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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 879, कुल 984 में से

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पृष्ठ 879

७२ राजतरंगिणी के लिए 'मोगजन' 'मोगज' शब्द अभिहित हुआ। निष्कर्ष निकलता है। मग जाति पुराण वर्णित मग ब्राह्मण अर्थात् शाकद्वीपी ब्राह्मण है। 'मगम', जाति शाकद्वीपी क्षत्रिय है। उन्हें महाभारत में 'मेमक' कहा गया है। गामग जाति वैश्यों के निकटवर्ती जाति थी। गोग तथा मगोग शब्द का पुरातन बाइबिल में प्रयोग किया गया है। बाइबिल के गोग के देश को मगोग कहा गया है। ( इजकील ३८ : २-९) बाइबिल में उन्हें आक्रामक जाति रूप में चित्रित किया गया है। उनके सर्वनाश की भविष्यवाणी की गयी है। अलकसुनदर अर्थात् सिकन्दर के अभियान काल के वर्णनों में भी गोग तथा मगोग जातियों का उल्लेख मिलता है। उन्हें उत्तर-पूर्व के बारह राज्यों तथा एक दूसरे स्थान पर वाईस राज्यो में से एक राज्य माना गया है। 'गोग' तथा 'मगोग' सम्भवत हिब्रू द्वन्द्व है। उसका अर्थ सीमान्त स्थित बर्बर जाति है। उन्हें मध्ययुग में 'चित' 'मचिन' कहने लगे थे। उनका पूर्व एशिया में आवाद होना माना गया है। शक को बाइ- बोलीने में गिमरो कहते थे। इसका अर्थ घूमन्तू जाति होता है। उन्हें कालान्तर में सोथियन अर्थात् शक कहा जाने लगा था। पाणिनि काल अर्थात् पाँचवी अथवा चौथी शताब्दी ईसा पूर्व चीन ईरान आदि देशों की ओर से शकों पर आक्रमण होने लगे। आक्रमणों द्वारा त्रस्त होकर रक्षा निमित्त शक भारत की ओर बढे। ईरान में शक जाति एचमोनियन साम्राज्य स्थापन के समय ख्याति प्राप्त कर चुकी थी। यूनानी लेखकों ने स्काइस, नक किंवा शाह शब्द का प्रयोग इन घूमन्तू जातियों के लिए किया है। वे चीन की सीमान्त जातियां थी। हिरोडोट्स (४८४-४३१ वर्ष ईसा पूर्व) ने शकों की मुख्य शाखा को राजकीय शक कहा है। वे मिरोम के दूसरी तरफ पूर्व और अजोव सागर तथा क्रीमिया के दक्षिण बसे हुए थे। हिरोडोट्स के अनुसार राजकीय शब्द तीन मुख्य वर्गों में विभक्त थे। उनके राजा स्कोपसिस इदन्थाइसस और तक्षासिस थे। हिरो- डोट्स ने शकों मे चार वर्ण अथवा वर्ग का वर्णन किया है। मगम राजकीय शक थे। उनके अतिरिक्त और का उल्लेख किया है। गामग उनमें कृषक थे। मण्डीस शूद्र अर्थात् दास थे। भारतीय पुराणों तथा महाभारत में वर्णित शको के चार वर्ण इस प्रकार हिरोडोटस के वर्णन से मिल जाते हैं। अर्थात् मग ब्राह्मण थे। राज- कीय शकों में क्षत्रिय, कृषक, शिल्पी, वैश्य तथा शूद्र थे। लगभग सन् १५० ईसा पूर्व सरमेटिन जाति ने शको को पराजित किया था। यह जाति ईरानी थी। शकों से उनकी वेशभूषा तथा भाषा मिलती थी। इस जाति के लोग चतुर अश्वारोही थे। उनके अश्वों की जोन में पातु के पदाधान अर्थात् रकाब थे। अश्वारोही आक्रामक रण कौशल तथा चातुरी के कारण शकों पर हावी हो गये थे। उनकी स्त्रियों का स्थान घर तथा कुटुम्ब के साथ ही साथ युद्धस्थल भी था। सोम- रियन जाति की कन्या का विवाह तब तक नही हो सकता था, जब तक कि वह अपने किसी शत्रु की हत्या नहीं करती थी। सम्भव है कि इसी जाति की स्त्रियों की शक्ति के कारण स्त्री राज्य अथवा अमजोन्स की कल्पना की गयी थी। कल्हण ने राजतरंगिणी में राजा ललितादित्य के दिग्विजय के प्रसंग में स्त्रीराज्य का वर्णन किया है। दोनो-अञ्चल में इसी प्रकार के स्त्री सैनिक की एक समाधि मिली है। यह स्थान निकालेंस से १० मोल दूर होगा। जहाँ वह उनके शस्त्र तथा वेशभूषा का सम्बन्ध हूँ कुशान जाति से मिलता है। उन्होंने रणनीति में एक प्रकार से आमूल परिवर्तन किया था। धनुष के स्थान पर बर्छा, लम्बी कृपाण तथा चक्र

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