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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

परिशिष्ट छ ५५ उल्लेख है। अर्थात् सौभागों का मार्ग उत्तर कुरु से होकर जाता था। कुरु शब्द का उल्लेख ११ वें श्लोक में किया गया है। वहां कुरु का उल्लेख शूरसेन, प्रस्मल, कुरु, भरत, मद्र, काम्बोज, यवन, शक, आदि के मध्य आया है। भरत जाति कालान्तर में कुरु में मिल गयी और कुरुक्षेत्र बना। इसका उल्लेख यथास्थान किया गया है। कुरुओं का निवास-स्थान कुरुक्षेत्र प्रदेश है। उनका निवास देश, कुरुक्षेत्र, कुरुजंगल तथा कुरु में विभाजित था। (आदि पर्व १०९:१) शतपथ ब्राह्मण (१३.५ ४:११) में भरत जाति का उल्लेख मिलता है। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार वह देवताओं की यज्ञ भूमि थी। जाबालोपनिषद् में भी इसे देवयज्ञ भूमि माना गया है। महाभारत में इसका एक नाम समंत पंचक दिया गया है। समंत पंचक उत्तर वेदी नाम से भी अभिहित किया गया है। ऋग्वेद (३:२३.४) में उन्हें दृषद्वती, आपया तथा सरस्वती के तटों पर रहना बताया गया है। कालान्तर में यही क्षेत्र कुरुजाति का निवास स्थान हो गया था। प्रतीत होता है। भरत जाति कुरु जाति में आत्मसात् हो गयी। वाजसनेयी संहिता (११:३:३) में एक स्थान पर भरत और कुरुपंचालो के सम्मिलित रूप में उत्तर कुरु का उल्लेख आया है। उत्तर कुरु शतपथ ब्राह्मण (१ २:०:१५) के अनुसार कुरुपंचाल के समान तथा शुद्ध वर्णित किया गया है। ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार उत्तर कुरु हिमालय पार के निवासी थे। कुरु एवं पंचालों में संघर्ष होता रहता था। कुरुओं ने उत्तर पांचाल विजयकर द्रोणाचार्य को दिया था। प्रायः दोनों देशों में वैवाहिक सम्बन्ध भी होता था। पांचाल नरेश केशिन दाल्भ्य कुरुराज उच्चै श्रवस की भगिनी के पुत्र थे। द्रोपदी पांचाल नरेश द्रुपद की कन्या थी। ऐतरेय ब्राह्मण (८:१४) में महाभिषेक के अध्याय में उत्तर कुरु का उल्लेख इन्द्र के महाभिषेक के सन्दर्भ में किया गया है। उन्हें परेण हिमवन्त अर्थात् हिमालय के परे किंवा पार रहने वाला माना गया है। वे ऐतिहासिक जाति थे। सत्यहृष्य ने उत्तर कुरु को देवक्षेत्र कहा है। एक मत है कि उत्तर कुरु के लोग कश्मीर से आकर आबाद हुए थे। वहाँ से पुनः बढ़ते हुए कुरु क्षेत्र में आकर बस गये। उत्तर बौद्ध साहित्य में उत्तर कुरु का प्रायः उल्लेख गाथा कालीन लोगों के रूप में किया गया है। किन्तु यह गाथा ऐतिहासिक उत्तर कुरुओं पर आधारित है। दीप वंश में कुरु द्वीप तथा दासन वंश में उत्तर द्वीप के निवासियों को कुरु रट्ठ (कुरूराष्ट्र) कहा गया है। ब्राह्मण साहित्य में दक्षिण किंवा मध्य देश के कुरु लोगो को अत्यन्त महत्त्व दिया गया है। एक प्रकार से तत्कालीन साहित्य का केन्द्र कुरुपंचाल माना जाता रहा है। कुरुपंचाल नामो के एक साथ उल्लेख से स्पष्ट प्रतीत होता है। ये पर्वतीय राष्ट्र थे। मालूम होता है। उपनिषद् तथा ब्राह्मण रचना काल मे पूर्वोदय में कुरु तथा पंचालो का विशेष महत्त्व एक राष्ट्र के रूप में था। कुरुपंचाल के ब्राह्मण शास्त्रीय कर्म काण्ड कराने में प्रसिद्ध थे। कुरुक्षेत्र को भगवान् ने गीता में धर्मक्षेत्र कहा है। मनु ने कुरु, मत्स्य, पंचाल तथा शूरसेन प्रदेश को ब्राह्मणो को स्थान बताया है। वहाँ ऋषि मुनि निवास करते थे। प्रशंसा करते हुए कहा गया है। इनको युद्ध क्षेत्र में सेना के पृष्ठ भाग में रखना चाहिए। (मनु स्मृति २:१७-१९, ७:१९३) मनु ने इसे ब्रह्मर्षियों का देश कहा है। इस क्षेत्र का नाम महाभारत के अनुसार पहले समन्तपंचक क्षेत्र था। राजा कुरु के समय इसका नाम कुरुक्षेत्र पड़ा। महाभारत में कुरु तथा कुरुक्षेत्र के सम्बन्ध में एक गाथा दी गयी है। ययाति की पत्नी

५६ राजतरंगिणी शर्मिष्ठा थी। उनका पुत्र पुरु था। वह नहुष का पौत्र था। पुरुरवा स्वायंभुव मनु की पुत्री इला का पुत्र था। उसका पिता बुध था। उसकी पांचवी पीढ़ी में था। यह चन्द्रवंशीय क्षत्रियों का आदि पुरुष था। ययाति के पुत्र पुरु के नाम पर पौरव वंश का नामकरण हुआ था। इस वंश में दुष्यंत के पुत्र भरत भारतवर्ष के चक्र- वर्ती सम्राट् हुए थे। पुरु के वंशज पौरव कहलाए। पुरु के दसवी पीढ़ी में संवरण हुआ। पांचाल ने उस पर आक्रमण किया। अपने कुटुम्ब के साथ सिंधु नदी के तटवर्ती वन में उसने आश्रय लिया। पुरोहित वशिष्ठ के कारण पुनः राज्य प्राप्त किया। सूर्य कन्या तपती द्वारा उसे पुत्र कुरु उत्पन्न हुआ। उसके नाम पर उसके राज्य का नाम कुरुक्षेत्र पड़ा। कुरु की पत्नी वाहिनी से अश्ववान्, अभिप्यन्त, जैत्ररथ, मुनि एवं जनमेजय का जन्म हुआ। इन्हीं के नाम पर कुरु जांगल प्रदेश का नामकरण किया गया। (आदि पर्व ९४ : ४८ तथा ९४ : ४९-५०) इनकी द्वितीय कन्या शुभांगी से विदुर का जन्म हुआ था (आदि पर्व ९२ : ३९७)। इनका और इन्द्र का संवाद कुरुक्षेत्र की भूमि जोतते समय हुआ था। (शल्य पर्व ५३ : ६-१५) कुरुक्षेत्र में यज्ञ करते समय पवित्र सरस्वती नदी सुरेणु नाम से प्रकट हुई थी। इस नदी का नाम ओघवती भी कहा गया है। (शल्य पर्व ३८ २६-२८।) इसी वंश में शान्तनु हुए थे। शान्तनु के पुत्र चित्रांगद एवं विचित्रवीर्य थे। विचित्रवीर्य की रानियों से दो नियोगज पुत्र हुए। उनका नाम धृतराष्ट्र एवं पाण्डु था। धृतराष्ट्र से गान्धारी के दुर्योधनादि एक शत पुत्र हुए। उनका नाम कौरव हुआ। पाण्डु के पुत्रों का वंश पिता के नाम पर पाण्डव वंश कहलाया। अर्जुन का पुत्र अभिमन्यु था। अभिमन्यु का पुत्र परीक्षित था। परीक्षित का पुत्र जन- मेजय था। जनमेजय की तीसरी पीढ़ी में अधिसीम कृष्ण राजा हुए। उसके समय में सर्वप्रथम नैमिषारण्य में महाभारत एवं पुराणों का पाठ हुआ। अधिसीम कृष्ण का पुत्र निचक्षुथा। यह हस्तिनापुर का अन्तिम राजा था। गंगा की प्रबल धारा के कारण हस्तिनापुर जलप्लावित हो गया। प्रजा तथा राजा वहाँ से वत्स क्षेत्र में जाकर शरण लिये। कुरुओं के कुरुक्षेत्र से निकलने का वृत्तान्त शाख्यायन श्रौतसूत्र में प्राप्त होता है। वृद्धद्युम्न से एक यज्ञ में भूल हो गयी थी। अतएव एक ब्राह्मण ने उसे शाप दिया कि उन्हें कुरुक्षेत्र त्यागना पड़ेगा। ऐतिहासिक काल में कुरुक्षेत्र मगध के साम्राज्य के अन्तर्गत महाराज नंद के समय हो गया था। मौर्यों के राज्य में मौर्य राजाओं के शासन में था। मौर्यों के पश्चात् यह कुछ समय के लिये गुप्तों के साम्राज्य के अन्तर्गत आ गया था। गुप्तों के पश्चात् थानेश्वर के पुष्पभूति वंशीय राजाओं ने कुरुक्षेत्र पर शासन किया था। तत्पश्चात् गुर्जर प्रतिहारों तथा राष्ट्रकूटों के अन्तर्गत था। महमूद गजनी ने थानेश्वर पर आक्रमण किया। चक्रस्वामी विष्णु मूर्ति नष्ट किया था। अन्त में पृथ्वीराज चौहान ने इसे मुसलमानों से मुक्त किया। महाभारत के अनुसार सरस्वती तथा दृषद्वती का मध्यवर्ती भाग कुरुक्षेत्र है। इसे ब्रह्मा की यज्ञ वेदी कहा गया है (वन पर्व ८३ : ४, २०४-२०८)। कुरुक्षेत्र के इक्षुमती नदी के तट पर तक्षक नाग रहता था। खाण्डव दाह के पूर्व यहां चला आया था (आदि पर्व ३:१३९-१४२; २२६ ४)। उसने अपनी तपस्या द्वारा कुरुक्षेत्र को पवित्र किया था (आदि पर्व ९४.५०)। सुन्द-उपसुन्द दिशाओं को जीतकर यहां निवास करते थे। कुरुक्षेत्र सीमा में मान्धाता ने यज्ञ किया था (वन १२६-४५)। भीष्म तथा परशुराम का युद्ध कुरुक्षेत्र में हुआ था (उद्योग पर्व १७८.७२)। कौरव पाण्डव का युद्ध इसी क्षेत्र में हुआ था (भीष्म पर्व अध्याय २५-४२)। भीमसेन से दुर्योधन से युद्ध तथा उसके बाद का युद्ध इसी क्षेत्र की सीमा में हुआ था (शल्य पर्व ५५-५८ अध्याय)। भीष्म पितामह इस क्षेत्र में शरशैया पर थे (भीष्म पर्व ११९.९२)। द्वैपायन मित्र की मृत्यु हंसों से गदायुद्ध कर इसी क्षेत्र में हुई थी। महाभारत वन पर्व के अनुसार यमुना के पश्चिम तथा सरस्वती और दृषद्वती के मध्य का क्षेत्र कुरुक्षेत्र है। इसमें सरस्वती है। दृती तथा

