोपनिषद् में भी इसे देवयज्ञ भूमि माना गया है। महाभारत में इसका एक नाम समंत पंचक दिया गया है। समंत पंचक उत्तर वेदी नाम से भी अभिहित किया गया है। ऋग्वेद (३:२३.४) में उन्हें दृषद्वती, आपया तथा सरस्वती के तटों पर रहना बताया गया है। कालान्तर में यही क्षेत्र कुरुजाति का निवास स्थान हो गया था। प्रतीत होता है। भरत जाति कुरु जाति में आत्मसात् हो गयी। वाजसनेयी संहिता (११:३:३) में एक स्थान पर भरत और कुरुपंचालो के सम्मिलित रूप में उत्तर कुरु का उल्लेख आया है। उत्तर कुरु शतपथ ब्राह्मण (१ २:०:१५) के अनुसार कुरुपंचाल के समान तथा शुद्ध वर्णित किया गया है। ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार उत्तर कुरु हिमालय पार के निवासी थे। कुरु एवं पंचालों में संघर्ष होता रहता था। कुरुओं ने उत्तर पांचाल विजयकर द्रोणाचार्य को दिया था। प्रायः दोनों देशों में वैवाहिक सम्बन्ध भी होता था। पांचाल नरेश केशिन दाल्भ्य कुरुराज उच्चै श्रवस की भगिनी के पुत्र थे। द्रोपदी पांचाल नरेश द्रुपद की कन्या थी। ऐतरेय ब्राह्मण (८:१४) में महाभिषेक के अध्याय में उत्तर कुरु का उल्लेख इन्द्र के महाभिषेक के सन्दर्भ में किया गया है। उन्हें परेण हिमवन्त अर्थात् हिमालय के परे किंवा पार रहने वाला माना गया है। वे ऐतिहासिक जाति थे। सत्यहृष्य ने उत्तर कुरु को देवक्षेत्र कहा है। एक मत है कि उत्तर कुरु के लोग कश्मीर से आकर आबाद हुए थे। वहाँ से पुनः बढ़ते हुए कुरु क्षेत्र में आकर बस गये। उत्तर बौद्ध साहित्य में उत्तर कुरु का प्रायः उल्लेख गाथा कालीन लोगों के रूप में किया गया है। किन्तु यह गाथा ऐतिहासिक उत्तर कुरुओं पर आधारित है। दीप वंश में कुरु द्वीप तथा दासन वंश में उत्तर द्वीप के निवासियों को कुरु रट्ठ (कुरूराष्ट्र) कहा गया है। ब्राह्मण साहित्य में दक्षिण किंवा मध्य देश के कुरु लोगो को अत्यन्त महत्त्व दिया गया है। एक प्रकार से तत्कालीन साहित्य का केन्द्र कुरुपंचाल माना जाता रहा है। कुरुपंचाल नामो के एक साथ उल्लेख से स्पष्ट प्रतीत होता है। ये पर्वतीय राष्ट्र थे। मालूम होता है। उपनिषद् तथा ब्राह्मण रचना काल मे पूर्वोदय में कुरु तथा पंचालो का विशेष महत्त्व एक राष्ट्र के रूप में था। कुरुपंचाल के ब्राह्मण शास्त्रीय कर्म काण्ड कराने में प्रसिद्ध थे। कुरुक्षेत्र को भगवान् ने गीता में धर्मक्षेत्र कहा है। मनु ने कुरु, मत्स्य, पंचाल तथा शूरसेन प्रदेश को ब्राह्मणो को स्थान बताया है। वहाँ ऋषि मुनि निवास करते थे। प्रशंसा करते हुए कहा गया है। इनको युद्ध क्षेत्र में सेना के पृष्ठ भाग में रखना चाहिए। (मनु स्मृति २:१७-१९, ७:१९३) मनु ने इसे ब्रह्मर्षियों का देश कहा है। इस क्षेत्र का नाम महाभारत के अनुसार पहले समन्तपंचक क्षेत्र था। राजा कुरु के समय इसका नाम कुरुक्षेत्र पड़ा। महाभारत में कुरु तथा कुरुक्षेत्र के सम्बन्ध में एक गाथा दी गयी है। ययाति की पत्नी
५६ राजतरंगिणी शर्मिष्ठा थी। उनका पुत्र पुरु था। वह नहुष का पौत्र था। पुरुरवा स्वायंभुव मनु की पुत्री इला का पुत्र था। उसका पिता बुध था। उसकी पांचवी पीढ़ी में था। यह चन्द्रवंशीय क्षत्रियों का आदि पुरुष था। ययाति के पुत्र पुरु के नाम पर पौरव वंश का नामकरण हुआ था। इस वंश में दुष्यंत के पुत्र भरत भारतवर्ष के चक्र- वर्ती सम्राट् हुए थे। पुरु के वंशज पौरव कहलाए। पुरु के दसवी पीढ़ी में संवरण हुआ। पांचाल ने उस पर आक्रमण किया। अपने कुटुम्ब के साथ सिंधु नदी के तटवर्ती वन में उसने आश्रय लिया। पुरोहित वशिष्ठ के कारण पुनः राज्य प्राप्त किया। सूर्य कन्या तपती द्वारा उसे पुत्र कुरु उत्पन्न हुआ। उसके नाम पर उसके राज्य का नाम कुरुक्षेत्र पड़ा। कुरु की पत्नी वाहिनी से अश्ववान्, अभिप्यन्त, जैत्ररथ, मुनि एवं जनमेजय का जन्म हुआ। इन्हीं के नाम पर कुरु जांगल प्रदेश का नामकरण किया गया। (आदि पर्व ९४ : ४८ तथा ९४ : ४९-५०) इनकी द्वितीय कन्या शुभांगी से विदुर का जन्म हुआ था (आदि पर्व ९२ : ३९७)। इनका और इन्द्र का संवाद कुरुक्षेत्र की भूमि जोतते समय हुआ था। (शल्य पर्व ५३ : ६-१५) कुरुक्षेत्र में यज्ञ करते समय पवित्र सरस्वती नदी सुरेणु नाम से प्रकट हुई थी। इस नदी का नाम ओघवती भी कहा गया है। (शल्य पर्व ३८ २६-२८।) इसी वंश में शान्तनु हुए थे। शान्तनु के पुत्र चित्रांगद एवं विचित्रवीर्य थे। विचित्रवीर्य