राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
परिशिष्ट ञ ७३ तुल्य आयुध बाण धारी थे। इस प्रकार के शस्त्र भारत में कनिष्क तथा विमकद फिसेस की मूर्तियों पर बने मिलते हैं। अनुमान लगाया जा सकता है। भारतीय कुशान, यू-ची, यू-शून-अलान तथा सरमेतीयास एक ही ईरानी जाति थी। कालान्तर में स्थान भेद के कारण उन्हे अन्य संज्ञाएँ दे दी गयी थी। यू ची शक जाति का एक नाम था। शक जाति प्रथम सहस्राब्दी ईसा पूर्व में काब्दास प्रदेश तथा कीमिया के मध्य में घूमती रहती थी। शकों की राजकीय समाधि जिसे स्थानीय भाषा में कुरगन कहते हैं पजिरिक कतन्द, शैव, साइबेरिया के करतोब से लेकर मैकोप, कलरमिस, कुब ओव, सेमी वृत्तनी प्रसकाकेशिया, दारतोम्लाहक मलशुनोव वोरोनेझ आदि रूस तक एक सूत्र में मिलती है। प्टालेमी मध्य एशिया के सिनीरिया को सीथिया कहता है। उन्हें अश्वभोजी मानता है। (हयमेघ- अश्वमेध)। शक जाति सरल स्वभाव की थी। उनके जीवनोपयोगी सामान हल्के होते थे। वे चतुर अश्वारोही होते थे। उनका निशाना अचूक बैठता था। वे विलक्षण आक्रामक होते थे। अलकसुन्दर (सिकन्दर) ने उत्तरी शकों पर डैन्यूब नदी पार कर आक्रमण किया था। अपना सशस्त्र अभियान सीर दरिया पर एक दुर्ग बनाकर समाप्त किया था। निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है। गोग तथा मगाग जाति का आक्रमण रोकने के लिये उसने लोहे तथा पीतल का द्वार निर्माण कराया था। सिकन्दर की यह योजना उसी प्रकार विदेशी आक्रमण रोकने की थी जिस प्रकार चीन ने अपनी विशाल दीवाल का निर्माण विदेशी आक्रमण को रोकने के लिए किया था। भविष्य पुराण वर्णित गणग तथा गग शब्दों का इन्ही गोग तथा मगाग जातियों के लिए प्रयोग किया गया है। शकद्वीप के तीन जातियो मग अथवा मक, मगग अर्थात् महाभारत के मशक, गणग अर्थात् भार- तीय गणक का वर्णन किया जा चुका है। शको की चौथी जाति मंडग है। इसे ननदक, मदक, मनक कहते है। यह ईरानी जाति 'मद' है। बैबलोन के अतिरिक्त अन्य मध्य एशिया के साहित्य में इसे मंड नाम की संज्ञा दी गयी है। हिताइत संहिता धारा ५४ में 'उमान मण्ड' शब्द का उल्लेख आया है। उरमियह झील के दक्षिण-पूर्व के भूखण्ड को 'मन' कहते थे। इसी मूल शब्द से किंवा अपभ्रंश रूप यूनानी शब्द मानियेनी किंवा मीर्तनी है। 'मद' अथवा 'मीड्स' जाति को सीरिया किंवा अपसीरिया (असुर) के लोगों ने महान् शक्तिशाली, पूर्वीय दूर देशीय जाति कहा है। कालान्तर में हृयदान, निहवन्द, इशफहान, राय तथा अजरवैजान भूखण्डों का नाम मीड्स देश और साम्राज्य का नाम मीडियन साम्राज्य पड़ गया। भारतीय पुरा साहित्य में शकद्वीप के चार वर्णों का वर्णन किया गया है। यह ऐतिहासिक तथ्य है। उक्त उदाहरणों से प्रमाणित हुआ है। वे शक जाति की और उपजातिया थी। मार्कोपोलो ने शीर वान (शीरवान) का उल्लेख किया है। आधुनिक अन्वेषणों से सिद्ध होता है कि शीरवान शब्द काश्यिपयन सी अर्थात् कश्यप सागर के लिए प्रयुक्त किया गया है। मुस्लिम भौगोलिक विद्वान् हुदूद-अल-आतये ने कैश्यिपयन सागर के पश्चिमोय तटीय क्षेत्र का नाम शीरवान दिया है। हमदुल्लाह कम विनी कहता है। कुरु से देकन्द का भूभाग शीरवान में सम्मिलित था। दस्तखरी कहता है—वर्ध से सड़क शीरवान तथा शमाखिया से देकन्द जाती है। कुर्दिस्तान की एक नदी का नाम शीरवान है। ईरान की एक नदी का नाम शीरोन है। वह बस्ररंग पहाड़ी से निकल कर फुज रुक जिला १०