आपगा नदी बहती है। उत्तर कुरु का उल्लेख संस्कृत साहित्य में मिलता है। पुरूरवा एल का पिता बाल्हीक देश से मध्यदेश आया था। पपंच सूदनी में कुरुओं को हिमालय पार से आने वाला बताया गया है। भार- तीय कुरुओं को उनका उपनिविष्ट कहा गया है। उत्तर कुरु महाभारत के अनुसार कैलास एवं बदरिका आश्रम के मध्य था। (म० भा० १ : १४५) मध्यदेश के बसने वाले कुरुओ को दक्षिण कुरु नाम से अभि- हित किया गया है। दक्षिण कुरुओं के राज्य का प्रतिष्ठाता भरत को माना गया है। दक्षिण कुरु लोगों का उल्लेख बौद्ध ग्रन्थों में किया गया है। पपंच सूदनी में दक्षिण कुरुओं का उल्लेख मिलता है। अंगुत्तर निकाय के अनुसार जम्बू द्वीप के जनपदों में कुरु एक महाजनपद था। ब्राह्मण तथा बौद्ध दोनों साहित्यों में प्रायः कुरु पंचाल का उल्लेख एक साथ किया गया है। शायद ही कहीं कुरु का नाम अकेले लिया गया है। पपंचसूदनी से पता चलता है। कुरु प्रदेश की राजधानी में बुद्ध के निवास निमित्त कोई विहार नहीं था। किन्तु कम्मासदभ्य के बाहर एक वन था। उसमें भगवान् निवास करते थे। वहीं यह भी उल्लेख आता है। कुरु देश के लोगों का स्वास्थ्य बड़ा अच्छा था। उनका मस्तिष्क उर्वर था। वे धर्म की किसी बात को समझने के लिए सर्वदा प्रस्तुत रहते थे। सब ऋतुओं में वहा की जलवायु बहुत अच्छी रहती थी। खाद्य पदार्थ स्वादिष्ट और पुष्टकर मिलते थे। भगवान् बुद्ध ने कुरुओं को धर्म ज्ञान सिखाया था। बुद्ध धर्म की कथाओं में कुरुओं का प्रचुर वर्णन कथानक आदि के रूप में आया है। वीर गाथा की रचना में रट्ठपाल का हाथ था। वह कुरु के थुल्लकोठिका में पैदा हुआ था। उसने कौरव्य राजा को बुद्ध धर्म में दीक्षित किया था। धम्मपद के भाष्य में अग्निदत्त की कथा आती है। बड़कोशल अर्थात् महाकोशल राजा का पुरोहित था। वह कुरु तथा अंग और मगध की सीमा पर निवास करता था। उसके संघ में १० हजार शिष्य थे। कुरु आदि जनता उनके भोजन का प्रबन्ध करती थी। कालान्तर में अग्निदत्त तथा उसके शिष्यों ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। थेरगाथा में उल्लेख है। थेरी नन्दुत्तरा का पुनर्जन्म एक ब्राह्मण कुटुम्ब में कम्मासदभ्य अर्थात् कम्मा- सधम्म कुरुदेश में हुआ था। इस नगर का नामकरण कम्मास राजा के नाम पर हुआ था। जयदिस पांचाल राजा के पुत्र रूप में ग्रहण किया था। जयदिस जातक में इस सम्बन्ध में कथा वर्णित है। बोधिसत्त्व ने कम्मास पर नियन्त्रण किया था। राजा जयदिस का दूसरा पुत्र कम्मास था। एक पक्षिणी द्वारा उठा ले जाया गया था। पक्षिणी ने उसे नरमांस भक्षी बना दिया था। बोधिसत्त्व ने उसका भी सुधार किया था। उसे कम्मास इसलिए कहते हैं कि उसके पाद पर काला चिह्न था। यह पौराणिक कथा कल्माषपाद से मिलती है। नन्दुत्तरा पहले जैन हुई। कालान्तर में महा कच्च्यान द्वारा बुद्ध धर्म में प्रव्रजित हुई। पर- मार्थ दीपनी में इसी प्रकार शेरनी का उल्लेख मिलता है। पपंचसूदनी में कुरु के जन्म का विचित्र वर्णन किया गया है। महामान्धाता जम्बूद्वीप का चक्रवर्ती राजा था। उसने पूर्व विदेह, अपर गोपान, उत्तर कुरु तथा देवलोकदर पर विजय प्राप्त किया था। वह उत्तर कुरु से विजय कर लौट रहा था। एक बहुत बड़ा जन समुदाय उत्तर कुरु से जम्बू द्वीप में उसके साथ आया। वे जहां आबाद हुए, उसका नाम कुरु अर्थात् कुरुराष्ट्र पड़ा। कुरु की प्राचीन राजधानो हस्तिनापुर गंगा तट पर थी। इन्द्रप्रस्थ अर्थात् दिल्ली बाद में उनकी राजधानी हुई। गाया है। धृतराष्ट्र हस्तिनापुर में राज करते थे। इन्द्रप्रस्थ पाण्डवों को दे दिया था। दिल्ली में पाण्डवों का किला पुराना किला के नाम से प्रख्यात है। वर्तमान किला शेरशाह सूरी का बनवाया हुआ ८

५८ राजतरंगिणी हैं। सम्भव है उसी स्थान पर शेरशाह ने नवीन किला बनवाया होगा। यह किला इण्डिया गेट से दिखाई पड़ता है। हस्तिनापुर कालान्तर में महत्त्वहीन हो गया। इन्द्रप्रस्थ आज भी भारत की राजधानी है। कुरु देश का दूसरा नगर उत्तराध्ययनसूत्र के अनुसार इसुकार, उसुयार किंवा इशुगार था। यह अत्यन्त समृद्धिशाली नगर था। उसकी तुलना स्वर्ग से की गयी है। बौद्ध साहित्य में कुरु से सम्बन्धित अनेक कथाएं मिलती हैं। कुरुधम्म जातक में बोद्धिसत्त्व को कुरु राजा धनंजय का पुत्र इन्द्रप्रस्थ में होना लिखा है। कलिंग में एक बार अवर्षण हुआ। कारण बताया गया। कुरुधम्म का पालन नहीं किया जाता। अतएव अवर्षण हुआ है। कलिंग से ब्राह्मण कुरु देश में धर्म ज्ञान प्राप्ति निमित्त आये। तत्पश्चात् कलिंग में कुरुधर्म का पालन किया जाने लगा। वर्षा हुई। राजा धनंजय कौरव्य का अनेक जातकों में उल्लेख मिलता है। धनंजय को युधिष्ठिर वंशीय कहा गया है। भगवान् बुद्ध उत्तरापथ में आकर शिक्षा दिये थे। कुरु देश में वे विशेष निवास किये थे। एक कथा में कुरु के राजा के मन्त्री का नाम रायरेथ दिया गया है। एक स्थान पर विधुर दिया गया है। कुरु का राज्य ९०० मील विस्तार में बताया गया है। कुरु में राजतंत्रीय शासन व्यवस्था थी। परन्तु कौटिल्य काल में यहाँ गणतन्त्र प्रणाली प्रचलित हो गयी थी। उनके लिए उपजीवी शब्द का व्यवहार किया गया है। अर्थात् सभी नागरिक राजा थे। उनका समाज में स्थान समान था। नवीं शताब्दी, में पता चलता है, धर्मपाल ने चक्रायुध को कन्नौज के राज्य पर बैठाया था। पुराणों में कुरु जाति का वर्णन बहुत मिलता है। वे प्रायः एक जैसे हैं। कुरु क्षत्रिय थे। मगध सम्राट् जरासन्ध के पराजय के पश्चात् उत्तरापथ में कुरु अत्यन्त शक्तिशाली हो गये थे। कुरु राजा शान्तनु के दो पुत्र चित्रांगद तथा विचित्रवीर्य थे। दोनो पुत्रहीन मर गये। अतएव नियोगद्वारा विचित्रवीर्य की पत्नी से धृतराष्ट्र तथा पाण्डु हुए। धृतराष्ट्र के एक सौ पुत्र दुर्योधनादि हुए। उन्हें कौरव कहा गया। पाण्डु के पुत्र युधिष्ठिर आदि हुए। उन्हें पाण्डव कहा गया। धृतराष्ट्र अन्धा होने के कारण राजसिंहासन पर नहीं बैठ सके। अतएव कनिष्ठ भ्राता पाण्डु राजा हुए। पाण्डु की अकाल मृत्यु के कारण धृतराष्ट्र राजा तथा युधिष्ठिर उपराजा हुए। परन्तु धृतराष्ट्र के पुत्रों को यह बात पसन्द न आई। वे स्वयं अपने पिता के पश्चात् उत्तराधिकारी होना चाहते थे। अतएव एक ही कुरुवंश की दो शाखा कौरव तथा पाण्डवों में महा भयंकर महाभारत युद्ध हुआ। नीलमत पुराण में कौरव तथा कौरव्य शब्दों का उल्लेख मिलता है। यह कुरु वंश के लिए प्रयुक्त किया गया है। कौरव : ततः सा सुषुवे पुत्रं बालगोन्मदसञ्ज्ञितम्। बालभावात् पाण्डुसुतैर्नानीता कौरवेन वा ॥ १० = २९ कौरव्य : गन्धसोमस्तथा गर्व्यः इवितिर्मिनिटिस्तथा । ऐरावतः स कौरव्यो माषादः कुमुदप्रभः ॥ १/२ = १०७८

