भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 880

परिशिष्ट ञ ७३ तुल्य आयुध बाण धारी थे। इस प्रकार के शस्त्र भारत में कनिष्क तथा विमकद फिसेस की मूर्तियों पर बने मिलते हैं। अनुमान लगाया जा सकता है। भारतीय कुशान, यू-ची, यू-शून-अलान तथा सरमेतीयास एक ही ईरानी जाति थी। कालान्तर में स्थान भेद के कारण उन्हे अन्य संज्ञाएँ दे दी गयी थी। यू ची शक जाति का एक नाम था। शक जाति प्रथम सहस्राब्दी ईसा पूर्व में काब्दास प्रदेश तथा कीमिया के मध्य में घूमती रहती थी। शकों की राजकीय समाधि जिसे स्थानीय भाषा में कुरगन कहते हैं पजिरिक कतन्द, शैव, साइबेरिया के करतोब से लेकर मैकोप, कलरमिस, कुब ओव, सेमी वृत्तनी प्रसकाकेशिया, दारतोम्लाहक मलशुनोव वोरोनेझ आदि रूस तक एक सूत्र में मिलती है। प्टालेमी मध्य एशिया के सिनीरिया को सीथिया कहता है। उन्हें अश्वभोजी मानता है। (हयमेघ- अश्वमेध)। शक जाति सरल स्वभाव की थी। उनके जीवनोपयोगी सामान हल्के होते थे। वे चतुर अश्वारोही होते थे। उनका निशाना अचूक बैठता था। वे विलक्षण आक्रामक होते थे। अलकसुन्दर (सिकन्दर) ने उत्तरी शकों पर डैन्यूब नदी पार कर आक्रमण किया था। अपना सशस्त्र अभियान सीर दरिया पर एक दुर्ग बनाकर समाप्त किया था। निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है। गोग तथा मगाग जाति का आक्रमण रोकने के लिये उसने लोहे तथा पीतल का द्वार निर्माण कराया था। सिकन्दर की यह योजना उसी प्रकार विदेशी आक्रमण रोकने की थी जिस प्रकार चीन ने अपनी विशाल दीवाल का निर्माण विदेशी आक्रमण को रोकने के लिए किया था। भविष्य पुराण वर्णित गणग तथा गग शब्दों का इन्ही गोग तथा मगाग जातियों के लिए प्रयोग किया गया है। शकद्वीप के तीन जातियो मग अथवा मक, मगग अर्थात् महाभारत के मशक, गणग अर्थात् भार- तीय गणक का वर्णन किया जा चुका है। शको की चौथी जाति मंडग है। इसे ननदक, मदक, मनक कहते है। यह ईरानी जाति 'मद' है। बैबलोन के अतिरिक्त अन्य मध्य एशिया के साहित्य में इसे मंड नाम की संज्ञा दी गयी है। हिताइत संहिता धारा ५४ में 'उमान मण्ड' शब्द का उल्लेख आया है। उरमियह झील के दक्षिण-पूर्व के भूखण्ड को 'मन' कहते थे। इसी मूल शब्द से किंवा अपभ्रंश रूप यूनानी शब्द मानियेनी किंवा मीर्तनी है। 'मद' अथवा 'मीड्स' जाति को सीरिया किंवा अपसीरिया (असुर) के लोगों ने महान् शक्तिशाली, पूर्वीय दूर देशीय जाति कहा है। कालान्तर में हृयदान, निहवन्द, इशफहान, राय तथा अजरवैजान भूखण्डों का नाम मीड्स देश और साम्राज्य का नाम मीडियन साम्राज्य पड़ गया। भारतीय पुरा साहित्य में शकद्वीप के चार वर्णों का वर्णन किया गया है। यह ऐतिहासिक तथ्य है। उक्त उदाहरणों से प्रमाणित हुआ है। वे शक जाति की और उपजातिया थी। मार्कोपोलो ने शीर वान (शीरवान) का उल्लेख किया है। आधुनिक अन्वेषणों से सिद्ध होता है कि शीरवान शब्द काश्यिपयन सी अर्थात् कश्यप सागर के लिए प्रयुक्त किया गया है। मुस्लिम भौगोलिक विद्वान् हुदूद-अल-आतये ने कैश्यिपयन सागर के पश्चिमोय तटीय क्षेत्र का नाम शीरवान दिया है। हमदुल्लाह कम विनी कहता है। कुरु से देकन्द का भूभाग शीरवान में सम्मिलित था। दस्तखरी कहता है—वर्ध से सड़क शीरवान तथा शमाखिया से देकन्द जाती है। कुर्दिस्तान की एक नदी का नाम शीरवान है। ईरान की एक नदी का नाम शीरोन है। वह बस्ररंग पहाड़ी से निकल कर फुज रुक जिला १०