७४ राजतरंगिणी में अर्जंजन के दक्षिण-पूर्व बहती है । इस में एक नदी का नाम मोलांग्य है । मोलांग्यो स्त्री भाषा में दूध को कहते हैं । पूर्व मुस्लिम काल में यहां के राजाओं की उपाधि शोरयान शाह थी । सोलहवी शताब्दी के पूर्व वक्षु अर्थात् आमू दरया कैस्पियन सागर में मिलती थी । प्राकृतिक कारणों से धारा बदल गयी । इस समय यह अरल सागर में गिरती है । कैस्पियन सागर तथा अरल सागर पूर्व काल में मिले थे । इस समय दोनो सागरो के बीच विस्तृत भूखण्ड है । कैस्पियन सागर का वर्तमान रूप पूर्व रूप से भिन्न है । कैस्पियन सागर शताब्दियो पहले पूर्व दिशा में बहुत दूर तक फैला था । आज यहां सूखा भूभाग है । उत्तर में इसी प्रकार बहुत दूर तक चला गया था । अरल सागर कैस्पियन सागर का एक भाग है । कैस्पियन सागर तथा अरल सागर के मध्य का भूखण्ड कैस्पियन सागर में जलमग्न था । अतएव आमू ( वक्षु ) तथा सीर दरया दोनो कैस्पियन सागर में मिलती थी । अरसीद तथा सहसनीट काल में आर्यों तथा पारसियों का गाथाकालीन मूलस्थान आमू तथा सीर दरया के अन्तर्वेदी ( दोआब ) में था । उसे स्वर्णयुग का देश कहते थे । कालान्तर में जेंगा वेन्दोदद से प्रतीत होता है यम शीत तथा प्राकृतिक उपद्रवो से बचने और आबादी अधिक होने के कारण दक्षिण दिशा की ओर जनता को ले गया । यह स्थान आर्यों के पूर्व उस समय था । आर्यों का ज्ञातव्य जगत् महा जाता था । आर्यों के देश त्याग देने पर अनार्य जातिया वहा बस गयी । तूर्य शब्द अनार्य जातियों के लिए अभिहित किया गया है । अतएव पारसी ग्रन्थो में शको का उल्लेख होना अनिवार्य प्रतीत होता है । उसका कारण है । शको द्वारा आबाद भूभाग के साथ पारसी जाति के धर्म तथा इतिहास का निकट सम्बन्ध हो जाता है । पारसियों के ग्रन्थो में आर्य, तूर्य, शरिम, सैन तथा दाह जाति का उल्लेख मिलता है । पश्चिमीय विद्वानों का मत है तूर्य तथा सरीमा शब्द शको के लिए आया है । ईरानी गाथा पुस्तकों में सरोया, तूर्य तथा आर्य ध्रोतोना के तीन पुत्र कहे गये है । कालान्तर में ध्रीतोना का रूप अचमीनिअन काल में यह क्षेत्र शक तथा शकतिग्रखोदा जातियो द्वारा आबाद था । कुछ समय पश्चात् शको ने इस क्षेत्र को त्याग दिया । सीस्तान में चरभूमि तथा कालक्षेप की सुविधाओ के कारण आकर बस गये । एक मत है कि पामीर के गलचा तथा शाल्ती जाति पूर्वकालीन शक वंशज हैं । यह दोनो जातिया इस समय पाकिस्तान द्वारा अधि- कृत कश्मीर में है । उनका नाम फरीदून शब्द में बदल गया है । उस समय आर्य, तूर्य, तुर्क तथा सरिय एक ही थे । फिरदौसी की गाथा में फरोदून के पुत्रो का नाम सम, जल, तथा रुदवाह मिलता है । कालान्तर में तूर्य सज्ञा शक