परिशिष्ट 'छ' ५९ मार्कण्डेय पुराण में उल्लेख है— तास्विमे कुरुपाञ्चालाः शाल्वाश्चैव सजांगलाः । कुरु पांचाल का एक साथ उल्लेख पुराणों में स्पष्ट दिखाई देता है। मत्स्य पुराण में 'तास्विमे कुरु पाञ्चालाः' तथा विष्णु, कूर्म, वायु एवं ब्रह्माण्ड पुराण में भी 'तास्विमे कुरुपांचाल.' का प्रयोग किया गया है । पुराणों के अनुसार वर्तमान मेरठ तथा दिल्ली क्षेत्र कुरु प्रदेश में आता है। पांचाल देश में अहिच्छत्र वर्तमान रामनगर, बरेली, बदायूँ जिला तथा कम्पिला अर्थात् काम्पिल्य ( फर्रुखाबाद जिला उत्तर प्रदेश ) का था । पूर्व में गोमती तथा दक्षिण पश्चिम चम्बल नदी तक क्षेत्र विस्तृत था । पश्चिम में पांचाल की सीमा शूरसेन थी । पांचाल भी उत्तरी तथा दक्षिणी भागों में विभक्त था । संहितोपनिषद् ब्राह्मण में एक स्थल पर प्राच्य पांचाल का भी वर्णन है। इसके तीन भाग भी थे । यह अनुमान इसके लिये त्र्यनीक शब्द के उल्लेख से मिलता है । उत्तर पांचाल की राजधानी अहिच्छत्र तथा दक्षिण पांचाल की कांपिल्य थी। अहिच्छत्र वर्तमान रामनगर जिला बरेली के खनन कार्य से इसकी प्राचीनता स्पष्ट होती है। कुरुओं तथा पांचालों में उत्तर कुरु को अपने राज्य में सम्मिलित रखने के लिये संघर्ष होते थे। कभी-कभी उत्तर पांचाल को कुरुरट्ठ (कुरुराष्ट्र) में सम्मिलित किया गया है। उसकी राजधानी हस्तिनापुर थी। कभी कंपिल रट्ठ (कंपिल राष्ट्र) में सम्मि- लित हो जाता था । मार्कण्डेय पुराण में एक स्थान पर 'कुरुवंस्तंगणा यसाः' का उल्लेख आया है। यहाँ कुरु से उत्तर कुरु समझना चाहिए । वायु, ब्रह्माण्ड पुराणों में 'कुरुन् समस्तानपि' उल्लेख भी किया गया है। मत्स्य में 'कुरुन् वै भरता- नपि' उल्लेख मिलता है । पुराणों से प्रतीत होता है कि कुरु तथा भरत एक ही जाति के थे । स्कन्दपुराण के देशों की तालिका में कुरु का स्थान ६३ वाँ तथा ग्राम संख्या ४३ हजार दी गयी है। इससे प्रकट होता है। कुरु देश का क्षेत्रफल बहुत बड़ा नही था। शक्ति संगम तन्त्र ( ३:७:२३) में कुरु राष्ट्र कश्मीर आदि से छोटा था। कुरु देश हस्तिनापुर से आरम्भ होकर दक्षिण में कुरुक्षेत्र तक और पांचाल पूर्व दिशा तक विस्तृत था । इसके अनुसार सरस्वती तथा दृषद्वती नदियों के मध्य कुरुक्षेत्र था । अर्थात् दक्षिण में सरस्वती उत्तर दृषद्वती नदियाँ थीं। मनुस्मृति में इस प्रदेश को ब्रह्मावर्त कहा गया है । ( मनु० २:१७ ) दक्षिण कुरु प्रदेश की सीमा पूर्व में पांचाल, दक्षिण में सरस्वती तथा उत्तर में दृषद्वती नदियाँ हो जाती है। वाहीक प्रदेश कुरुक्षेत्र के पश्चिम होना चाहिए । वाहीक अंचल के लिए महाभारत में प्रायः भद्र, यातिक, अरट्ट तथा पंचनद शब्दों का प्रयोग किया गया है। वर्तमान सोनपत, अमीन, करनाल, पानी- पत के जिले कुरुक्षेत्र में माने जा सकते हैं। कुरुजांगल कुरुक्षेत्र का जंगली भाग मालूम होता है। वह उत्तर में काम्यक वन तक फैला था। दक्षिण में कुरुदेश खाण्डव वन तथा सरस्वती के तट तक फैला था। ( महाभारत १:५:३ ) यह क्षेत्र का पूर्वीय भाग था। यह गंगा तथा उत्तर पांचाल के मध्य विस्तृत था । कुरुक्षेत्र के विषय में महाभारत में कहा गया है। यह क्षेत्र पवित्र है। वहाँ की रजस्पर्श से भी मनुष्य को स्वर्ग प्राप्ति होती है। कुरुक्षेत्र में जो सरस्वती के दक्षिण तथा दृषद्वती के उत्तर निवास करते हैं, जैसे स्वर्ग में निवास करते हैं ।

६० राजतरंगिणी पाणिनि की अष्टाध्यायी (४:१-१७२-१७६ तथा ४:२:१३०) में इसका वर्णन है। योगिनी तंत्र (२:१, २:७-८) में इसका उल्लेख है। हुएनसांग वर्णन करता है। थानेश्वर वंश का राज्य था। जिसका दक्षिणी राजपूताना तथा कुछ भाग उत्तर प्रदेश का था। सन् ६४८ ई० में एक चीनी राजदूत हर्षवर्धन की राज्यसभा में भेजा गया था। उसके अनुसार सेनापति अर्जुन ने राज्य पर अधिकार कर लिया था। राजा के वंश का लोप हो गया था। थानेश्वर का महत्त्व कायम रहा। परन्तु सन् १०१४ में महमूद गजनो ने इस पर अधिकार कर लिया था। परन्तु सन् १०४३ में दिल्ली के हिन्दू राज्य के अधीन पुनः चला गया। कुरुक्षेत्र का सामरिक महत्त्व है। इस क्षेत्र में महाभारत तथा तीनों पानीपत के युद्ध हुए थे। इन चारों युद्धों ने भारतीय राजनीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया था। चारा युद्धो के कारण भारत के केन्द्रीय राज्य शासन, वंश तथा प्रणालियों में आमूल परिवर्तन हुआ है। सूर्य ग्रहण के अवसर पर यहाँ के सरोवर में स्नान करने का महत्त्व है। मैं कुरुक्षेत्र गया हूँ। सरोवर कमल से पूर्ण हैं। पानी की कमी नहीं है। मैदान है। पैदावार खूब है। प्राचीन काल में घोड़ा, हाथी, ऊँट के लिए चारा तथा पानी की आवश्यकता होती थी। उस समय इसके गुवास के कारण क्षेत्र का सामरिक महत्त्व था।

परिशिष्ट 'ज' शक ( तरंग : १ : ५२ : पृष्ठ ९६; २ : ६ पृष्ठ ३८० तथा ३ : १२८ ) ऋग्वेद ( ११ : १३२ : ५ ) में शक्रपूत शब्द एक राजा के लिए आया है। अथर्ववेद ( ३ : २४ : ४; २० : १३१ : १६ ) में गोमय के अर्थ में शक्रपूत शब्द का प्रयोग किया गया है। पाणिनि ने अपनी अष्टाध्यायी ( ४ : १ : १७५ ) में शक देश का उल्लेख किया है। बृहद् संहिता में ( १४ : २१ ) में शक- द्वीप को शक जाति का निवास स्थान कहा गया है। मनुस्मृति ने ( ११ : ४३, ४४ ) शकों का यवन के साथ उल्लेख कर उन्हें शूद्रों की श्रेणी में पतित क्षत्री कहकर रखा है। पाणिनि ने ( ४ : १ : १७५ ) कम्बोज- आदि गणों में शकों का उल्लेख किया है। मनु ने ( १० : ४ ) बर्बरों को शक, शवर, यवन आदि में गिना है। वायु पुराण में उल्लेख आता है : 'शका हृदा कुलिन्दाश्च', 'शकाः हृदाः कुणिन्दाश्च' तथा 'शका- द्विहा रुलिताश्च'। ब्रह्माण्ड पुराण में 'शका हूणाः कुलिन्दाश्च', मत्स्य पुराण में 'शका द्रुह्याः पुलिन्दाश्च' उल्लेख मिलता है। सिरीन्ध्रान् कुकुरांश्चीनान् बर्बरान् यवनान् शकान् । रूपाणांश्च कुणिन्दाश्च अंतलोकवरांश्चवान् ॥ वायु पुराण में 'बर्बरान्, यवनान् द्रुहान्', ब्रह्माण्ड पुराण में 'बर्बरान् यवनान् द्रुहान्', मत्स्य पुराण में 'बर्बरान् यवनान् खसान्'; बर्बरान् यवनान् खसान्', 'बर्बरान् यवनांश्छकान्', 'बर्बरान् यवनान् द्रुहान्।' उल्लेख मिलता है। शकों का मूल निवास स्थान सीर तथा आमू दरिया की उपत्यका माना जाता है। एक और उल्लेख मिलता है। अथ चीनमरूंश्चैव तंगणान् सर्वशूलिकान् । साभ्रांस्तुषारान् लम्प्याकान् पह्लवान् पारदान् शकान् ॥ वायु पुराण में—'पह्लवान् दरदान् शकान्', मत्स्य पुराण में—'पह्लवान् पारदान् शकान्; ब्रह्माण्ड पुराण में—'पह्लवान् दरदान् शकान् ।" आदि का उल्लेख मिलता है। इसी पुराण ( २ : १६ : ४८ ) में उसे उदीच्य का एक देश माना गया है। वायु पुराण ( ९९ : ३१०-३२४ तथा ३६१ ) के अनुसार पच्चीस शक राजाओं को शिशुनाग, ऐक्ष्वाक, पांचाल, हैहय, कलिंग राजाओं का समकालीन कहा गया है। उनका राज्यकाल ३८० वर्ष कहा गया है। मत्स्य पुराण ( २७२ : १८ ) अट्ठारह शक राजाओं का उल्लेख करता है। वहाँ पर उनका उल्लेख सात आन्ध्र, दस आभीर तथा ७ गर्दभिल्लों के पश्चात् किया गया है। विष्णु पुराण ( ४ : २४ : ५२ ) में