की रानियों से दो नियोगज पुत्र हुए। उनका नाम धृतराष्ट्र एवं पाण्डु था। धृतराष्ट्र से गान्धारी के दुर्योधनादि एक शत पुत्र हुए। उनका नाम कौरव हुआ। पाण्डु के पुत्रों का वंश पिता के नाम पर पाण्डव वंश कहलाया। अर्जुन का पुत्र अभिमन्यु था। अभिमन्यु का पुत्र परीक्षित था। परीक्षित का पुत्र जन- मेजय था। जनमेजय की तीसरी पीढ़ी में अधिसीम कृष्ण राजा हुए। उसके समय में सर्वप्रथम नैमिषारण्य में महाभारत एवं पुराणों का पाठ हुआ। अधिसीम कृष्ण का पुत्र निचक्षुथा। यह हस्तिनापुर का अन्तिम राजा था। गंगा की प्रबल धारा के कारण हस्तिनापुर जलप्लावित हो गया। प्रजा तथा राजा वहाँ से वत्स क्षेत्र में जाकर शरण लिये। कुरुओं के कुरुक्षेत्र से निकलने का वृत्तान्त शाख्यायन श्रौतसूत्र में प्राप्त होता है। वृद्धद्युम्न से एक यज्ञ में भूल हो गयी थी। अतएव एक ब्राह्मण ने उसे शाप दिया कि उन्हें कुरुक्षेत्र त्यागना पड़ेगा। ऐतिहासिक काल में कुरुक्षेत्र मगध के साम्राज्य के अन्तर्गत महाराज नंद के समय हो गया था। मौर्यों के राज्य में मौर्य राजाओं के शासन में था। मौर्यों के पश्चात् यह कुछ समय के लिये गुप्तों के साम्राज्य के अन्तर्गत आ गया था। गुप्तों के पश्चात् थानेश्वर के पुष्पभूति वंशीय राजाओं ने कुरुक्षेत्र पर शासन किया था। तत्पश्चात् गुर्जर प्रतिहारों तथा राष्ट्रकूटों के अन्तर्गत था। महमूद गजनी ने थानेश्वर पर आक्रमण किया। चक्रस्वामी विष्णु मूर्ति नष्ट किया था। अन्त में पृथ्वीराज चौहान ने इसे मुसलमानों से मुक्त किया। महाभारत के अनुसार सरस्वती तथा दृषद्वती का मध्यवर्ती भाग कुरुक्षेत्र है। इसे ब्रह्मा की यज्ञ वेदी कहा गया है (वन पर्व ८३ : ४, २०४-२०८)। कुरुक्षेत्र के इक्षुमती नदी के तट पर तक्षक नाग रहता था। खाण्डव दाह के पूर्व यहां चला आया था (आदि पर्व ३:१३९-१४२; २२६ ४)। उसने अपनी तपस्या द्वारा कुरुक्षेत्र को पवित्र किया था (आदि पर्व ९४.५०)। सुन्द-उपसुन्द दिशाओं को जीतकर यहां निवास करते थे। कुरुक्षेत्र सीमा में मान्धाता ने यज्ञ किया था (वन १२६-४५)। भीष्म तथा परशुराम का युद्ध कुरुक्षेत्र में हुआ था (उद्योग पर्व १७८.७२)। कौरव पाण्डव का युद्ध इसी क्षेत्र में हुआ था (भीष्म पर्व अध्याय २५-४२)। भीमसेन से दुर्योधन से युद्ध तथा उसके बाद का युद्ध इसी क्षेत्र की सीमा में हुआ था (शल्य पर्व ५५-५८ अध्याय)। भीष्म पितामह इस क्षेत्र में शरशैया पर थे (भीष्म पर्व ११९.९२)। द्वैपायन मित्र की मृत्यु हंसों से गदायुद्ध कर इसी क्षेत्र में हुई थी। महाभारत वन पर्व के अनुसार यमुना के पश्चिम तथा सरस्वती और दृषद्वती के मध्य का क्षेत्र कुरुक्षेत्र है। इसमें सरस्वती है। दृती तथा
आपगा नदी बहती है। उत्तर कुरु का उल्लेख संस्कृत साहित्य में मिलता है। पुरूरवा एल का पिता बाल्हीक देश से मध्यदेश आया था। पपंच सूदनी में कुरुओं को हिमालय पार से आने वाला बताया गया है। भार- तीय कुरुओं को उनका उपनिविष्ट कहा गया है। उत्तर कुरु महाभारत के अनुसार कैलास एवं बदरिका आश्रम के मध्य था। (म० भा० १ : १४५) मध्यदेश के बसने वाले कुरुओ को दक्षिण कुरु नाम से अभि- हित किया गया है। दक्षिण कुरुओं के राज्य का प्रतिष्ठाता भरत को माना गया है। दक्षिण कुरु लोगों का उल्लेख बौद्ध ग्रन्थों में किया गया है। पपंच सूदनी में दक्षिण कुरुओं का उल्लेख मिलता है। अंगुत्तर निकाय के अनुसार जम्बू द्वीप के जनपदों में कुरु एक महाजनपद था। ब्राह्मण तथा बौद्ध दोनों साहित्यों में प्रायः कुरु पंचाल का उल्लेख एक साथ किया गया है। शायद ही कहीं कुरु का नाम अकेले लिया गया है। पपंचसूदनी से पता चलता है। कुरु प्रदेश की राजधानी में बुद्ध के निवास निमित्त कोई विहार नहीं था। किन्तु कम्मासदभ्य के बाहर एक वन था। उसमें भगवान् निवास करते थे। वहीं यह भी उल्लेख आता है। कुरु देश के लोगों का स्वास्थ्य बड़ा अच्छा था। उनका मस्तिष्क उर्वर था। वे धर्म की किसी बात को समझने के लिए सर्वदा प्रस्तुत रहते थे। सब ऋतुओं में वहा की जलवायु बहुत अच्छी रहती थी। खाद्य पदार्थ स्वादिष्ट और पुष्टकर मिलते थे। भगवान् बुद्ध ने कुरुओं को धर्म ज्ञान सिखाया था। बुद्ध धर्म की कथाओं में कुरुओं का प्रचुर वर्णन कथानक आदि के रूप में आया है। वीर गाथा की रचना में रट्ठपाल का हाथ था। वह कुरु के थुल्लकोठिका में पैदा हुआ था। उसने कौरव्य राजा को बुद्ध