जाति के लिए दी जाने लगी । तोखनि, कुशान, खिषोनाइट, सकरोसाह, तथा तुर्क जाति की मूल जाति तूर्य हैं । ऋग्वेद में तुर्वसु का उल्लेख है । भागवत पुराण के अनुसार जनमेजय के पुरोहित तुर्कावशेय तुर्वसु जाति के वंशज थे । म्लेच्छ तथा यवन तुर्वसु की सन्तान माने जाते हैं । ( वायु पुराण ९९ : ३; भागवत १० : २२, २५, २७ ) स्वर शब्द का अर्थ शीघ्रगामी अथवा जल्दी होता है । तुर्ग शब्द अश्व का भी वाचक है । तूर्य अथवा शक लोग अश्वारोही थे । शीघ्रगामो थे । तूर्य शब्द वैदिक शब्द तुर्ववसु अथवा स्वर का अपभ्रंश हो सकता है । फिरदौसी तूरान क्षेत्र को तूर, तुर्क तथा चीनियो का निवास स्थान मानता है । आमू दरया को
तूरान तथा ईरान की मध्यवर्ती सीमा लिखता है। पारसी लोग आमू दरया के पारवर्ती देश के निवासी थे । उसे मर्ज-ए-तूरान कहते थे । अरब भौगोलिक तुर्कों का मूलस्थान सीर दरया के पूर्वोय क्षेत्र को मानते हैं । वोल्गा नदी को रूस में एक समय नहर तूरान कहते थे। वोल्गा तक का क्षेत्र रूसियों की दृष्टि में तुर्कों का निवास-स्थान था। तूरान, राजाओं की ग्रीष्मकालीन राजधानी अर्क-ढघ थी। इसे यूराल पर्वत कहा जाता है। तूरान देश को कैस्पियन सागर, ईरान अधित्यका, सीर दरया का उद्गम स्थान तथा उसकी पर्वतमाला, इरतिश एवं अकमोलित्स की अधित्यका के मध्यवर्ती क्षेत्र को शकदेश मानते हैं। इस प्रकार निष्कर्ष निकलता है कि ईरानी तूर अर्थात् जिसे शक कहते थे, वे कैस्पियन सागर के चारों तरफ सीर तथा आमू दरया से लेकर कैस्पियन सागर और वल्गा तथा डान नदी तक फैले थे । प्रश्न उपस्थित होता है। उक्त नदियों का वर्तमान नाम क्या है। उन्हें कैसे पहचाना जा सकता है । यदि उक्त नदियां शकद्वीप में मिल जांय तो शकद्वीप के मानचित्र का वास्तविक पता महाभारत के अनुसार प्राप्त हो सकता है। साथ ही महाभारत वर्णित शक देश की सत्यता सिद्ध हो जाती है। शकद्वीप स्थान क्षेत्र निर्विवाद हो जाता है । सीता नदी चीनी सीतो नदी है। उसे इस समय सीर दरया कहते हैं। इश्क, कुलसर, थटनशाह के दक्षिणी अधित्यका से निकलती है। यह पश्चिम बहती है। मणिनला नदी वर्तमान जरफशा नदी है । जरफशाम का अर्थ होता है जर अर्थात् सोना फैलाने वाली । वह नदी जबल अलबुत्तम पर्वतमाला से निकलती है। पर्वतमाला की ढाल पर सोना, चांदी, लोहा, ताम्बा, आदि की खानें हैं। यह नदी एक जप अथवा जनसर से निकलती है। पजोकंथ, समरकन्द, बोखारा बहती ह्वारिजम के समीप पश्चिमोय मरुभूमि के उथली दलदलीय सर में गिरती है । यह महाभारत वर्णित नदी मणिनल है । क्योंकि इसके जल में स्वर्ण, रजतादि के साथ मणि मिलते हैं। इसीलिए इसका नाम मणिनल रखना पडा है। इसके दक्षिण में वक्षु अथवा आमू दरया है। इस नदी की अनेक शाखा नदियां हैं। वकक्षाव इसकी एक शाखा नदी है। यह पामीर पर्वत से निकलती है। यह हजारो मील की यात्रा करती पूर्वकाल में कैस्पियन सागर तथा इस समय अरल सागर में गिरती है। चीनी भाषा में इसे पोत्सू तथा अलइदडीसी इसे बकक्षाव कहता है। वक्षु नदी के दक्षिण सघानियन जिला है। यह