६२ राजतरंगिणी शकराजाओं की संख्या १६ दी गयी है। इनका उल्लेख ( १ : १३ : १२०-१२४ ; ३ : ७३ : १०८; ३ : ७४ : १३७, १७२-१७५ ) में आता है। स्कन्दपुराण ( १ : २ : ४० ) में वर्णन आता है कि कलियुगारम्भ होने पर एक लाख एक सौ वर्ष तक शकराजा होंगे । संस्कृत साहित्य में चतुर्द्वीप, सप्त द्वीप, नव द्वीप, द्वादश द्वीप, त्रयोदश द्वीप, अष्टादश द्वीपों का उल्लेख मिलता है । पुराणों में सातों द्वीपों को समुद्रों से घिरा बताया गया है । वायु तथा अन्य पुराणों में क्रम, जम्बू, प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौंच, शाक तथा पुष्करादि द्वीपों की तालिका दी गयी है । मत्स्य पुराण में जम्बू, शक, कुश, क्रौंच, शाल्मली, गोमेध ( प्लक्ष ) और पुष्कर सात द्वीपों का उल्लेख किया गया है । क्षीरसागर को क्षीरोद भी कहते हैं । वर्तमान उत्तर अटलाण्टिक महासागर के दक्षिणेशीय भाग तथा आर्कटिक समुद्र को कुछ विद्वान् क्षीर सागर कहते हैं । विद्वान् वडेर क्षीर सागर को कैस्पियन सागर तथा विल्फर्ड उसे जर्मन समुद्र कहते हैं । क्षीर अर्थात् दूध का रंग उज्ज्वल होता है । उत्तर आर्कटिक सागर तुषार पात के कारण श्वेत रूप धारण कर लेता है । कास्पियन सागर भी शिशिर ऋतु में जमकर श्वेत रूप हो जाता है । यह बात भारतीय महासागर तथा उससे सम्बन्धित सागर एवं आगत के सम्बन्ध में लागू नहीं होती । उष्ण तथा शीतोष्ण कटिबन्ध में होने के कारण वे कभी जमते नहीं । कैस्पियन सागर तथा आर्कटिक सागर दूध की तरह जमकर श्वेत रूप शिशिर ऋतु में धारण कर लेते हैं । मालूम होता है कि यहा क्षीर सागर नाम कैस्पियन सागर के लिए प्रयोग किया है । शक द्वीप को क्षीर सागर से घिरा हुआ कहा गया है । प्रत्येक द्वीप में ७ पर्वत, ७ वर्ष तथा ७ नदियों का उल्लेख किया गया है । सप्त सिन्धु, सप्त वर्ष, सप्त पर्वत, सप्त ऋषि, सप्त द्वीप, सप्त नदी, सप्तगंगा, सप्त पुरी, सप्त वासर, आदि सप्त संख्या देने की एक शैली किंवा परम्परा प्राचीन काल में चल गयी थी । सम्भव है कि सप्त के आधार पर सम्भवतः लोकप्रिय बनाने तथा स्मृति में चिरस्थायी रखने के लिए एक उपाय निकाला गया होगा । पर्वतादि के वर्णन में द्विनाम देने की प्रथा थी । एक ही पर्वत के दो नाम होते थे । शक द्वीप के सप्त पर्वत हैं यथा—( १ ) मेरु-उदय ( पामीर ), ( २ ) जलधारा-चन्द्र ( वोल्गा नदी का पठार ) ( ३ ) दुर्ग-शैल-नारद ( कैस्पियन द्वार ), ( ४ ) श्याम-दुन्दुभी ( उत्तरीय पर्वतमाला ), ( ५ ) अस्तगिरि- गोमक ( ६ ) आम्बिकेय-सुमन, ( ७ ) विभ्राज-केशव ( जगरास पर्वत ) । वायु पुराण में केशव का रम्या तथा वैदारी पर्वत नाम से उल्लेख किया गया है । शक द्वीप के सात वर्ष हैं । उक्त सातो पर्वतों के नाम पर दिये गये हैं अथवा उन पर्वतों के मूल तथा उपत्यका में थे । : (१) उदय वर्ष ( उदय पर्वत ), (२) सुकुमार-शिशिर ( जलधार पर्वत वोल्गा नदी की उपत्यका ) ( ३ ) कौभारः सुखोदय ( दुर्ग शैल ) (४) मणि चक्र-आनन्दक ( श्याम पर्वत जरफसा नदी की उपत्यका ) (५) कुमुमोत्तर-असित ( सोमकपर्वत ) यूनानी लेखकों का कोमी दोहि प्रदेश ) ( ६ ) मैनाक- क्षेमक ( आग्निनेय पर्वत ) (७) विभाज-ध्रुव ( विभ्राज पर्वत ) । शक द्वीप की सप्त नदियाँ हैं : (१) सुकुमारि = मुनितप्ता (२) कुमारी = तप सिद्धा (३) नन्दा पावनी (४) शिविका = द्विविधा (५) इक्षु = कुहू = वक्षु = आमू दरया (६) वेणुका = अमृता (७) सुकृता= गभस्ति । महाभारत में शक द्वीप की सात नदिया (१) सुकुमारी = (वोल्गा) (२) कुमारी (कुभा) (३) सोता (सीरदरया) (४) कावेरका (५) महानदी (डान नदी) (६) कौरव्य, (७) मणि जला (जरफमा नदी) दिया गया है । यूनानियों के सोधियन डाक तथा चीनियों की यू-ये-चि० (ऋक्षिक) जाति पामीर (मेरु) से काश्पि- यन (कश्यप ) सागर तक फैली थी ।

परिशिष्ट ज ६३ स्कन्द पुराण (१:२:४०) में शकों का उल्लेख आया है। कलियुग आरम्भ में उन्हें एक लाख एक वर्ष राज्य करना लिखा है। राजा सगर ने इन्हें जीता था। इसका उल्लेख भागवत पुराण (९:८:५) में मिलता है। शक यवनों का वशिष्ठ के शरण जाने का उल्लेख पद्मपुराण (६० : २०) में किया गया है। पतंजलि ने इनका निर्देश पातंजलि सूत्र (२.४:१०) में किया है। महाभारत में शक देश तथा शक जाति का निम्नलिखित स्थानों पर निम्नलिखित संदर्भ के साथ उल्लेख किया गया है। 'एक भारतीय जनपद और जाति। शक जाति के लोग वशिष्ठ की नन्दिनी गाय के मन से प्रकट हुए थे (आदि० १७४-३६)। भीमसेन ने पूर्व-दिग्विजय के समय शकों को परास्त किया था (सभा० ३०:१४)। नकुल ने भी इन पर विजय पायी थी (सभा० ३२ : १७)। शक देश और जाति के राजा राजसूय यज्ञ में युधिष्ठिर के लिए भेंट लाए थे (सभा० ५१:३०)। कलियुग में शक आदि जातियों के लोगों के राजा होने का उल्लेख मिलता है। (वन० १८८.३५)। शक देश के राजा के पास पाण्डवों की ओर से रण-निमन्त्रण भेजने का विचार किया गया था (उद्योग० ४.१५)। ये काम्बोज राज सुदक्षिण के साथ दुर्योधन की सेना में सम्मिलित हुए थे (उद्योग १९:२१)। शक एक भारतीय जनपद का नाम है (भी० प० ९:५१)। भगवान् श्रीकृष्ण ने शक देश पर विजय पायी थी (द्रोण० ११:१८)। सात्यकि ने बहुत से शक सैनिकों का संहार किया था (द्रोण० ११९.४५ ११९.४५, ५३)। कर्ण ने भी शक देश को जीता था (कर्ण० ८:१८)। शक पहले क्षत्रिय थे, परन्तु ब्राह्मणों के दर्शन से वंचित होने के कारण (अपने धर्म-कर्म से भ्रष्ट हो) शूद्र भाव प्राप्त किये थे। (अनु० ३३:२१)। मनु संहिता में उन्हें वृषल क्षत्रिय कहा है। प्राचीन शकों का मूल स्थान इस समय रूस गणतन्त्र राज्य में है। रूसी इतिहासकारों ने इस पर यथेष्ट अन्वेषण किया है। उन्होंने शक जाति को डुनार अर्थात डैन्यूब नदी से त्यान्शान् अल्ताई के मध्य की भूमि को भारतीय शक द्वीप माना है। प्राचीन ईरानी भाषा में इसकी संज्ञा शकान वेइजा दिया गया है। इसको शकिस्तान तथा शीस्तान कहते हैं। हूणों के कारण शक जाति तथा देश विघटित हो गया था। एक मत है ओक्सस तथा जक्सस रोज नदी की उपत्यका से पामीर के मूल तक उनका निवास क्षेत्र था। वह क्षेत्र वर्तमान सभी तुर्किस्तान चीनी तुर्किस्तान तथा मध्य एशिया है। यूरोपीय लेखकों ने शकों को शकाई तथा चीनी लेखकों ने 'शे' लिखा है। उनके मतानुसार मूल शब्द 'शोक' अथवा 'शोक' था। चीनी लेखक उन्हें पशुपालक जाति कहते हैं। उनका मत है कि वे काशगर के समीपवर्ती भूभाग में विचरण करते थे। सन् १६४ ई० पू० ए-ची-जाति ने उन पर पूर्व दिशा से आक्रमण किया। वे उद्वासित हो गये। उनका एक भाग अफगानिस्तान के पश्चिमी खण्ड में बस गया। उस खण्ड को शीस्तान अथवा शकस्थान कहते हैं। उनका दूसरी शाखा पूर्वी ईरान में जाकर आबाद हुई। शक जाति इस प्रकार दो शाखाओं में विभाजित हो गयी थी। यह भी मत है कि एक शाखा ने तुर्किस्तान से कश्मीर में प्रवेश किया। वे कश्मीर के दक्षिण में आबाद हो गये थे। दूसरी शाखा जो पूर्वी ईरान में आबाद हो गयी थी उसका सम्बन्ध पल्लव जाति से हुआ। वह शाखा भारतवर्ष में कालान्तर में आयी। यह शाखा भारत में खैबर पास से न आकर बोलन पास किंवा मुल्ला पास द्वारा भारत में प्रवेश की थी। मलाया प्रायद्वीप के वनों में एक आदिम जाति रहती है। उसका नाम शकाई है। उसकी संज्ञा

६२ राजतरंगिणी शकराजाओं की संख्या १६ दी गयी है। इनका उल्लेख ( १ : ६३ : १२०-१२४ ; ३ : ७३ : १०८; ३ : ७४ : १३७; १७२-१७५ ) में आता है। स्कन्दपुराण ( १ : २ : ४० ) में वर्णन आता है कि कलियुगारम्भ होने पर एक लाख एक सौ वर्ष तक शकराजा होगे। संस्कृत साहित्य में चतुर्द्वीप, सप्त द्वीप, नव द्वीप, द्वादश द्वीप, त्रयोदश द्वीप, अष्टादश द्वीपो का उल्लेख मिलता है। पुराणों में सातो द्वीपो को समुद्रों से घिरा बताया गया है। वायु तथा अन्य पुराणों में क्रम, जम्बू, प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौंच, शाक तथा पुष्करादि द्वीपों की तालिका दी गयी है। मत्स्य पुराण में जम्बू, शरु, कुश, क्रौंच, शाल्मली, गोमेध ( प्लक्ष ) और पुष्कर सात द्वीपो का उल्लेख किया गया है। क्षीरसागर को क्षीरोद भी कहते हैं। वर्तमान उत्तर अतलान्तिक महासागर के पश्चिमोय भाग तथा आर्कटिक समुद्र को कुछ विद्वान् क्षीर सागर कहते हैं। विद्वान् वडेर क्षीर सागर को कैस्पियन सागर तथा विल्फर्ड उसे जर्मन समुद्र कहते हैं। क्षीर अर्थात् दूध का रंग उज्ज्वल होना है। उत्तर आर्कटिक सागर तुषार पात के कारण श्वेत रूप धारण कर लेता है। कास्पियन सागर भी शिशिर ऋतु मे जमकर श्वेत रूप हो जाता है। यह बात भारतीय महासागर तथा उससे सम्बन्धित सागर एवं खागात के सम्बन्ध में लागू नहीं होती। उष्ण तथा शीतोष्ण कटिबन्ध में होने के कारण वे कभी जमते नही। कैस्पियन सागर तथा आर्कटिक सागर दूध की तरह जमकर श्वेत रूप शिशिर ऋतु में धारण कर लेते हैं। मालूम होता है कि यहा क्षीर सागर नाम कैस्पियन सागर के लिए प्रयोग किया है। शक द्वीप को क्षीर सागर से घिरा हुआ कहा गया है। प्रत्येक द्वीप मे ७ पर्वत, ७ वर्ष तथा ७ नदियों का उल्लेख किया गया है। सप्त सिन्धु, सप्त वर्ष, सप्त पर्वत, सप्त ऋषि, सप्त द्वीप, सप्त नदी, सप्तगंगा, सप्त पुरी, सप्त वासर, आदि सप्त संख्या देने की एक शैली किंवा परम्परा प्राचीन काल में चल गयी थी। सम्भव है कि सप्त के आधार पर सम्भवतः लोकप्रिय बनाने तथा स्मृति में चिरस्थायी रखने के लिए एक उपाय निकाला गया होगा। पर्वतादि के वर्णन में द्विनाम देने की प्रथा थी। एक ही पर्वत के दो नाम होते थे। शक द्वीप के सप्त पर्वत है यथा—( १ ) मेरु-उदय ( पामीर ), ( २ ) जलधारा-चन्द्र ( वोल्गा नदी का पठार ) ( ३ ) दुर्ग-शैल-नारद ( कैस्पियन द्वार ), ( ४ ) श्याम-दुन्दुभी ( उत्तरीय पर्वतमाला ), ( ५ ) अस्तगिरि- सोमक ( ६ ) आम्बिकेय-सुमन, ( ७ ) विभ्राज-केशव ( जगरास पर्वत )। वायु पुराण मे केशव का रम्या तथा वैशारी पर्वत नाम से उल्लेख किया गया है। शक द्वीप के सात वर्ष है। उक्त सातों पर्वतो के नाम पर दिये गये है अथवा उन पर्वतो के मूल तथा उपत्यका में ये : (१) उदय वर्ष ( उदय पर्वत ), (२) सुकुमार-शिशिर ( जलधार पर्वत वोल्गा नदी की उपत्यका ) ( ३ ) कौमारः सुखोदय ( दुर्ग शैल ) (४) मणि चक्र-आनन्दक ( श्याम पर्वत जरफशा नदी की उपत्यका ) (५) कुसुमोत्कर-असित ( सोमकपर्वत ) यूनानी लेखको का कोमी दोहि प्रदेश ) ( ६ ) मैनाक- क्षेमक ( आम्बिरेय पर्वत ) (७) विभाज-ध्रुव ( विभ्राज पर्वत ) । शक द्वीप की सप्त नदियाँ हैं : (१) सुकुमारि = मुनितमा (२) कुमारी = तप सिद्धा (३) नन्दा पावनी (४) विविधा = द्विविधा (५) इक्षु = कुहु = वक्षु = आमू दरया (६) वेणुका = अमृता (७) सुकृता= गभस्ति । महाभारत में शक द्वीप की सात नदियां (१) सुकुमारी = (वोल्गा) (२) कुमारी (कुभा) (३) सीता (गीरदरया) (८) कावेरशा (५) महानदी (हान नदी) (६) कोरम्ब, (७) मणि जला (जरफशा नदी) दिया गया है। यूनानियों के सोथियन शक तथा चीनियों की यू-ये-चि० (ऋषिक) जाति पामीर (मेरु) से कास्पि- यन ( कश्यप ) सागर तक फैली थी ।