धर्म में दीक्षित किया था। धम्मपद के भाष्य में अग्निदत्त की कथा आती है। बड़कोशल अर्थात् महाकोशल राजा का पुरोहित था। वह कुरु तथा अंग और मगध की सीमा पर निवास करता था। उसके संघ में १० हजार शिष्य थे। कुरु आदि जनता उनके भोजन का प्रबन्ध करती थी। कालान्तर में अग्निदत्त तथा उसके शिष्यों ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। थेरगाथा में उल्लेख है। थेरी नन्दुत्तरा का पुनर्जन्म एक ब्राह्मण कुटुम्ब में कम्मासदभ्य अर्थात् कम्मा- सधम्म कुरुदेश में हुआ था। इस नगर का नामकरण कम्मास राजा के नाम पर हुआ था। जयदिस पांचाल राजा के पुत्र रूप में ग्रहण किया था। जयदिस जातक में इस सम्बन्ध में कथा वर्णित है। बोधिसत्त्व ने कम्मास पर नियन्त्रण किया था। राजा जयदिस का दूसरा पुत्र कम्मास था। एक पक्षिणी द्वारा उठा ले जाया गया था। पक्षिणी ने उसे नरमांस भक्षी बना दिया था। बोधिसत्त्व ने उसका भी सुधार किया था। उसे कम्मास इसलिए कहते हैं कि उसके पाद पर काला चिह्न था। यह पौराणिक कथा कल्माषपाद से मिलती है। नन्दुत्तरा पहले जैन हुई। कालान्तर में महा कच्च्यान द्वारा बुद्ध धर्म में प्रव्रजित हुई। पर- मार्थ दीपनी में इसी प्रकार शेरनी का उल्लेख मिलता है। पपंचसूदनी में कुरु के जन्म का विचित्र वर्णन किया गया है। महामान्धाता जम्बूद्वीप का चक्रवर्ती राजा था। उसने पूर्व विदेह, अपर गोपान, उत्तर कुरु तथा देवलोकदर पर विजय प्राप्त किया था। वह उत्तर कुरु से विजय कर लौट रहा था। एक बहुत बड़ा जन समुदाय उत्तर कुरु से जम्बू द्वीप में उसके साथ आया। वे जहां आबाद हुए, उसका नाम कुरु अर्थात् कुरुराष्ट्र पड़ा। कुरु की प्राचीन राजधानो हस्तिनापुर गंगा तट पर थी। इन्द्रप्रस्थ अर्थात् दिल्ली बाद में उनकी राजधानी हुई। गाया है। धृतराष्ट्र हस्तिनापुर में राज करते थे। इन्द्रप्रस्थ पाण्डवों को दे दिया था। दिल्ली में पाण्डवों का किला पुराना किला के नाम से प्रख्यात है। वर्तमान किला शेरशाह सूरी का बनवाया हुआ ८
५८ राजतरंगिणी हैं। सम्भव है उसी स्थान पर शेरशाह ने नवीन किला बनवाया होगा। यह किला इण्डिया गेट से दिखाई पड़ता है। हस्तिनापुर कालान्तर में महत्त्वहीन हो गया। इन्द्रप्रस्थ आज भी भारत की राजधानी है। कुरु देश का दूसरा नगर उत्तराध्ययनसूत्र के अनुसार इसुकार, उसुयार किंवा इशुगार था। यह अत्यन्त समृद्धिशाली नगर था। उसकी तुलना स्वर्ग से की गयी है। बौद्ध साहित्य में कुरु से सम्बन्धित अनेक कथाएं मिलती हैं। कुरुधम्म जातक में बोद्धिसत्त्व को कुरु राजा धनंजय का पुत्र इन्द्रप्रस्थ में होना लिखा है। कलिंग में एक बार अवर्षण हुआ। कारण बताया गया। कुरुधम्म का पालन नहीं किया जाता। अतएव अवर्षण हुआ है। कलिंग से ब्राह्मण कुरु देश में धर्म ज्ञान प्राप्ति निमित्त आये। तत्पश्चात् कलिंग में कुरुधर्म का पालन किया जाने लगा। वर्षा हुई। राजा धनंजय कौरव्य का अनेक जातकों में उल्लेख मिलता है। धनंजय को युधिष्ठिर वंशीय कहा गया है। भगवान् बुद्ध उत्तरापथ में आकर शिक्षा दिये थे। कुरु देश में वे विशेष निवास किये थे। एक कथा में कुरु के राजा के मन्त्री का नाम रायरेथ दिया गया है। एक स्थान पर विधुर दिया गया है। कुरु का राज्य ९०० मील विस्तार में बताया गया है। कुरु में राजतंत्रीय शासन व्यवस्था थी। परन्तु कौटिल्य काल में यहाँ गणतन्त्र प्रणाली प्रचलित हो गयी थी। उनके लिए उपजीवी शब्द का व्यवहार किया गया है। अर्थात् सभी नागरिक राजा थे। उनका समाज में स्थान समान था। नवीं शताब्दी, में पता चलता है, धर्मपाल ने चक्रायुध को कन्नौज के राज्य पर बैठाया था। पुराणों में कुरु जाति का वर्णन बहुत मिलता है। वे प्रायः एक जैसे हैं। कुरु क्षत्रिय थे। मगध सम्राट् जरासन्ध के पराजय के पश्चात् उत्तरापथ में कुरु अत्यन्त शक्तिशाली हो गये थे। कुरु राजा शान्तनु के दो पुत्र चित्रांगद तथा विचित्रवीर्य थे। दोनो पुत्रहीन मर गये। अतएव नियोगद्वारा विचित्रवीर्य की पत्नी से धृतराष्ट्र तथा पाण्डु हुए। धृतराष्ट्र के एक सौ पुत्र दुर्योधनादि हुए। उन्हें कौरव कहा गया। पाण्डु के पुत्र युधिष्ठिर आदि हुए। उन्हें पाण्डव कहा गया। धृतराष्ट्र अन्धा होने के कारण राजसिंहासन पर नहीं बैठ सके। अतएव कनिष्ठ भ्राता पाण्डु राजा हुए। पाण्डु की अकाल मृत्यु के कारण धृतराष्ट्र राजा तथा युधिष्ठिर उपराजा हुए। परन्तु धृतराष्ट्र के पुत्रों को यह बात पसन्द न आई। वे स्वयं अपने पिता के पश्चात् उत्तराधिकारी होना चाहते थे। अतएव एक ही कुरुवंश की दो शाखा कौरव तथा पाण्डवों में महा भयंकर महाभारत युद्ध हुआ। नीलमत पुराण में कौरव तथा कौरव्य शब्दों का उल्लेख मिलता है। यह कुरु वंश के लिए प्रयुक्त किया गया है। कौरव : ततः सा सुषुवे पुत्रं बालगोन्मदसञ्ज्ञितम्। बालभावात् पाण्डुसुतैर्नानीता कौरवेन वा ॥ १० = २९ कौरव्य : गन्धसोमस्तथा गर्व्यः इवितिर्मिनिटिस्तथा । ऐरावतः स कौरव्यो माषादः कुमुदप्रभः ॥ १/२ = १०७८