वर्तमान शर-एर- अशया है। सघानियन नदी के ऊर्ध्व भाग पर यह आबाद था। यह आमू की एक शाखा नदी है। इसे नहर जमील कहते हैं। कैस्पियन सागर में पश्चिम तथा उत्तर से गिरने वाली नदियों में वोल्गा है। प्टोलमी ने 'र' नदी कहा है। ईरानियन इसे 'रन्हा' कहते हैं। यूनानी अरस्तू इसे 'अर्स' या 'अरक्ष' कहते हैं। हिरो- डोट्स ने इसके लिए 'अर्जैस' शब्द का प्रयोग किया है। मूल शक शब्दावली में 'अरस' या 'अर्स' का अर्थ महान् होता है। अरब भौगोलिक विद्वानों ने वोल्गा को 'इत्तिल' कहा है। बलगार जाति इसके तट पर आबाद हो गयी। अतएव इसे वोल्गा कहा जाने लगा। पश्चिमी विद्वानों का मत है। वोल्गा का अर्थ आर्य स्लेवोनिक भाषा में महान् अथवा बड़ा होता है। एक ओर मत है। वोल्गा शब्द संस्कृत दन्द द्रकू का अप- भ्रंश है। रूसी लोग इसे वोल्गा न कहकर वोल्फा कहते हैं। 'व्रक' किंवा 'वृक' का अर्थ भेड़िया होता है। इसकी मुख्य शाखा नदी 'कम' है। अनुमान लगाया गया है। कम तथा 'र' मिलाकर इसका नाम कुमारो रखा गया था । कुमारी नदी का सप्त नदियों में उल्लेख है। शक भाषा के शब्द 'अर' का अर्थ कुमारी होता है। 'अर' का अपभ्रंश किंवा समानार्थक शब्द 'अर्स' अथवा 'अरक्ष' है। यह वोल्गा का प्राचीन नाम कहा जाता है ।
७६ राजतरंगिणी कैस्पियन सागर में गिरने वाली कुम एक और नदी है। सम्भवतः यह नदी कुमारी है। महाभारत में सुकुमारी तथा कुमारी नाम आता है। सभी लोग वोल्गा को प्रगविन सी कहते हैं, जिसका अर्थ सुकु- मारी होता है। पश्चिम से काश्यप सागर में मिलने वाली नदी 'कुर' है। महानदी वर्तमान नदी 'डान' है। इसका ईरानी नाम दन है। दन नाम ही दोन है। 'दन' तथा 'दोन' का अर्थ जल होता है। 'दन' का अर्थ नदी है। यह विशाल नदी है। अतएव उसे महानदीकी संज्ञा दी गयी है। 'अजोव' सागर में गिरती है। ईरानी घूमन्तू जातियां यथा सेमोरियन, गोथियन, सरमोनियन आदि प्राचीन काल में इस नदी की उपत्यका में रहती चली आई हैं। हिरोडोटस् डान नदी को शक द्वीप की पूर्वीय सीमा मानता है। शकद्वीप में सात वर्ष हैं। शकद्वीप के वर्णित सात वर्षों में गुरुमार तथा कुमार किंवा सुकुमारी तथा कुमारी अर्थात् वोल्गा तथा कुम नदी की उपत्यकाएं हैं। मणितोत्थन, मणिनजा नदी की उपत्यका है। मोदाको ऐतिहासिक मोडिया का क्षेत्र है। कुमुदोत्तर, यूनानी लेखको का कोमोडोई प्रदेश है। यह प्रदेश आमूदरया तक विस्तृत है। 'महाकास' किंवा 'महाकोष' 'अरवस' अर्थात् 'गोथिया' है। 'महापुरुष' शब्द लम्बे-चौड़े डील-डौल वाले लोगों के लिए प्रयोग किया जाता है। शकद्वीप का प्रारम्भिक भारतीय ब्राह्मण तथा बौद्ध ग्रन्थों में स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। इस काल में पृथ्वी चार भागो में विभाजित की गयी थी। मौर्य तथा कुशान काल में जम्बूद्वीप के अन्तर्गत भारतवर्ष का बोध होने लगा। जम्बूद्वीप बृहत्तर भारतवर्ष के लिए प्रयुक्त किया जाता था। जम्बूद्वीप में उत्तर कुरु अर्थात् तरिम उपत्यका तथा तुर्किस्तान सम्मिलित था। कालान्तर में पृथ्वी सात वर्षों में विभाजित