परिशिष्ट ज ६३

स्कन्द पुराण (१:२:४०) में शकों का उल्लेख आया है। कलियुग आरम्भ में उन्हें एक लाख एक वर्ष राज्य करना लिखा है। राजा सगर ने इन्हें जीता था। इसका उल्लेख भागवत पुराण (९:८:५) में मिलता है। शक यवनों का वशिष्ठ के शरण जाने का उल्लेख पद्मपुराण (६० : २०) में किया गया है। पतंजलि ने इनका निर्देश पातंजलि सूत्र (२:४:१०) में किया है। महाभारत में शक देश तथा शक जाति का निम्नलिखित स्थानों पर निम्नलिखित संदर्भ के साथ उल्लेख किया गया है। 'एक भारतीय जनपद और जाति। शक जाति के लोग वशिष्ठ की नन्दिनी गाय के मन से प्रकट हुए थे (आदि० १७४-३६)। भीमसेन ने पूर्व-दिग्विजय के समय शकों को परास्त किया था (सभा० ३०:१४)। नकुल ने भी इन पर विजय पायी थी (सभा० ३२ : १७)। शक देश और जाति के राजा राजसूय यज्ञ में युधिष्ठिर के लिए भेंट लाए थे (सभा० ५१:३०)। कलियुग में शक आदि जातियों के लोगों के राजा होने का उल्लेख मिलता है। (वन० १८८ : १५)। शक देश के राजा के पास पाण्डवों की ओर से रण-निमन्त्रण भेजने का विचार किया गया था (उद्योग० ४:१५)। ये काम्बोज राज सुदक्षिण के साथ दुर्योधन की सेना में सम्मिलित हुए थे (उद्योग १९:२१)। शक एक भारतीय जनपद का नाम है (भी० म० ९०५१)। भगवान् श्रीकृष्ण ने शक देश पर विजय पायी थी (द्रोण० ११:१८)। सात्यकि ने बहुत से शक सैनिकों का संहार किया था (द्रोण० ११९:४५ ११९:४५, ५३)। कर्ण ने भी शक देश को जीता था (कर्ण० ८:१८)। शक पहले क्षत्रिय थे, परन्तु ब्राह्मणों के दर्शन से वंचित होने के कारण (अपने धर्म-कर्म से भ्रष्ट हो) शूद्र भाव प्राप्त किये थे। (अनु० ३३:२१)। मनु संहिता में उन्हें वृषल क्षत्रिय कहा है। प्राचीन शकों का मूल स्थान इस समय रूस गणतन्त्र राज्य में है। रूसी इतिहासकारों ने इस पर यथेष्ट अन्वेषण किया है। उन्होंने शक जाति को दुनार अर्थात् डैन्यूब नदी से त्यान्शान् अल्ताई के मध्य की भूमि को भारतीय शक द्वीप माना है। प्राचीन ईरानी भाषा में इसकी संज्ञा शकान वैश्जा दिया गया है। इसको शास्थान तथा शीस्तान कहते हैं। हूणों के कारण शक जाति तथा देश विघटित हो गया था। एक मत है ओक्सस तथा जक्सस रीज नदी की उपत्यका से पामीर के मूल तक उनका निवास क्षेत्र था। वह क्षेत्र वर्तमान सभी तुर्किस्तान चीनी तुर्किस्तान तथा मध्य एशिया है। यूरोपीय लेखकों ने शकों को शकाई तथा चीनी लेखकों ने 'शे' लिखा है। उनके मतानुसार मूल शब्द 'शैक' अथवा 'शोक' था। चीनी लेखक उन्हें पशुपालक जाति कहते हैं। उनका मत है कि वे काशगर के समीपवर्ती भूभाग में विचरण करते थे। सन् १६४ ई० पू० ए-चो-जाति ने उन पर पूर्व दिशा से आक्रमण किया। वे उद्वासित हो गये। उनका एक भाग अफगानिस्तान के पश्चिमी खण्ड में बस गया। उस खण्ड को शीस्तान अथवा शकस्थान कहते हैं। उनका दूसरी शाखा पूर्वी ईरान में जाकर आबाद हुई। शक जाति इस प्रकार दो शाखाओं में विभाजित हो गयी थी। यह भी मत है कि एक शाखा ने तुर्किस्तान से कश्मीर में प्रवेश किया। वे कश्मीर के दक्षिण में आबाद हो गये थे। दूसरी शाखा जो पूर्वी ईरान में आबाद हो गयी थी उसका सम्बन्ध पल्लव जाति से हुआ। वह शाखा भारतवर्ष में कालान्तर में आयी। यह शाखा भारत में खैबर पास से न आकर बोलन पास किंवा मुल्ला पास द्वारा भारत में प्रवेश की थी। मलाया प्रायद्वीप के वनों में एक आदिम जाति रहती है। उसका नाम शकाई है। उसकी संज्ञा

६४ राजतरंगिणी शिमोर्ट भी दी गयी है । मुख्यतः फरेक क्षेत्र के दक्षिण पूर्व मे मिलते हैं । अब तक यह घुमन्तू जाति है । आधुनिक काल में ईख तथा धान की खेती करने लगे हैं । एक मत और है । श्याम अर्थात् थाईलैण्ड की मीकांग (मातु गंगा) नदी के तट पर बसी हुई शक अथवा शुक जाति को शक जाति का मूलस्थान मानकर श्यामको शक द्वीप कुछ विद्वान् मानते हैं । इसी प्रकार वरमा देश के थेक किंवा शक जाति को शक मानने का प्रयास किया गया है । यह धारणा विष्णु पुराण वर्णित शाक वृक्ष, शक स्थान आदि से होती है । विद्वानों ने विष्णु पुराण वर्णित शाक वृक्ष को मैशक अर्थात् सागवान वृक्ष माना है । वर्मा, श्याम, कम्बोडिया तथा इण्डोनेशिया में सागवान वृक्ष अधिक पाये जाते हैं । अतएव इस भूखण्ड को शकद्वीप मानने का एक प्रयास किया गया है । शक द्वीप के साथ क्षीरोद सागर किंवा क्षीरार्णव का वर्णन मिलता है । श्याम कम्बोडिया के दक्षिण तथा मलय प्रायद्वीप के पूर्व जो समुद्रीय जल-खण्ड चीन सागर को मिलाता है उसका प्राचीन नाम केदरेन्दज अथवा करन्देन्दज है । भाषाविद् विद्वान् केदेरेन्दज को क्षीरोद शब्द का अपभ्रंश मानते हैं । परन्तु यह मत भ्रामक है । भविष्य पुराण में क्षीरोद शब्द आया है उसी के आधार पर यह अनुमान लगाया गया है । लवणोदात्परे पारे क्षीरोदेन समावृतः । जम्बूद्वीपात्परे यस्माच्छाकद्वीप इति स्मृतः ॥ महाभारत (६ . १२ : ९) में क्षीरोद का उल्लेख किया गया है। इन्हीं शब्दों के उल्लेख पर श्याम तथा कम्बोडिया को शक द्वीप प्रमाणित करने का प्रयास किया गया है । आर्य तथा शक जाति के रूप, आकारादि में विभिन्नता नगण्य है । ई० पू० छठीं तथा पांचवी शताब्दी में यूनानी इतिहासकारों ने पारसी सम्राट् 'दारियोस' अर्थात् 'दारियस' की सेना में शकों का उल्लेख किया है । उन्होने वर्णन किया है कि शकों के देश में लोहा तथा चांदी नहीं होता । उन धातुओं का प्रयोग वे नहीं करते थे । किन्तु स्वर्ण तथा ताम्बा का प्रयोग वे करते दिखायी देते थे । उस समय शकों में सुवर्ण तथा ताम्र दोनो धातुओ का प्रयोग देखा गया था । ई०पू० ५१३ वर्ष में दारयोस ने कृष्ण सागर के तटवर्ती क्षेत्र दाकों पर आक्रमण किया था । ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी में उत्तर पश्चिम भारत मे तथा उसके सीमान्त पर शासन करने वाले अनेक यूनानी शासकों का शक नाम था । ईसा पूर्व १२८ वर्ष में एक चीनी सैनिक पर्यटक चाइच्बान शकों के नगर वारन्तर में गया था । उसने उन्हें तम्बुओं में निवास करते देखा था । उनका जीवन निर्वाह पशु-पालन पर निर्भर था । शक परम्परा कहती है । उक्त आक्रमण के १००० वर्ष पूर्व शकों में राजा हुए थे । उनके गणतन्त्र शासन प्रणाली प्रचलित थी । सख्यात अथवा सर्वभान उनके गणतन्त्र का नाम था । शकों के सामाजिक जीवन में स्त्रियो का प्रमुख स्थान होता था । युद्ध में पति के दिवंगत होने पर वे विधवा होकर बैठती नहीं थीं । स्वयं सेना का संचालन करती थीं । शक जाति का मुख्य भोजन मास तथा दूध था । वे युद्ध भूमि में शत्रु का रक्त पीते थे । वे अपने शत्रु की खोपड़ी का कटोरा बनाते थे । कापालिक की तरह उसे पान तथा भिक्षा पात्र की तरह प्रयोग करते थे । शकों की स्त्रियों में बहुपति प्रथा प्रचलित थी । दाको में बहु पत्नी प्रथा प्रचलित थी । इसका