परिशिष्ट 'छ' ५९ मार्कण्डेय पुराण में उल्लेख है— तास्विमे कुरुपाञ्चालाः शाल्वाश्चैव सजांगलाः । कुरु पांचाल का एक साथ उल्लेख पुराणों में स्पष्ट दिखाई देता है। मत्स्य पुराण में 'तास्विमे कुरु पाञ्चालाः' तथा विष्णु, कूर्म, वायु एवं ब्रह्माण्ड पुराण में भी 'तास्विमे कुरुपांचाल.' का प्रयोग किया गया है । पुराणों के अनुसार वर्तमान मेरठ तथा दिल्ली क्षेत्र कुरु प्रदेश में आता है। पांचाल देश में अहिच्छत्र वर्तमान रामनगर, बरेली, बदायूँ जिला तथा कम्पिला अर्थात् काम्पिल्य ( फर्रुखाबाद जिला उत्तर प्रदेश ) का था । पूर्व में गोमती तथा दक्षिण पश्चिम चम्बल नदी तक क्षेत्र विस्तृत था । पश्चिम में पांचाल की सीमा शूरसेन थी । पांचाल भी उत्तरी तथा दक्षिणी भागों में विभक्त था । संहितोपनिषद् ब्राह्मण में एक स्थल पर प्राच्य पांचाल का भी वर्णन है। इसके तीन भाग भी थे । यह अनुमान इसके लिये त्र्यनीक शब्द के उल्लेख से मिलता है । उत्तर पांचाल की राजधानी अहिच्छत्र तथा दक्षिण पांचाल की कांपिल्य थी। अहिच्छत्र वर्तमान रामनगर जिला बरेली के खनन कार्य से इसकी प्राचीनता स्पष्ट होती है। कुरुओं तथा पांचालों में उत्तर कुरु को अपने राज्य में सम्मिलित रखने के लिये संघर्ष होते थे। कभी-कभी उत्तर पांचाल को कुरुरट्ठ (कुरुराष्ट्र) में सम्मिलित किया गया है। उसकी राजधानी हस्तिनापुर थी। कभी कंपिल रट्ठ (कंपिल राष्ट्र) में सम्मि- लित हो जाता था । मार्कण्डेय पुराण में एक स्थान पर 'कुरुवंस्तंगणा यसाः' का उल्लेख आया है। यहाँ कुरु से उत्तर कुरु समझना चाहिए । वायु, ब्रह्माण्ड पुराणों में 'कुरुन् समस्तानपि' उल्लेख भी किया गया है। मत्स्य में 'कुरुन् वै भरता- नपि' उल्लेख मिलता है । पुराणों से प्रतीत होता है कि कुरु तथा भरत एक ही जाति के थे । स्कन्दपुराण के देशों की तालिका में कुरु का स्थान ६३ वाँ तथा ग्राम संख्या ४३ हजार दी गयी है। इससे प्रकट होता है। कुरु देश का क्षेत्रफल बहुत बड़ा नही था। शक्ति संगम तन्त्र ( ३:७:२३) में कुरु राष्ट्र कश्मीर आदि से छोटा था। कुरु देश हस्तिनापुर से आरम्भ होकर दक्षिण में कुरुक्षेत्र तक और पांचाल पूर्व दिशा तक विस्तृत था । इसके अनुसार सरस्वती तथा दृषद्वती नदियों के मध्य कुरुक्षेत्र था । अर्थात् दक्षिण में सरस्वती उत्तर दृषद्वती नदियाँ थीं। मनुस्मृति में इस प्रदेश को ब्रह्मावर्त कहा गया है । ( मनु० २:१७ ) दक्षिण कुरु प्रदेश की सीमा पूर्व में पांचाल, दक्षिण में सरस्वती तथा उत्तर में दृषद्वती नदियाँ हो जाती है। वाहीक प्रदेश कुरुक्षेत्र के पश्चिम होना चाहिए । वाहीक अंचल के लिए महाभारत में प्रायः भद्र, यातिक, अरट्ट तथा पंचनद शब्दों का प्रयोग किया गया है। वर्तमान सोनपत, अमीन, करनाल, पानी- पत के जिले कुरुक्षेत्र में माने जा सकते हैं। कुरुजांगल कुरुक्षेत्र का जंगली भाग मालूम होता है। वह उत्तर में काम्यक वन तक फैला था। दक्षिण में कुरुदेश खाण्डव वन तथा सरस्वती के तट तक फैला था। ( महाभारत १:५:३ ) यह क्षेत्र का पूर्वीय भाग था। यह गंगा तथा उत्तर पांचाल के मध्य विस्तृत था । कुरुक्षेत्र के विषय में महाभारत में कहा गया है। यह क्षेत्र पवित्र है। वहाँ की रजस्पर्श से भी मनुष्य को स्वर्ग प्राप्ति होती है। कुरुक्षेत्र में जो सरस्वती के दक्षिण तथा दृषद्वती के उत्तर निवास करते हैं, जैसे स्वर्ग में निवास करते हैं ।
