भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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आपगा नदी बहती है। उत्तर कुरु का उल्लेख संस्कृत साहित्य में मिलता है। पुरूरवा एल का पिता बाल्हीक देश से मध्यदेश आया था। पपंच सूदनी में कुरुओं को हिमालय पार से आने वाला बताया गया है। भार- तीय कुरुओं को उनका उपनिविष्ट कहा गया है। उत्तर कुरु महाभारत के अनुसार कैलास एवं बदरिका आश्रम के मध्य था। (म० भा० १ : १४५) मध्यदेश के बसने वाले कुरुओ को दक्षिण कुरु नाम से अभि- हित किया गया है। दक्षिण कुरुओं के राज्य का प्रतिष्ठाता भरत को माना गया है। दक्षिण कुरु लोगों का उल्लेख बौद्ध ग्रन्थों में किया गया है। पपंच सूदनी में दक्षिण कुरुओं का उल्लेख मिलता है। अंगुत्तर निकाय के अनुसार जम्बू द्वीप के जनपदों में कुरु एक महाजनपद था। ब्राह्मण तथा बौद्ध दोनों साहित्यों में प्रायः कुरु पंचाल का उल्लेख एक साथ किया गया है। शायद ही कहीं कुरु का नाम अकेले लिया गया है। पपंचसूदनी से पता चलता है। कुरु प्रदेश की राजधानी में बुद्ध के निवास निमित्त कोई विहार नहीं था। किन्तु कम्मासदभ्य के बाहर एक वन था। उसमें भगवान् निवास करते थे। वहीं यह भी उल्लेख आता है। कुरु देश के लोगों का स्वास्थ्य बड़ा अच्छा था। उनका मस्तिष्क उर्वर था। वे धर्म की किसी बात को समझने के लिए सर्वदा प्रस्तुत रहते थे। सब ऋतुओं में वहा की जलवायु बहुत अच्छी रहती थी। खाद्य पदार्थ स्वादिष्ट और पुष्टकर मिलते थे। भगवान् बुद्ध ने कुरुओं को धर्म ज्ञान सिखाया था। बुद्ध धर्म की कथाओं में कुरुओं का प्रचुर वर्णन कथानक आदि के रूप में आया है। वीर गाथा की रचना में रट्ठपाल का हाथ था। वह कुरु के थुल्लकोठिका में पैदा हुआ था। उसने कौरव्य राजा को बुद्ध धर्म में दीक्षित किया था। धम्मपद के भाष्य में अग्निदत्त की कथा आती है। बड़कोशल अर्थात् महाकोशल राजा का पुरोहित था। वह कुरु तथा अंग और मगध की सीमा पर निवास करता था। उसके संघ में १० हजार शिष्य थे। कुरु आदि जनता उनके भोजन का प्रबन्ध करती थी। कालान्तर में अग्निदत्त तथा उसके शिष्यों ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। थेरगाथा में उल्लेख है। थेरी नन्दुत्तरा का पुनर्जन्म एक ब्राह्मण कुटुम्ब में कम्मासदभ्य अर्थात् कम्मा- सधम्म कुरुदेश में हुआ था। इस नगर का नामकरण कम्मास राजा के नाम पर हुआ था। जयदिस पांचाल राजा के पुत्र रूप में ग्रहण किया था। जयदिस जातक में इस सम्बन्ध में कथा वर्णित है। बोधिसत्त्व ने कम्मास पर नियन्त्रण किया था। राजा जयदिस का दूसरा पुत्र कम्मास था। एक पक्षिणी द्वारा उठा ले जाया गया था। पक्षिणी ने उसे नरमांस भक्षी बना दिया था। बोधिसत्त्व ने उसका भी सुधार किया था। उसे कम्मास इसलिए कहते हैं कि उसके पाद पर काला चिह्न था। यह पौराणिक कथा कल्माषपाद से मिलती है। नन्दुत्तरा पहले जैन हुई। कालान्तर में महा कच्च्यान द्वारा बुद्ध धर्म में प्रव्रजित हुई। पर- मार्थ दीपनी में इसी प्रकार शेरनी का उल्लेख मिलता है। पपंचसूदनी में कुरु के जन्म का विचित्र वर्णन किया गया है। महामान्धाता जम्बूद्वीप का चक्रवर्ती राजा था। उसने पूर्व विदेह, अपर गोपान, उत्तर कुरु तथा देवलोकदर पर विजय प्राप्त किया था। वह उत्तर कुरु से विजय कर लौट रहा था। एक बहुत बड़ा जन समुदाय उत्तर कुरु से जम्बू द्वीप में उसके साथ आया। वे जहां आबाद हुए, उसका नाम कुरु अर्थात् कुरुराष्ट्र पड़ा। कुरु की प्राचीन राजधानो हस्तिनापुर गंगा तट पर थी। इन्द्रप्रस्थ अर्थात् दिल्ली बाद में उनकी राजधानी हुई। गाया है। धृतराष्ट्र हस्तिनापुर में राज करते थे। इन्द्रप्रस्थ पाण्डवों को दे दिया था। दिल्ली में पाण्डवों का किला पुराना किला के नाम से प्रख्यात है। वर्तमान किला शेरशाह सूरी का बनवाया हुआ ८