परिशिष्ट ज ६५ उसका मत है कि भारत में जहाँ शक निवास करते थे यह प्रथा प्रचलित थी । शकों के भारत में आबाद होने पर शक तथा भारतीयों मे परस्पर विवाह होने लगा था । दक्षिण भारत में भानजो के साथ विवाह करना शक प्रभाव ही प्रतीत होता है । कनिघम का मत है कि ओक्सस नदी से चलकर शक किपिन अर्थात् कपिशा में आये । वहाँ से वे देश के अनेक भागों में और सिन्ध में फैल गये । (कनिंघम = क्वाइन्स आफ इण्डोसीथियन ४ : २२९) इसका समर्थन हिरोडोट्स के लेखों से भी होता है । पाण्डवों की तरह अनेक भाइयों की एक पत्नी द्रोपदी तुल्य होती थी । यूथ विवाह अर्थात् स्त्री, पुरुषों के एक वृन्द किंवा समूह का विवाह दूसरे वृन्द किंवा समूह अथवा यूथ से हो जाता था । जाति के नेता अथवा राजा की मृत्यु होने पर, उसकी एक पत्नी उसके साथ कब्र में जीवित गाड़ दी जाती थी । भारत में पति के साथ मरने की प्रथा दूसरे प्रकार की थी । राजा की अनेक रानियों में ज्येष्ठा, उसके अभाव में अन्य रानी पति के साथ सती होती थी । पाण्डु की मृत्यु के पश्चात् ज्येष्ठा रानी युधिष्ठिर की माता कुन्ती नहीं सती हुई । नकुल तथा सहदेव की माता माद्री अर्थात् कनिष्ठा रानी पति पाण्डु के साथ सती हुई थी । नेपाल में राणाओं तथा राजाओ के साथ एक स्त्री के सती होने का उल्लेख उन्नीसवीं तथा बीसवीं शताब्दी के प्रथम चरण तक मिलता है । उदयपुर में दिवंगत राणाओं की छतरियाँ बनी हैं । सती प्रथा के काल तक रानियां सती होती थी । छतरियो में एकलिंग के समान मूर्तियां स्थापित है। उसके समीप ही दूसरी प्रतिमा एक चौखूंटा लिंगाकार शिला की होती है । उस- पर राणाओं के साथ जितनी रानियां सती होती थीं उतनी स्त्री प्रतिमा उत्खनित कर दी गयी है । इससे पता चलता है । किस राणा के साथ कितनी रानियां सती हुई थी । आर्यों में श्राद्ध प्रथा प्रचलित थी । महापात्र को दिवंगत आत्मा की शान्ति तथा सुख के लिए एका- दशाहु के दिन दिवंगत द्वारा प्रयुक्त वस्तुएँ तथा प्रसाधन, धन, वाहन सभी कुछ दिया जाता था । मुझे स्मरण है कि हमारे पिता के नाना श्री हरनारायणसिंह काशी में मरे । मै छोटा था । वे अफीम खाते थे । महा- पात्र की विदाई के दिन उसे अफीम खिलाया गया था । शको में यह प्रथा कुछ दूसरे प्रकार से प्रचलित थी । कब्रों में दिवंगत आत्मा की प्रिय तथा उपयोग की सब सामग्री उसके शव के साथ गाड़ देते थे । शको की यह प्रथा मिश्र के फरोहा अर्थात् फरमून लोगों में कुछ भिन्नता के साथ प्रचलित थी । फरोहा के पिरामिडों में उनके शव के साथ जीवनोपयोगी अथवा दिवंगत आत्मा की सभी प्रिय वस्तुओं को एकत्रित कर दिया जाता था । मिश्र के राजा आजीवन अपने कब्र में रखने योग्य सामानों का संचय करते रहते थे । इस प्रकार की कब्रें काकेशस के उत्तर में प्राप्त हुई हैं । अनुमान किया जाता है । भारतीय उत्तर-पश्चिम सीमावर्ती पर्वतीय खश जाति शक जाति की एक शाखा से सम्बन्धित थी । उनकी कब्रें लद्दाख से कमायूँ जिलों तक पाई गयी हैं । उनमें जीवनोपयोगी अर्थात् खान- पान तथा अन्य सामग्रियां गडी मिली है । शको में मृतको को समाधि देने अथवा गाड़ने के साथ ही काय शव को वृक्षों पर टांग देने की भी प्रथा थी । पक्षियों के मांसादि खा जाने पर जब केवल अस्थि पंजर शेष रह जाता था तो अस्थि चयन किया जाता था । अस्थियों को एकत्रित कर तत्कालीन संस्कार विधि के साथ उन्हें गाड़ देते थे । हिन्दुओं में यह प्रथा भिन्न प्रकार से प्रचलित है । दाह करने के पश्चात् अस्थियों का चयन किया जाता है । यदि नदी समीप हुई तो उसका प्रवाह किया जाता है । अन्यथा उन्हें ताम्र अथवा मृत्तिका पात्र में प्रवाह के लिए रख देते है । प्रवाह न करने के अभाव में उन्हें गाड़ दिया जाता है । पारसी लोग शव का संस्कार इसी प्रकार करते हैं यद्यपि इसमें कुछ सुधार हो गया है । पारसी ९

६६ राजतरंगिणी शव को रख देते हैं। पक्षियों मांसादि खा जाती है। दीप अस्थि का नयन किया जाता है। उन्हे गाड़ अथवा कूप में डाल दिया जाता है। पारसी जाति ईरान निवासी थी। पह्लव गण मुस्लिवान से ईरान तक फैले थे। शकों की यह प्रथा पारसियों में उनके सम्पर्क से आयी थी अथवा शकों ने ही पारसियों की प्रथा को स्वी- कार किया था। पडोसी जाति होने के कारण एक दूसरे पर सामाजिक, धार्मिक आदि रीतियों का पड़ना स्वाभाविक था। महाभारत में उल्लेख मिलता है। पाण्डवों ने अपना अस्त्र-शस्त्र एक वृक्ष पर रखा था। शस्त्र की रक्षा निमित्त उसी पर एक शव भी टांग दिया गया था। लोग अस्त्र-शस्त्र का पता न पा सकें। समझें कि, शव संस्कार निमित्त वृक्ष पर रखा गया था। यदि यह प्रथा किसी अंश में किसी जाति में प्रचलित न होती तो वृक्ष पर शव टाँगने में कोई हेतु दिखाई नहीं पड़ता। इससे प्रकट होता है। यह प्रथा आर्यों, पार- सियों तथा शकों में किसी न किसी रूप में प्रचलित थी। हिन्दू आर्यों के समान स्त्रियाँ पति के शव के साथ सती होती थी। यह प्रथा रूम में रोमियों के ईसाई होने के पूर्व तक प्रचलित थी। शक लोग दाहक्रिया भी करते थे। उनमें गाड़ने, जलाने तथा पक्षियों को खिलाने की तीनो प्रथाएँ प्रचलित थी। आर्यों में प्रचलित चौथी प्रथा जल समाधि भी उनमें प्रचलित थी या नहीं कहना कठिन है। शकों की नाक लम्बी होती थी। उनके बाल भूरे होते थे। शक नारियाँ रूपवती होती थी। प्राचीन भारतीय शरीर वैज्ञानिको ने शक नारियों के सुन्दर होने का कारण उनका प्याज खाना लिखा है। वाग्भट्ट के 'अष्टांग हृदय' में उल्लेख मिलता है। विष्णु धर्मोत्तर पुराण में शकों के निश्चीकरण सम्बन्ध में कहा गया है कि उनका रंग श्वेत चित्रित करना चाहिये। इससे स्पष्ट होता है कि शक लोग मध्य एशिया के लोगों के समान उज्ज्वल वर्ण होते थे। अल्ताई स्थित शकों के सम्बन्ध में रूस पुरातत्त्ववेत्ताओं ने खोज तथा खनन कार्य किया है। पाजी- रिक घाटी में एक पुरुष तथा स्त्री का मसाला से सुरक्षित शव प्राप्त हुआ है। पुरुष की छाती तथा कन्ध्यो पर गोदना गुदा है। पुरुष का रंग श्याम तथा स्त्री का गौर वर्ण था। शक यदि आर्यों की शाखा थे तो उनके वर्ण तथा रूप में परिवर्तन किस प्रकार आ गया? शव के रूप वर्णन से यह शंका उठ सकती है। कारण सरल है। बोधगम्य है। शकों के निवास-स्थान के पूर्वी तथा उत्तर-पूर्वीय दिशा में मंगोल जाति रहती थी। उनमें उनका सम्पर्क होना सम्भव था। विवाहादि परस्पर होना असम्भव नहीं था अतएव आर्य रंग रूप में सम मिश्रण के कारण अन्तर पड़ जाना स्वाभाविक है। भारत में सम मिश्रण के कारण रंगरूप में अन्तर अधिक हो गया है। आज कहना कठिन है। किसका मूल पुरुष कौन था। जाति क्या थी। महाभारत में शकद्वीप के लोगों का वर्ण श्याम कहा गया है। यह वर्णन चीनी लेखकों तथा प्राप्त शव के श्याम वर्ण से मिलता है। श्याम वर्ण का अर्थ सर्वथा काला रंग से नहीं लगाना चाहिए। (महा- भारत में उल्लेख मिलता है।) उत्तरेण तु राजेन्द्र श्यामो नाम महागिरिः । यतः श्यामत्वमापन्नाः प्रजा जनपदश्वर ॥ ६ : ११ : १९ उत्तर के लोगो का वर्ण चीनी लेखको के अनुसार श्याम मालूम होता है। चीनियो ने उत्तर के रहने वाले शकों के क्षेत्र का नाम एतदर्थ श्याम रख दिया था। आज भी श्याम 'वगलर' तथा श्याम 'उप्रि-