६० राजतरंगिणी पाणिनि की अष्टाध्यायी (४:१-१७२-१७६ तथा ४:२:१३०) में इसका वर्णन है। योगिनी तंत्र (२:१, २:७-८) में इसका उल्लेख है। हुएनसांग वर्णन करता है। थानेश्वर वंश का राज्य था। जिसका दक्षिणी राजपूताना तथा कुछ भाग उत्तर प्रदेश का था। सन् ६४८ ई० में एक चीनी राजदूत हर्षवर्धन की राज्यसभा में भेजा गया था। उसके अनुसार सेनापति अर्जुन ने राज्य पर अधिकार कर लिया था। राजा के वंश का लोप हो गया था। थानेश्वर का महत्त्व कायम रहा। परन्तु सन् १०१४ में महमूद गजनो ने इस पर अधिकार कर लिया था। परन्तु सन् १०४३ में दिल्ली के हिन्दू राज्य के अधीन पुनः चला गया। कुरुक्षेत्र का सामरिक महत्त्व है। इस क्षेत्र में महाभारत तथा तीनों पानीपत के युद्ध हुए थे। इन चारों युद्धों ने भारतीय राजनीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया था। चारा युद्धो के कारण भारत के केन्द्रीय राज्य शासन, वंश तथा प्रणालियों में आमूल परिवर्तन हुआ है। सूर्य ग्रहण के अवसर पर यहाँ के सरोवर में स्नान करने का महत्त्व है। मैं कुरुक्षेत्र गया हूँ। सरोवर कमल से पूर्ण हैं। पानी की कमी नहीं है। मैदान है। पैदावार खूब है। प्राचीन काल में घोड़ा, हाथी, ऊँट के लिए चारा तथा पानी की आवश्यकता होती थी। उस समय इसके गुवास के कारण क्षेत्र का सामरिक महत्त्व था।
परिशिष्ट 'ज' शक ( तरंग : १ : ५२ : पृष्ठ ९६; २ : ६ पृष्ठ ३८० तथा ३ : १२८ ) ऋग्वेद ( ११ : १३२ : ५ ) में शक्रपूत शब्द एक राजा के लिए आया है। अथर्ववेद ( ३ : २४ : ४; २० : १३१ : १६ ) में गोमय के अर्थ में शक्रपूत शब्द का प्रयोग किया गया है। पाणिनि ने अपनी अष्टाध्यायी ( ४ : १ : १७५ ) में शक देश का उल्लेख किया है। बृहद् संहिता में ( १४ : २१ ) में शक- द्वीप को शक जाति का निवास स्थान कहा गया है। मनुस्मृति ने ( ११ : ४३, ४४ ) शकों का यवन के साथ उल्लेख कर उन्हें शूद्रों की श्रेणी में पतित क्षत्री कहकर रखा है। पाणिनि ने ( ४ : १ : १७५ ) कम्बोज- आदि गणों में शकों का उल्लेख किया है। मनु ने ( १० : ४ ) बर्बरों को शक, शवर, यवन आदि में गिना है। वायु पुराण में उल्लेख आता है : 'शका हृदा कुलिन्दाश्च', 'शकाः हृदाः कुणिन्दाश्च' तथा 'शका- द्विहा रुलिताश्च'। ब्रह्माण्ड पुराण में 'शका हूणाः कुलिन्दाश्च', मत्स्य पुराण में 'शका द्रुह्याः पुलिन्दाश्च' उल्लेख मिलता है। सिरीन्ध्रान् कुकुरांश्चीनान् बर्बरान् यवनान् शकान् । रूपाणांश्च कुणिन्दाश्च अंतलोकवरांश्चवान् ॥ वायु पुराण में 'बर्बरान्, यवनान् द्रुहान्', ब्रह्माण्ड पुराण में 'बर्बरान् यवनान् द्रुहान्', मत्स्य पुराण में 'बर्बरान् यवनान् खसान्'; बर्बरान् यवनान् खसान्', 'बर्बरान् यवनांश्छकान्', 'बर्बरान् यवनान् द्रुहान्।' उल्लेख मिलता है। शकों का मूल निवास स्थान सीर तथा आमू दरिया की उपत्यका माना जाता है। एक और उल्लेख मिलता है। अथ चीनमरूंश्चैव तंगणान् सर्वशूलिकान् । साभ्रांस्तुषारान् लम्प्याकान् पह्लवान् पारदान् शकान् ॥ वायु पुराण में—'पह्लवान् दरदान् शकान्', मत्स्य पुराण में—'पह्लवान् पारदान् शकान्; ब्रह्माण्ड पुराण में—'पह्लवान् दरदान् शकान् ।" आदि का उल्लेख मिलता है। इसी पुराण ( २ : १६ : ४८ ) में उसे उदीच्य का एक देश माना गया है। वायु पुराण ( ९९ : ३१०-३२४ तथा ३६१ ) के अनुसार पच्चीस शक राजाओं को शिशुनाग, ऐक्ष्वाक, पांचाल, हैहय, कलिंग राजाओं का समकालीन कहा गया है। उनका राज्यकाल ३८० वर्ष कहा गया है। मत्स्य पुराण ( २७२ : १८ ) अट्ठारह शक राजाओं का उल्लेख करता है। वहाँ पर उनका उल्लेख सात आन्ध्र, दस आभीर तथा ७ गर्दभिल्लों के पश्चात् किया गया है। विष्णु पुराण ( ४ : २४ : ५२ ) में
६२ राजतरंगिणी शकराजाओं की संख्या १६ दी गयी है। इनका उल्लेख ( १ : १३ : १२०-१२४ ; ३ : ७३ : १०८; ३ : ७४ : १३७, १७२-१७५ ) में आता है। स्कन्दपुराण ( १ : २ : ४० ) में वर्णन आता है कि कलियुगारम्भ होने पर एक लाख एक सौ वर्ष तक शकराजा होंगे । संस्कृत साहित्य में चतुर्द्वीप, सप्त द्वीप, नव द्वीप, द्वादश द्वीप, त्रयोदश द्वीप, अष्टादश द्वीपों का उल्लेख मिलता है । पुराणों में सातों द्वीपों को समुद्रों से घिरा बताया गया है । वायु तथा अन्य पुराणों में क्रम, जम्बू, प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौंच, शाक तथा पुष्करादि द्वीपों की तालिका दी गयी है । मत्स्य पुराण में जम्बू, शक, कुश, क्रौंच, शाल्मली, गोमेध ( प्लक्ष ) और पुष्कर सात द्वीपों का उल्लेख किया गया है । क्षीरसागर को क्षीरोद भी कहते हैं । वर्तमान उत्तर अटलाण्टिक महासागर के दक्षिणेशीय भाग तथा आर्कटिक समुद्र को कुछ विद्वान् क्षीर सागर कहते हैं । विद्वान् वडेर क्षीर सागर को कैस्पियन सागर तथा विल्फर्ड उसे जर्मन समुद्र कहते हैं । क्षीर अर्थात् दूध का रंग