भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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५६ राजतरंगिणी शर्मिष्ठा थी। उनका पुत्र पुरु था। वह नहुष का पौत्र था। पुरुरवा स्वायंभुव मनु की पुत्री इला का पुत्र था। उसका पिता बुध था। उसकी पांचवी पीढ़ी में था। यह चन्द्रवंशीय क्षत्रियों का आदि पुरुष था। ययाति के पुत्र पुरु के नाम पर पौरव वंश का नामकरण हुआ था। इस वंश में दुष्यंत के पुत्र भरत भारतवर्ष के चक्र- वर्ती सम्राट् हुए थे। पुरु के वंशज पौरव कहलाए। पुरु के दसवी पीढ़ी में संवरण हुआ। पांचाल ने उस पर आक्रमण किया। अपने कुटुम्ब के साथ सिंधु नदी के तटवर्ती वन में उसने आश्रय लिया। पुरोहित वशिष्ठ के कारण पुनः राज्य प्राप्त किया। सूर्य कन्या तपती द्वारा उसे पुत्र कुरु उत्पन्न हुआ। उसके नाम पर उसके राज्य का नाम कुरुक्षेत्र पड़ा। कुरु की पत्नी वाहिनी से अश्ववान्, अभिप्यन्त, जैत्ररथ, मुनि एवं जनमेजय का जन्म हुआ। इन्हीं के नाम पर कुरु जांगल प्रदेश का नामकरण किया गया। (आदि पर्व ९४ : ४८ तथा ९४ : ४९-५०) इनकी द्वितीय कन्या शुभांगी से विदुर का जन्म हुआ था (आदि पर्व ९२ : ३९७)। इनका और इन्द्र का संवाद कुरुक्षेत्र की भूमि जोतते समय हुआ था। (शल्य पर्व ५३ : ६-१५) कुरुक्षेत्र में यज्ञ करते समय पवित्र सरस्वती नदी सुरेणु नाम से प्रकट हुई थी। इस नदी का नाम ओघवती भी कहा गया है। (शल्य पर्व ३८ २६-२८।) इसी वंश में शान्तनु हुए थे। शान्तनु के पुत्र चित्रांगद एवं विचित्रवीर्य थे। विचित्रवीर्य की रानियों से दो नियोगज पुत्र हुए। उनका नाम धृतराष्ट्र एवं पाण्डु था। धृतराष्ट्र से गान्धारी के दुर्योधनादि एक शत पुत्र हुए। उनका नाम कौरव हुआ। पाण्डु के पुत्रों का वंश पिता के नाम पर पाण्डव वंश कहलाया। अर्जुन का पुत्र अभिमन्यु था। अभिमन्यु का पुत्र परीक्षित था। परीक्षित का पुत्र जन- मेजय था। जनमेजय की तीसरी पीढ़ी में अधिसीम कृष्ण राजा हुए। उसके समय में सर्वप्रथम नैमिषारण्य में महाभारत एवं पुराणों का पाठ हुआ। अधिसीम कृष्ण का पुत्र निचक्षुथा। यह हस्तिनापुर का अन्तिम राजा था। गंगा की प्रबल धारा के कारण हस्तिनापुर जलप्लावित हो गया। प्रजा तथा राजा वहाँ से वत्स क्षेत्र में जाकर शरण लिये। कुरुओं के कुरुक्षेत्र से निकलने का वृत्तान्त शाख्यायन श्रौतसूत्र में प्राप्त होता है। वृद्धद्युम्न से एक यज्ञ में भूल हो गयी थी। अतएव एक ब्राह्मण ने उसे शाप दिया कि उन्हें कुरुक्षेत्र त्यागना पड़ेगा। ऐतिहासिक काल में कुरुक्षेत्र मगध के साम्राज्य के अन्तर्गत महाराज नंद के समय हो गया था। मौर्यों के राज्य में मौर्य राजाओं के शासन में था। मौर्यों के पश्चात् यह कुछ समय के लिये गुप्तों के साम्राज्य के अन्तर्गत आ गया था। गुप्तों के पश्चात् थानेश्वर के पुष्पभूति वंशीय राजाओं ने कुरुक्षेत्र पर शासन किया था। तत्पश्चात् गुर्जर प्रतिहारों तथा राष्ट्रकूटों के अन्तर्गत था। महमूद गजनी ने थानेश्वर पर आक्रमण किया। चक्रस्वामी विष्णु मूर्ति नष्ट किया था। अन्त में पृथ्वीराज चौहान ने इसे मुसलमानों से मुक्त किया। महाभारत के अनुसार सरस्वती तथा दृषद्वती का मध्यवर्ती भाग कुरुक्षेत्र है। इसे ब्रह्मा की यज्ञ वेदी कहा गया है (वन पर्व ८३ : ४, २०४-२०८)। कुरुक्षेत्र के इक्षुमती नदी के तट पर तक्षक नाग रहता था। खाण्डव दाह के पूर्व यहां चला आया था (आदि पर्व ३:१३९-१४२; २२६ ४)। उसने अपनी तपस्या द्वारा कुरुक्षेत्र को पवित्र किया था (आदि पर्व ९४.५०)। सुन्द-उपसुन्द दिशाओं को जीतकर यहां निवास करते थे। कुरुक्षेत्र सीमा में मान्धाता ने यज्ञ किया था (वन १२६-४५)। भीष्म तथा परशुराम का युद्ध कुरुक्षेत्र में हुआ था (उद्योग पर्व १७८.७२)। कौरव पाण्डव का युद्ध इसी क्षेत्र में हुआ था (भीष्म पर्व अध्याय २५-४२)। भीमसेन से दुर्योधन से युद्ध तथा उसके बाद का युद्ध इसी क्षेत्र की सीमा में हुआ था (शल्य पर्व ५५-५८ अध्याय)। भीष्म पितामह इस क्षेत्र में शरशैया पर थे (भीष्म पर्व ११९.९२)। द्वैपायन मित्र की मृत्यु हंसों से गदायुद्ध कर इसी क्षेत्र में हुई थी। महाभारत वन पर्व के अनुसार यमुना के पश्चिम तथा सरस्वती और दृषद्वती के मध्य का क्षेत्र कुरुक्षेत्र है। इसमें सरस्वती है। दृती तथा