यन' का अर्थ उत्तरीय तथा उत्तरी 'उग्रियन' जाति के लिए प्रयुक्त होता है। महाभारत में (६ : ११ : २६) में शक के लिए श्याम शब्द का प्रयोग किया गया है। महाभारत में शकों के धर्म के विषय में उल्लेख है। महाभारत (६ · १२ : २६) से प्रकट होता है कि शंकर की पूजा शकद्वीप में होती थी। महाभारत में शंकर शब्द भास्कर के लिए प्रयोग किया गया है। जिसका अर्थ सूर्य होता है। शकों में सूर्य पूजा प्रचलित थी। स्लेव जाति में सूर्य महादेव माना जाता था। इसकी पूजा में लालरोटी मक्खन के साथ अर्थात् पूड़ी खाते थे। यही कारण है कि साम्ब को शक द्वीप से सूर्य पूजक लाने को कहा गया था। सिकन्दर के अभियान काल में यूनानी लेखकों ने शकों का चरित्र चित्रण किया है। तथा स्वरूप दिया है। वह शको के आवरण एवं रूप से मिलता है। उनकी आँखें नीली होती थी। उनका बाल लाल होता था। ये खाल पहनते थे। कच्चा मांस खाते थे। मनुष्य का रक्त पीते थे। खेमे में निवास करते थे। अत्यन्त शक्तिशाली थे। संख्या में बहुत थे। भगवान की आपदा तुल्य थे। शव समाधि स्थान में नमदा पर समृद्धि देवी का रंगीन चित्र बना है। उसके करकमलों में जीवन तरु है। उनके सम्मुख श्यामरंग अश्व पर घुंघराले केशों वाला युवक अश्वारोही है। नमदा के समीप मखमल की एक कालीन मिली है। इस पर अश्वरोही, सिंह, हिरन, श्येन अर्थात् वाज पक्षी तथा अन्य विचित्र पशुओं के चित्र बने हैं। अश्वरोही का रूप प्राचीन ईरानी राजाओं के वेशभूषा तथा रूप से मिलता है। ईरानी राजाओं की मुद्राओं, चित्रों आदि पर अंकित वेशभूषा के तुल्य है। यह काल ईसा पूर्व ४०० या ५०० वर्ष माना जाता है। यहीं पर एक चीनी का बना दर्पण मिला है। शव समाधि स्थान के पार्श्व में १४ अश्व अपनी पूर्ण रण सज्जा के साथ समाधिस्थ मिले हैं। अश्वों पर जीन है। जीन की लकड़ी पर नक्काशी की गयी है। उस पर सुवर्ण पत्तर लगे हैं। घोड़ों के लबादे तथा चीनी रेशम द्वारा निर्मित ओहार अर्थात् चादर भी मिला है। यह शव लेनिनग्राड के एर्मीताज संग्रहालय में रखा है। इससे स्पष्ट है। मिस्र तुल्य शक भी मृतक के साथ उसके उपयोग तथा काम की वस्तुएं गाड़ देते थे। मसगित (महाशक), सक्रोका (शकयान), दाह, खस, कुरुन, पूर्वी, शक जातियों की मुख्य आबादियों का उल्लेख रूसी विद्वानों ने किया है। खश को गिलगित त्रिताल में कसकर, कश्मीर में खस, कासगर में खशगिर तथा कश्मीर तथा नेपाल के मध्य खश कहते हैं। हूणों द्वारा उद्वासित किये जाने पर शक दक्षिण की ओर चले। आमू अर्थात् वक्षु उपत्यका होते हुए, उन्होंने पार्थिया (पल्हव) तथा बैक्ट्रिया (बाल्हीक) पर आक्रमण किया। शक उन्हें पराजित कर आगे बढ़ते गये। भारत की सीमा बोलन दर्रा तक पहुँच गये। किपिन अर्थात् पंजाब तथा कश्मीर के भागों पर जिसे प्राचीन गान्धार कहा जा सकता है। शकों ने अधिकार कर लिया। कालान्तर में ये तक्षशिला तथा मथुरा में अपनी सत्ता स्थापित करने में समर्थ हुए। एक मत है। भारत में शक ईसापूर्व पांचवी शताब्दी में आबाद हो गये थे। चाहे उनकी संख्या कम ही क्यो न रही हो। उनकी यह आबादी धुर उत्तर पश्चिम भारत अर्थात् अफगानिस्तान, सीमान्त पश्चिमोत्तर प्रदेश पश्चिमी उत्तरी पश्चिम पाकि- स्तानी पंजाब तथा दक्षिणी कश्मीर था। प्रोलिमी का उल्लेख है कि शक कश्मीर के वालतिस्तान तक फैले थे। एक मत है कि कश्मीर मार्ग से ये ईसा पूर्व ५७ वर्ष में तथा पूर्वी ईरान से प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व

६८ राजतरंगिणी भारत में आये थे। शकों का भारत में विस्तार यूनानियों को हटाकर हुआ था। जहां यूनानी थे वहां शकों का प्रभुत्व हो गया। प्रारम्भिक शक यूनानी भाषा भी बोलते थे। वे बाह्लीक भाषा अधिक बोलते थे। यह ईरानी भाषा की एक शाखा थी। कालान्तर में उन्होंने संस्कृत भाषा को अपना लिया। उनकी वही एक प्रकार से राजभाषा हो गयी थी। भारतीय प्रभाव काशगर तक फैल गया था। शक मध्य एशिया को एक मन से कहते थे। विष्णु पुराण शकों के भारतीयकरण के विषय में प्रकाश डालता है (२ : ४ : ६९) निस्सन्देह शक विदेशी सभ्यता और संस्कृति भारत में लाये थे। भारतीय तथा शक दोनों सभ्यताएं एवं संस्कृतियों ने एक दूसरे को प्रभावित किया था। शकों की एक शाखा ने महाराष्ट्र, सौराष्ट्र तथा मालवा पर अधिकार कर लिया। शकजातीय राज्य- पालों को क्षत्रप नाम से सम्बोधित किया जाता था। उत्तरी तथा पश्चिमी दो प्रकार के क्षत्रपों का उल्लेख मिलता है। तक्षशिला तथा मथुरा के क्षत्रपों को उत्तरीय तथा महाराष्ट्र, उज्जैन, गुजरात, सिन्धादि के क्षत्रपों को पश्चिमीय क्षत्रप कहते थे। तक्षशिला में अनेक शकराजाओं के शिलालेख प्राप्त हुए हैं। प्रथम शक राजा माउज अथवा कोनो था। वह पश्चिमी पंजाब का राजा था। उनकी मुद्राएं पूर्वीय ईरान तथा काबुल उपत्यका तक मिली हैं। उसकी राजधानी तक्षशिला थी। उसका राज्यकाल १३५-१४५ ई० पू० कहा जाता है। उसे राजाओं का राजा कहा गया है। कोनो का उत्तराधिकारी अजेस अथवा अजेज प्रथम था। यह शब्द पारसी शब्द अजोज का अपभ्रंश हो सकता है। कुछ विद्वानों का मत है कि माउज के राज्य में कश्मीर राज्य का दक्षिणी अंचल था। सीस्तान अर्थात् शकस्थान का राजा स्पिलिसेस था। दोनों राजाओं की संयुक्त मुद्राएं प्राप्त हुई हैं। अजोज की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अजिलिसेस राजा हुआ। उसके पश्चात् उसका पुत्र अजोज द्वितीय राजा हुआ। तक्षशिला के शक राजाओं में चार राजाओं का वृत्तान्त ज्ञात है। अनेक शक राजाओं का और पता चलता है। उनका पारस्परिक किस वंशानुगत सम्बन्ध क्या था, कहना कठिन है। मथुरा का प्रथम शक राजा राजुल था। उसकी उपाधि महा क्षत्रप थी। राजुल के पश्चात् उसका पुत्र सोडस राजा हुआ। मथुरा के शिलालेख में उसे महाक्षत्रप कहा गया है। सोडस के पश्चात् उसकी बहन का पुत्र खराम्त राजा हुआ। मथुरा के शकों में एक राजा पतिक भी हुआ है। पतिक और राजुल का क्या सम्बन्ध था अनुसन्धान का विषय है। कतिपय विद्वान् उत्तरी क्षत्रपों को पर्थियन (पल्हव) मानते हैं। किन्तु अधिक झुकाव उन्हें शक मानने की तरफ है। मथुरा के सिंहस्तम्भ पर शकस्थान किंवा सीस्तान शब्द अंकित है। एक मत है कि सिंहस्तम्भ की कला पर ईरानियन कला का प्रभाव है। राजुल क्षत्रप तथा उसका पुत्र सोडास का समय लगभग ७२ तथा ७८ सन् ईस्वी कहा जाता है। एक मत है। स्तम्भ सोडास के अभिलेख से प्राचीन है। मौरसेनिक मथुरा क्षेत्र के निवासी थे। वात्सायन ने (तृतीय शताब्दी) उनकी निन्दा की है। महाराष्ट्र के सातवाहन राजाओं को शकवंशीय क्षत्रपों ने पराजित कर शक राज्य स्थापित किया। इस वंश का प्रसिद्ध राजा नहपान था। उसका शासन काल ११६-१२४ ई० तक था। उपवदत्त उसका जामाता था। उपवदत्त को ऋषभदत्त कुछ विद्वान् मानते हैं। उपवदत्त के शिलालेखों से प्रमाणित होता है कि महाराष्ट्र, उत्तरी कोंकण, उज्जैन तथा अजमेर पर नहपान का राज्य था। नासिक अभिलेख इस पर