उज्ज्वल होता है । उत्तर आर्कटिक सागर तुषार पात के कारण श्वेत रूप धारण कर लेता है । कास्पियन सागर भी शिशिर ऋतु में जमकर श्वेत रूप हो जाता है । यह बात भारतीय महासागर तथा उससे सम्बन्धित सागर एवं आगत के सम्बन्ध में लागू नहीं होती । उष्ण तथा शीतोष्ण कटिबन्ध में होने के कारण वे कभी जमते नहीं । कैस्पियन सागर तथा आर्कटिक सागर दूध की तरह जमकर श्वेत रूप शिशिर ऋतु में धारण कर लेते हैं । मालूम होता है कि यहा क्षीर सागर नाम कैस्पियन सागर के लिए प्रयोग किया है । शक द्वीप को क्षीर सागर से घिरा हुआ कहा गया है । प्रत्येक द्वीप में ७ पर्वत, ७ वर्ष तथा ७ नदियों का उल्लेख किया गया है । सप्त सिन्धु, सप्त वर्ष, सप्त पर्वत, सप्त ऋषि, सप्त द्वीप, सप्त नदी, सप्तगंगा, सप्त पुरी, सप्त वासर, आदि सप्त संख्या देने की एक शैली किंवा परम्परा प्राचीन काल में चल गयी थी । सम्भव है कि सप्त के आधार पर सम्भवतः लोकप्रिय बनाने तथा स्मृति में चिरस्थायी रखने के लिए एक उपाय निकाला गया होगा । पर्वतादि के वर्णन में द्विनाम देने की प्रथा थी । एक ही पर्वत के दो नाम होते थे । शक द्वीप के सप्त पर्वत हैं यथा—( १ ) मेरु-उदय ( पामीर ), ( २ ) जलधारा-चन्द्र ( वोल्गा नदी का पठार ) ( ३ ) दुर्ग-शैल-नारद ( कैस्पियन द्वार ), ( ४ ) श्याम-दुन्दुभी ( उत्तरीय पर्वतमाला ), ( ५ ) अस्तगिरि- गोमक ( ६ ) आम्बिकेय-सुमन, ( ७ ) विभ्राज-केशव ( जगरास पर्वत ) । वायु पुराण में केशव का रम्या तथा वैदारी पर्वत नाम से उल्लेख किया गया है । शक द्वीप के सात वर्ष हैं । उक्त सातो पर्वतों के नाम पर दिये गये हैं अथवा उन पर्वतों के मूल तथा उपत्यका में थे । : (१) उदय वर्ष ( उदय पर्वत ), (२) सुकुमार-शिशिर ( जलधार पर्वत वोल्गा नदी की उपत्यका ) ( ३ ) कौभारः सुखोदय ( दुर्ग शैल ) (४) मणि चक्र-आनन्दक ( श्याम पर्वत जरफसा नदी की उपत्यका ) (५) कुमुमोत्तर-असित ( सोमकपर्वत ) यूनानी लेखकों का कोमी दोहि प्रदेश ) ( ६ ) मैनाक- क्षेमक ( आग्निनेय पर्वत ) (७) विभाज-ध्रुव ( विभ्राज पर्वत ) । शक द्वीप की सप्त नदियाँ हैं : (१) सुकुमारि = मुनितप्ता (२) कुमारी = तप सिद्धा (३) नन्दा पावनी (४) शिविका = द्विविधा (५) इक्षु = कुहू = वक्षु = आमू दरया (६) वेणुका = अमृता (७) सुकृता= गभस्ति । महाभारत में शक द्वीप की सात नदिया (१) सुकुमारी = (वोल्गा) (२) कुमारी (कुभा) (३) सोता (सीरदरया) (४) कावेरका (५) महानदी (डान नदी) (६) कौरव्य, (७) मणि जला (जरफमा नदी) दिया गया है । यूनानियों के सोधियन डाक तथा चीनियों की यू-ये-चि० (ऋक्षिक) जाति पामीर (मेरु) से काश्पि- यन (कश्यप ) सागर तक फैली थी ।
परिशिष्ट ज ६३ स्कन्द पुराण (१:२:४०) में शकों का उल्लेख आया है। कलियुग आरम्भ में उन्हें एक लाख एक वर्ष राज्य करना लिखा है। राजा सगर ने इन्हें जीता था। इसका उल्लेख भागवत पुराण (९:८:५) में मिलता है। शक यवनों का वशिष्ठ के शरण जाने का उल्लेख पद्मपुराण (६० : २०) में किया गया है। पतंजलि ने इनका निर्देश पातंजलि सूत्र (२.४:१०) में किया है। महाभारत में शक देश तथा शक जाति का निम्नलिखित स्थानों पर निम्नलिखित संदर्भ के साथ उल्लेख किया गया है। 'एक भारतीय जनपद और जाति। शक जाति के लोग वशिष्ठ की नन्दिनी गाय के मन से प्रकट हुए थे (आदि० १७४-३६)। भीमसेन ने पूर्व-दिग्विजय के समय शकों को परास्त किया था (सभा० ३०:१४)। नकुल ने भी इन पर विजय पायी थी (सभा० ३२ : १७)। शक देश और जाति के राजा राजसूय यज्ञ में युधिष्ठिर के लिए भेंट लाए थे (सभा० ५१:३०)। कलियुग में शक आदि जातियों के लोगों के राजा होने का उल्लेख मिलता है। (वन० १८८.३५)। शक देश के राजा के पास पाण्डवों की ओर से रण-निमन्त्रण भेजने का विचार किया गया था (उद्योग० ४.१५)। ये काम्बोज राज सुदक्षिण के साथ दुर्योधन की सेना में सम्मिलित हुए थे (उद्योग १९:२१)। शक एक भारतीय जनपद का नाम है (भी० प० ९:५१)। भगवान् श्रीकृष्ण ने शक देश पर विजय पायी थी (द्रोण० ११:१८)। सात्यकि ने बहुत से शक सैनिकों का संहार किया था (द्रोण० ११९.४५ ११९.