भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 860

परिशिष्ट छ ५५ उल्लेख है। अर्थात् सौभागों का मार्ग उत्तर कुरु से होकर जाता था। कुरु शब्द का उल्लेख ११ वें श्लोक में किया गया है। वहां कुरु का उल्लेख शूरसेन, प्रस्मल, कुरु, भरत, मद्र, काम्बोज, यवन, शक, आदि के मध्य आया है। भरत जाति कालान्तर में कुरु में मिल गयी और कुरुक्षेत्र बना। इसका उल्लेख यथास्थान किया गया है। कुरुओं का निवास-स्थान कुरुक्षेत्र प्रदेश है। उनका निवास देश, कुरुक्षेत्र, कुरुजंगल तथा कुरु में विभाजित था। (आदि पर्व १०९:१) शतपथ ब्राह्मण (१३.५ ४:११) में भरत जाति का उल्लेख मिलता है। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार वह देवताओं की यज्ञ भूमि थी। जाबालोपनिषद् में भी इसे देवयज्ञ भूमि माना गया है। महाभारत में इसका एक नाम समंत पंचक दिया गया है। समंत पंचक उत्तर वेदी नाम से भी अभिहित किया गया है। ऋग्वेद (३:२३.४) में उन्हें दृषद्वती, आपया तथा सरस्वती के तटों पर रहना बताया गया है। कालान्तर में यही क्षेत्र कुरुजाति का निवास स्थान हो गया था। प्रतीत होता है। भरत जाति कुरु जाति में आत्मसात् हो गयी। वाजसनेयी संहिता (११:३:३) में एक स्थान पर भरत और कुरुपंचालो के सम्मिलित रूप में उत्तर कुरु का उल्लेख आया है। उत्तर कुरु शतपथ ब्राह्मण (१ २:०:१५) के अनुसार कुरुपंचाल के समान तथा शुद्ध वर्णित किया गया है। ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार उत्तर कुरु हिमालय पार के निवासी थे। कुरु एवं पंचालों में संघर्ष होता रहता था। कुरुओं ने उत्तर पांचाल विजयकर द्रोणाचार्य को दिया था। प्रायः दोनों देशों में वैवाहिक सम्बन्ध भी होता था। पांचाल नरेश केशिन दाल्भ्य कुरुराज उच्चै श्रवस की भगिनी के पुत्र थे। द्रोपदी पांचाल नरेश द्रुपद की कन्या थी। ऐतरेय ब्राह्मण (८:१४) में महाभिषेक के अध्याय में उत्तर कुरु का उल्लेख इन्द्र के महाभिषेक के सन्दर्भ में किया गया है। उन्हें परेण हिमवन्त अर्थात् हिमालय के परे किंवा पार रहने वाला माना गया है। वे ऐतिहासिक जाति थे। सत्यहृष्य ने उत्तर कुरु को देवक्षेत्र कहा है। एक मत है कि उत्तर कुरु के लोग कश्मीर से आकर आबाद हुए थे। वहाँ से पुनः बढ़ते हुए कुरु क्षेत्र में आकर बस गये। उत्तर बौद्ध साहित्य में उत्तर कुरु का प्रायः उल्लेख गाथा कालीन लोगों के रूप में किया गया है। किन्तु यह गाथा ऐतिहासिक उत्तर कुरुओं पर आधारित है। दीप वंश में कुरु द्वीप तथा दासन वंश में उत्तर द्वीप के निवासियों को कुरु रट्ठ (कुरूराष्ट्र) कहा गया है। ब्राह्मण साहित्य में दक्षिण किंवा मध्य देश के कुरु लोगो को अत्यन्त महत्त्व दिया गया है। एक प्रकार से तत्कालीन साहित्य का केन्द्र कुरुपंचाल माना जाता रहा है। कुरुपंचाल नामो के एक साथ उल्लेख से स्पष्ट प्रतीत होता है। ये पर्वतीय राष्ट्र थे। मालूम होता है। उपनिषद् तथा ब्राह्मण रचना काल मे पूर्वोदय में कुरु तथा पंचालो का विशेष महत्त्व एक राष्ट्र के रूप में था। कुरुपंचाल के ब्राह्मण शास्त्रीय कर्म काण्ड कराने में प्रसिद्ध थे। कुरुक्षेत्र को भगवान् ने गीता में धर्मक्षेत्र कहा है। मनु ने कुरु, मत्स्य, पंचाल तथा शूरसेन प्रदेश को ब्राह्मणो को स्थान बताया है। वहाँ ऋषि मुनि निवास करते थे। प्रशंसा करते हुए कहा गया है। इनको युद्ध क्षेत्र में सेना के पृष्ठ भाग में रखना चाहिए। (मनु स्मृति २:१७-१९, ७:१९३) मनु ने इसे ब्रह्मर्षियों का देश कहा है। इस क्षेत्र का नाम महाभारत के अनुसार पहले समन्तपंचक क्षेत्र था। राजा कुरु के समय इसका नाम कुरुक्षेत्र पड़ा। महाभारत में कुरु तथा कुरुक्षेत्र के सम्बन्ध में एक गाथा दी गयी है। ययाति की पत्नी