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७० राजतरंगिणी थे। कन्या का विवाह सातवाहनवंशीय राजा वशिष्ट पुत्र शातकर्णी (पुळयोमी-१ सन् १०७-१३१ ई०) के साथ हुआ था। शिलालेखों के आधार पर साधिकार कहा जा सकता है कि दूसरी शताब्दी में गुप्त साम्राज्य का उदयकाल आरंभ होता है। इस समय उज्जैन पर शक वंश का राज्य था। उनका विस्तृत विवरण तथा क्रमानुसार राजाओं का निश्चय करना कठिन है। सन् ३४० ई० में रुद्रसेन तृतीय के समय शकों का उत्थान होने लगा था। परन्तु गुप्त साम्राज्य के उत्थान के कारण उनकी उन्नति आकस्मिक प्रमाणित हुई। चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने मालवा तथा सौराष्ट्र पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। उदयगिरि के शिलालेख तथा हर्ष चरित्र से यह घटना सत्य प्रमाणित होती है। शक संवत् का व्यापक प्रचार था। मुख्य कारण था। दक्षिण में शक राज्य स्थापित हो गया था। लगभग २०० वर्षों तक वहाँ शक सत्ता स्थापित रही। इस लम्बे काल में शक राजाओं ने शक संवत् का प्रयोग आरम्भ किया था। प्राचीन तथा मध्ययुग में काशी तथा उज्जैन ज्योतिष के मुख्य केन्द्र थे। पंचांग तथा पत्र यहीं तैयार होता था। उनका प्रचार समस्त भारत में होता था। उत्तर भारत में शक संवत् शक राज्य सत्ता के अभाव के कारण प्रचलित न हो सका। किन्तु दक्षिण तथा मध्यभारत में शकराज्य तथा उसका प्रभाव के कारण शक संवत् पूर्णतया प्रचलित था। प्राचीन विक्रमीय संवत् का प्रचलन कम हो गया था। पुराणों के काल तथा उनकी मान्यता के विवाद में न केवल यह कहना अलम् होगा कि पुराणों में शक जाति, उनके आचरण, व्यवहार तथा व्यवस्था का विशद वर्णन मिलता है। भविष्य पुराण में शकों को चार वर्गों में विभाजित किया गया है। तत्र पुण्या जनपदाश्चतुर्वर्णसमन्विताः । मगाश्च मगगाश्चैव गानगा मन्दगास्तथा ॥ मगा ब्राह्मणभूयिष्ठा मगगाः क्षत्रियाः स्मृताः । वैश्यास्तु गानगा ज्ञेयाः शूद्रास्तेषां तु मन्दगाः ॥ भविष्य पुराण १ : १३९ ब्रह्म पुराण में शकद्वीप निवासियो को चार वर्णों में विभाजित किया गया है : मगा ब्राह्मणभूयिष्ठा गमधाः क्षत्रियास्तु ते । वैश्यास्तु मानसास्तेषां शूद्रा ज्ञेयास्तु मन्दगाः ॥ शाकद्वीपे स्थिते विष्णु सर्परूपधरो हरिः । यथोनैरिज्यते सम्यक् कर्मोभिर्निपधात्मभिः ॥ ब्रह्म पुराण २० : ७१-७३ शकद्वीप के ब्राह्मण - मग थे। क्षत्रिय - मगगा थे। वैश्य - मगा तथा शूद्र - मन्दगा थे। मग शब्द ब्राह्मणों के लिए प्रयुक्त किया गया है। शकद्वीप के ब्राह्मण किसी समय बहुत उत्तम कहे गये थे। उत्तर प्रदेश तथा अन्य स्थानों पर शाकद्वीपी ब्राह्मणों की काफी आबादी है। उन्हें शाकलदीपी ब्राह्मण कहते हैं। भारत में शाकद्वीपी ब्राह्मण भगवान श्री कृष्ण के यशस्वी पुत्र श्री शाम्ब द्वारा सूर्य पूजा निमित्त बुलाए गये थे। इसका उल्लेख शाम्ब पुराण में मिलता है। एक मत है कि मग शकों के पुरोहित थे। ब्राह्मणों

[Header] परिशिष्ट ज ७१ में श्रेष्ठ थे । मग ब्राह्मण दक्षिण भारत तक पहुँच गये थे । कूर्म पुराण (४८:३६) तथा महाभारत (६:२) के अनुसार शकद्वीप के ब्राह्मण मग कहे जाते थे । सदुक्ति कर्णामृत (सन् १२०१ ई०) छह मग ब्राह्मण कवियों का उल्लेख किया गया है । साम्बः सूर्यप्रतिष्ठां च कारयामास तत्त्ववित् । उदयाचले च संधित्य यमुनायाश्च दक्षिणे ॥ मध्ये कालप्रियं देवं मध्याह्ने स्थाप्य चोत्तमम् । मूलस्थानं ततः पश्चाद् अस्तमानाचले रविम् ॥ स्थाप्य त्रिमूर्ति साम्बस्तु प्रातर्मध्यापराह्निकम् ॥ -साम्ब पुराण २०:३०-३१ कथा है कि साम्ब ने चन्द्रभागा अर्थात् चेनाव के तट पर एक सूर्य मन्दिर स्थापित किया था । नदी के तट पर उसका आश्रम था । मन्दिर बनकर तैयार हो गया । साम्ब ने भगवान् नारद से मन्दिर के पुरो- हित किंवा पुजारी के विषय में सलाह ली । किसे पूजा का भार सौंपा जाय । नारद ने कहा । जम्बूद्वीप के ब्राह्मणों में श्रेष्ठता पूर्व जैसी नही रह गयी है । शकद्वीप से पूजा निमित्त ब्राह्मण बुलाए जाँए । गर्हितं मानवं शास्त्रं प्रशंसन्ति ते द्विजाः । साम्ब पुराण २६:२० न योगं परिचर्यायां जम्बूद्वीपे यमानथ । मम पूजाकर गत्वा शाकद्वीपादिहानय ॥ -भविष्य पुराण १.१३९ नीलमत पुराण में शक जाति का उल्लेख मिलता है । कश्मीर निवासी शक जाति से परिचित थे । यथा : दार्याभिसारगान्धारजुहुण्डुरशकान् खसान् । तङ्गणान् माण्डवान् मद्रानन्तर्गिरिबहिर्गिरीन् ॥ ८० = २२२-२२१ × × × दार्वीभिसारगान्धारजुहुण्डुरशकाः खसाः । तङ्गणा माण्डवाश्चैव अन्तर्गिरिबहिर्गिरिः ॥ १३९ - १८२ × × × इतिहासज्ञ तर्न का सुझाव है कि कुछ समय तक कश्मीर के दक्षिणी भाग पर देमित्रियस राज्य करता था । (तर्न : ग्रीक्स इन बेक्ट्रिया एण्ड इण्डिया: १५५) मिनान्दर अर्थात् मिलिन्द के विषय में भी कतिपय विद्वानों ने उल्लेख किया है कि कश्मीर मिलिन्द के राज्य में था । मिलिन्द पञ्ह का संवाद राजा मिलिन्द तथा नागार्जुन में केवल कश्मीर से बोस योजन दूर पर हुआ था । कश्मीर के इतिहास के ग्रीक तथा मिलिन्द के कश्मीर भूमि के राज्य करने का कहीं उल्लेख नहीं मिलता । प्रसिद्ध राजा तूरमाण शक था । असुर देश अर्थात् असीरिया के सन् ८४३ वर्ष ई० पू० के एक आलेख में 'माद' जाति का उल्लेख मिलता है । उनका पार्स जाति के साथ उल्लेख किया गया है । मग ईरानी पुरोहित वाचक शब्द मगुश का अपभ्रंश है । आगे चलकर यह शब्द अपभ्रंश होकर 'मोवज' रूप से प्रयुक्त होने लगा । मगपति अर्थात् प्रधान पुरोहित

७२ राजतरंगिणी के लिए 'मोगजन' 'मोगज' शब्द अभिहित हुआ। निष्कर्ष निकलता है। मग जाति पुराण वर्णित मग ब्राह्मण अर्थात् शाकद्वीपी ब्राह्मण है। 'मगम', जाति शाकद्वीपी क्षत्रिय है। उन्हें महाभारत में 'मेमक' कहा गया है। गामग जाति वैश्यों के निकटवर्ती जाति थी। गोग तथा मगोग शब्द का पुरातन बाइबिल में प्रयोग किया गया है। बाइबिल के गोग के देश को मगोग कहा गया है। ( इजकील ३८ : २-९) बाइबिल में उन्हें आक्रामक जाति रूप में चित्रित किया गया है। उनके सर्वनाश की भविष्यवाणी की गयी है। अलकसुनदर अर्थात् सिकन्दर के अभियान काल के वर्णनों में भी गोग तथा मगोग जातियों का उल्लेख मिलता है। उन्हें उत्तर-पूर्व के बारह राज्यों तथा एक दूसरे स्थान पर वाईस राज्यो में से एक राज्य माना गया है। 'गोग' तथा 'मगोग' सम्भवत हिब्रू द्वन्द्व है। उसका अर्थ सीमान्त स्थित बर्बर जाति है। उन्हें मध्ययुग में 'चित' 'मचिन' कहने लगे थे। उनका पूर्व एशिया में आवाद होना माना गया है। शक को बाइ- बोलीने में गिमरो कहते थे। इसका अर्थ घूमन्तू जाति होता है। उन्हें कालान्तर में सोथियन अर्थात् शक कहा जाने लगा था। पाणिनि काल अर्थात् पाँचवी अथवा चौथी शताब्दी ईसा पूर्व चीन ईरान आदि देशों की ओर से शकों पर आक्रमण होने लगे। आक्रमणों द्वारा त्रस्त होकर रक्षा निमित्त शक भारत की ओर बढे। ईरान में शक जाति एचमोनियन साम्राज्य स्थापन के समय ख्याति प्राप्त कर चुकी थी। यूनानी लेखकों ने स्काइस, नक किंवा शाह शब्द का प्रयोग इन घूमन्तू जातियों के लिए किया है। वे चीन की सीमान्त जातियां थी। हिरोडोट्स (४८४-४३१ वर्ष ईसा पूर्व) ने शकों की मुख्य शाखा को राजकीय शक कहा है। वे मिरोम के दूसरी तरफ पूर्व और अजोव सागर तथा क्रीमिया के दक्षिण बसे हुए थे। हिरोडोट्स के अनुसार राजकीय शब्द तीन मुख्य वर्गों में विभक्त थे। उनके राजा स्कोपसिस इदन्थाइसस और तक्षासिस थे। हिरो- डोट्स ने शकों मे चार वर्ण अथवा वर्ग का वर्णन किया है। मगम राजकीय शक थे। उनके अतिरिक्त और का उल्लेख किया है। गामग उनमें कृषक थे। मण्डीस शूद्र अर्थात् दास थे। भारतीय पुराणों तथा महाभारत में वर्णित शको के चार वर्ण इस प्रकार हिरोडोटस के वर्णन से मिल जाते हैं। अर्थात् मग ब्राह्मण थे। राज- कीय शकों में क्षत्रिय, कृषक, शिल्पी, वैश्य तथा शूद्र थे। लगभग सन् १५० ईसा पूर्व सरमेटिन जाति ने शको को पराजित किया था। यह जाति ईरानी थी। शकों से उनकी वेशभूषा तथा भाषा मिलती थी। इस जाति के लोग चतुर अश्वारोही थे। उनके अश्वों की जोन में पातु के पदाधान अर्थात् रकाब थे। अश्वारोही आक्रामक रण कौशल तथा चातुरी के कारण शकों पर हावी हो गये थे। उनकी स्त्रियों का स्थान घर तथा कुटुम्ब के साथ ही साथ युद्धस्थल भी था। सोम- रियन जाति की कन्या का विवाह तब तक नही हो सकता था, जब तक कि वह अपने किसी शत्रु की हत्या नहीं करती थी। सम्भव है कि इसी जाति की स्त्रियों की शक्ति के कारण स्त्री राज्य अथवा अमजोन्स की कल्पना की गयी थी। कल्हण ने राजतरंगिणी में राजा ललितादित्य के दिग्विजय के प्रसंग में स्त्रीराज्य का वर्णन किया है। दोनो-अञ्चल में इसी प्रकार के स्त्री सैनिक की एक समाधि मिली है। यह स्थान निकालेंस से १० मोल दूर होगा। जहाँ वह उनके शस्त्र तथा वेशभूषा का सम्बन्ध हूँ कुशान जाति से मिलता है। उन्होंने रणनीति में एक प्रकार से आमूल परिवर्तन किया था। धनुष के स्थान पर बर्छा, लम्बी कृपाण तथा चक्र