४५, ५३)। कर्ण ने भी शक देश को जीता था (कर्ण० ८:१८)। शक पहले क्षत्रिय थे, परन्तु ब्राह्मणों के दर्शन से वंचित होने के कारण (अपने धर्म-कर्म से भ्रष्ट हो) शूद्र भाव प्राप्त किये थे। (अनु० ३३:२१)। मनु संहिता में उन्हें वृषल क्षत्रिय कहा है। प्राचीन शकों का मूल स्थान इस समय रूस गणतन्त्र राज्य में है। रूसी इतिहासकारों ने इस पर यथेष्ट अन्वेषण किया है। उन्होंने शक जाति को डुनार अर्थात डैन्यूब नदी से त्यान्शान् अल्ताई के मध्य की भूमि को भारतीय शक द्वीप माना है। प्राचीन ईरानी भाषा में इसकी संज्ञा शकान वेइजा दिया गया है। इसको शकिस्तान तथा शीस्तान कहते हैं। हूणों के कारण शक जाति तथा देश विघटित हो गया था। एक मत है ओक्सस तथा जक्सस रोज नदी की उपत्यका से पामीर के मूल तक उनका निवास क्षेत्र था। वह क्षेत्र वर्तमान सभी तुर्किस्तान चीनी तुर्किस्तान तथा मध्य एशिया है। यूरोपीय लेखकों ने शकों को शकाई तथा चीनी लेखकों ने 'शे' लिखा है। उनके मतानुसार मूल शब्द 'शोक' अथवा 'शोक' था। चीनी लेखक उन्हें पशुपालक जाति कहते हैं। उनका मत है कि वे काशगर के समीपवर्ती भूभाग में विचरण करते थे। सन् १६४ ई० पू० ए-ची-जाति ने उन पर पूर्व दिशा से आक्रमण किया। वे उद्वासित हो गये। उनका एक भाग अफगानिस्तान के पश्चिमी खण्ड में बस गया। उस खण्ड को शीस्तान अथवा शकस्थान कहते हैं। उनका दूसरी शाखा पूर्वी ईरान में जाकर आबाद हुई। शक जाति इस प्रकार दो शाखाओं में विभाजित हो गयी थी। यह भी मत है कि एक शाखा ने तुर्किस्तान से कश्मीर में प्रवेश किया। वे कश्मीर के दक्षिण में आबाद हो गये थे। दूसरी शाखा जो पूर्वी ईरान में आबाद हो गयी थी उसका सम्बन्ध पल्लव जाति से हुआ। वह शाखा भारतवर्ष में कालान्तर में आयी। यह शाखा भारत में खैबर पास से न आकर बोलन पास किंवा मुल्ला पास द्वारा भारत में प्रवेश की थी। मलाया प्रायद्वीप के वनों में एक आदिम जाति रहती है। उसका नाम शकाई है। उसकी संज्ञा
६२ राजतरंगिणी शकराजाओं की संख्या १६ दी गयी है। इनका उल्लेख ( १ : ६३ : १२०-१२४ ; ३ : ७३ : १०८; ३ : ७४ : १३७; १७२-१७५ ) में आता है। स्कन्दपुराण ( १ : २ : ४० ) में वर्णन आता है कि कलियुगारम्भ होने पर एक लाख एक सौ वर्ष तक शकराजा होगे। संस्कृत साहित्य में चतुर्द्वीप, सप्त द्वीप, नव द्वीप, द्वादश द्वीप, त्रयोदश द्वीप, अष्टादश द्वीपो का उल्लेख मिलता है। पुराणों में सातो द्वीपो को समुद्रों से घिरा बताया गया है। वायु तथा अन्य पुराणों में क्रम, जम्बू, प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौंच, शाक तथा पुष्करादि द्वीपों की तालिका दी गयी है। मत्स्य पुराण में जम्बू, शरु, कुश, क्रौंच, शाल्मली, गोमेध ( प्लक्ष ) और पुष्कर सात द्वीपो का उल्लेख किया गया है। क्षीरसागर को क्षीरोद भी कहते हैं। वर्तमान उत्तर अतलान्तिक महासागर के पश्चिमोय भाग तथा आर्कटिक समुद्र को कुछ विद्वान् क्षीर सागर कहते हैं। विद्वान् वडेर क्षीर सागर को कैस्पियन सागर तथा विल्फर्ड उसे जर्मन समुद्र कहते हैं। क्षीर अर्थात् दूध का रंग उज्ज्वल होना है। उत्तर आर्कटिक सागर तुषार पात के कारण श्वेत रूप धारण कर लेता है। कास्पियन सागर भी शिशिर ऋतु मे जमकर श्वेत रूप हो जाता है। यह बात भारतीय महासागर तथा उससे सम्बन्धित सागर एवं खागात के सम्बन्ध में लागू नहीं होती। उष्ण तथा शीतोष्ण कटिबन्ध में होने के कारण वे कभी जमते नही। कैस्पियन सागर तथा आर्कटिक सागर दूध की तरह जमकर श्वेत रूप शिशिर ऋतु में धारण कर लेते हैं। मालूम होता है कि यहा क्षीर सागर नाम कैस्पियन सागर के लिए प्रयोग किया है। शक द्वीप को क्षीर सागर से घिरा हुआ कहा गया है। प्रत्येक द्वीप मे ७ पर्वत, ७ वर्ष तथा ७ नदियों का उल्लेख किया गया है। सप्त सिन्धु, सप्त वर्ष, सप्त पर्वत, सप्त ऋषि, सप्त द्वीप, सप्त नदी, सप्तगंगा, सप्त पुरी, सप्त वासर, आदि सप्त संख्या देने की एक शैली किंवा परम्परा प्राचीन काल में चल गयी थी। सम्भव है कि सप्त के आधार पर सम्भवतः लोकप्रिय बनाने तथा स्मृति में चिरस्थायी रखने के लिए एक उपाय निकाला गया होगा। पर्वतादि के वर्णन में द्विनाम देने की प्रथा थी। एक ही पर्वत के दो नाम होते थे। शक द्वीप के सप्त पर्वत है यथा—( १ ) मेरु-उदय ( पामीर ), ( २ ) जलधारा-चन्द्र ( वोल्गा नदी का पठार ) ( ३ ) दुर्ग-शैल-नारद ( कैस्पियन द्वार ), ( ४ ) श्याम-दुन्दुभी ( उत्तरीय पर्वतमाला ), ( ५ ) अस्तगिरि- सोमक ( ६ ) आम्बिकेय-सुमन, ( ७ ) विभ्राज-केशव ( जगरास पर्वत )। वायु पुराण मे केशव का रम्या तथा वैशारी पर्वत नाम से उल्लेख किया गया है। शक द्वीप के सात वर्ष है। उक्त सातों पर्वतो के नाम पर दिये गये है अथवा उन पर्वतो के मूल तथा उपत्यका में ये : (१) उदय वर्ष ( उदय पर्वत ), (२) सुकुमार-शिशिर ( जलधार पर्वत वोल्गा नदी की उपत्यका ) ( ३ ) कौमारः सुखोदय ( दुर्ग शैल ) (४) मणि चक्र-आनन्दक ( श्याम पर्वत जरफशा नदी की उपत्यका ) (५) कुसुमोत्कर-असित ( सोमकपर्वत ) यूनानी लेखको का कोमी दोहि प्रदेश ) ( ६ ) मैनाक- क्षेमक ( आम्बिरेय पर्वत ) (७) विभाज-ध्रुव ( विभ्राज पर्वत ) । शक द्वीप की सप्त नदियाँ हैं : (१) सुकुमारि = मुनितमा (२) कुमारी = तप सिद्धा (३) नन्दा पावनी (४) विविधा = द्विविधा (५) इक्षु = कुहु = वक्षु = आमू दरया (६) वेणुका = अमृता (७) सुकृता= गभस्ति । महाभारत में शक द्वीप की सात नदियां (१) सुकुमारी = (वोल्गा) (२) कुमारी (कुभा) (३) सीता (गीरदरया) (८) कावेरशा (५) महानदी (हान नदी) (६) कोरम्ब, (७) मणि जला (जरफशा नदी) दिया गया है। यूनानियों के सोथियन शक तथा चीनियों की यू-ये-चि० (ऋषिक) जाति पामीर (मेरु) से कास्पि- यन ( कश्यप ) सागर तक फैली थी ।
परिशिष्ट ज ६३
स्कन्द पुराण (१:२:४०) में शकों का उल्लेख आया है। कलियुग आरम्भ में उन्हें एक लाख एक वर्ष राज्य करना लिखा है। राजा सगर ने इन्हें जीता था। इसका उल्लेख भागवत पुराण (९:८:५) में मिलता है। शक यवनों का वशिष्ठ के शरण जाने का उल्लेख पद्मपुराण (६० : २०) में किया गया है। पतंजलि ने इनका निर्देश पातंजलि सूत्र (२:४:१०) में किया है। महाभारत में शक देश तथा शक जाति का निम्नलिखित स्थानों पर निम्नलिखित संदर्भ के साथ उल्लेख किया गया है। 'एक भारतीय जनपद और जाति। शक जाति के लोग वशिष्ठ की नन्दिनी गाय के मन से प्रकट हुए थे (आदि० १७४-३६)। भीमसेन ने पूर्व-दिग्विजय के समय शकों को परास्त किया था (सभा० ३०:१४)। नकुल ने भी इन पर विजय पायी थी (सभा० ३२ : १७)। शक देश और जाति के राजा राजसूय यज्ञ में युधिष्ठिर के लिए भेंट लाए थे (सभा० ५१:३०)। कलियुग में शक आदि जातियों के लोगों के राजा होने का उल्लेख मिलता है। (वन० १८८ : १५)। शक देश के राजा के पास पाण्डवों की ओर से रण-निमन्त्रण भेजने का विचार किया गया था (उद्योग० ४:१५)। ये काम्बोज राज सुदक्षिण के साथ दुर्योधन की सेना में सम्मिलित हुए थे (उद्योग १९:२१)। शक एक भारतीय जनपद का नाम है (भी० म० ९०५१)। भगवान् श्रीकृष्ण ने शक देश पर विजय पायी थी (द्रोण० ११:१८)। सात्यकि ने बहुत से शक सैनिकों का संहार किया था (द्रोण० ११९:४५ ११९:४५, ५३)। कर्ण ने भी शक देश को जीता था (कर्ण० ८:१८)। शक पहले क्षत्रिय थे, परन्तु ब्राह्मणों के दर्शन से वंचित होने के कारण (अपने धर्म-कर्म से भ्रष्ट हो) शूद्र भाव प्राप्त किये थे। (अनु० ३३:२१)। मनु संहिता में उन्हें वृषल क्षत्रिय कहा है। प्राचीन शकों का मूल स्थान इस समय रूस गणतन्त्र राज्य में है। रूसी इतिहासकारों ने इस पर यथेष्ट अन्वेषण किया है। उन्होंने शक जाति को दुनार अर्थात् डैन्यूब नदी से त्यान्शान् अल्ताई के मध्य की भूमि को भारतीय शक द्वीप माना है। प्राचीन ईरानी भाषा में इसकी संज्ञा शकान वैश्जा दिया गया है। इसको शास्थान तथा शीस्तान कहते हैं। हूणों के कारण शक जाति तथा देश विघटित हो गया था। एक मत है ओक्सस तथा जक्सस रीज नदी की उपत्यका से पामीर के मूल तक उनका निवास क्षेत्र था। वह क्षेत्र वर्तमान सभी तुर्किस्तान चीनी तुर्किस्तान तथा मध्य एशिया है। यूरोपीय लेखकों ने शकों को शकाई तथा चीनी लेखकों ने 'शे' लिखा है। उनके मतानुसार मूल शब्द 'शैक' अथवा 'शोक' था। चीनी लेखक उन्हें पशुपालक जाति कहते हैं। उनका मत है कि वे काशगर के समीपवर्ती भूभाग में विचरण करते थे। सन् १६४ ई० पू० ए-चो-जाति ने उन पर पूर्व दिशा से आक्रमण किया। वे उद्वासित हो गये। उनका एक भाग अफगानिस्तान के पश्चिमी खण्ड में बस गया। उस खण्ड को शीस्तान अथवा शकस्थान कहते हैं। उनका दूसरी शाखा पूर्वी ईरान में जाकर आबाद हुई। शक जाति इस प्रकार दो शाखाओं में विभाजित हो गयी थी। यह भी मत है कि एक शाखा ने तुर्किस्तान से कश्मीर में प्रवेश किया। वे कश्मीर के दक्षिण में आबाद हो गये थे। दूसरी शाखा जो पूर्वी ईरान में आबाद हो गयी थी उसका सम्बन्ध पल्लव जाति से हुआ। वह शाखा भारतवर्ष में कालान्तर में आयी। यह शाखा भारत में खैबर पास से न आकर बोलन पास किंवा मुल्ला पास द्वारा भारत में प्रवेश की थी। मलाया प्रायद्वीप के वनों में एक आदिम जाति रहती है। उसका नाम शकाई है। उसकी संज्ञा