की गयी। कर्नल टाड का मत है कि शक जाति तक्षक थी। वे अस्ररमा अर्थात् शकद्वीप में शासन करते थे। (टाड एनाल्स एण्ड एण्डिक्वेरी आफ राजस्थान ४५) श्री वी० बी० आयर का मत है कि शक द्वीप आक्स नदी के मूल, जक्सर्टीज तथा वक्षु जलीय सिंचित क्षेत्र, ओर सिन्धु नदी में पानी जिन क्षेत्रो से बह- कर उत्तर-पश्चिम भारत में आता है वही शक देश है। शक तथा कुश द्वीपो का अस्तित्व भिन्न है। कुशद्वीप का उल्लेख लेखो में मिलता है। कुश अथवा कुशिया शब्द परशियन के बहुत से लेखों में मिलता है। हमदान लेख में (सम्राट् दारयूह ईसापूर्व ५१२- ४८६ वर्ष) राज्य का विस्तार दिया गया है। युमारा क्षेत्र वक्षु तथा सीर दरया के मध्य था। कुछ विद्वान् कुशद्वीप को मध्य मिश्र और कुछ अबोसीनिया मानते हैं। मुद्य नाम मिश्र का था। मुद्य तथा कुश परसियन सम्राटों के क्षत्रपोके क्षेत्र में वर्णित किये गये हैं। मिश्र कुशद्वीप नहीं हो सकता। कुशद्वीप का अफ्रीका के उत्तर-पश्चिम होना सम्भव प्रतीत होता है। मिश्र के परे और भारत के पश्चिमी समुद्र के ठीक पश्चिमोय छोर पर अबीसीनिया इस समय भी स्थित है। इसका कुशद्वीप होना सम्भव है। शकद्वीप का शाब्दिक अर्थ समुद्र या नदियों से घिरा भूखण्ड है। सात द्वीपों से वसुमती अर्थात् पृथ्वी बनी है। सप्त द्वीपों में—जम्बू, प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रोंच, शक, तथा पुष्कर द्वीप हैं। शकद्वीप का नाम शाकद्वीप भी है। शक लोग शकद्वीप में रहते थे। यूनानियों ने इनका नाम सीथियन रखा है। पश्चिमा विद्वानो ने यही नाम शकों के लिए दिया है। प्राचीन पारसी लेखो में शको के तीन निवास- स्थानों का उल्लेख मिलता है।
परिशिष्ट ञ ७७ कुछ विद्वानों का कथन है कि शक लोग ईरान के पूर्वीय भाग हेलमण्ड अंचल में रहते थे । शकों का पुराना तथा नवीन सभी स्थान सीथिया नाम से सम्बोधित होता है । पूर्वी ईरान को शकस्तान कहते थे । वर्तमान नाम सीस्तान है । मध्यकालीन समय में इसे सिजिस्तान ईरानी तथा भारतीय शकद्वीप कहते थे । भारतवर्ष की आजादी के पश्चात् भारतीय ऐतिहासिकों के दृष्टिकोण में परिवर्तन हुआ है । नवीन अन्वेषणों अनुसन्धानों से भारतीय इतिहास पर नवीन प्रकाश पड़ रहा है। रूसी विद्वानों के मध्यएशिया की खोज करने, खनन कार्यों तथा प्राप्त अभिलेखों आदि के कारण भारतीय इतिहास की अनेक गुत्थियाँ जो अभी तक उलझी पड़ी है, उनके सुलझने की आशा हो गयी है । मध्यएशिया, अफगानिस्तान में अभी बहुत कुछ खोज तथा खनन कार्य करना बाकी पड़ा है। उनमें जितनी शीघ्रता से प्रगति होगी उतनी ही शीघ्रता पूर्वक भारतीय इतिहास पर प्रकाश पड़ेगा । भारतीय संस्कृति के विकास तथा उसके इतिहास पर भी मध्य- एशिया मुख्यतः शकों के इतिहास का वास्तविक ज्ञान होने पर नवीन दृष्टि से विवेकात्मक नवीन इतिहास रचना की आशा अनेक विद्वानों को होने लगी है । ०
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परिशिष्ट झ ७९ छान्दोग्योपनिषद् में उद्दालक आरुणि ने सद्गुरुवाले शिष्य को अपने अंतिम लक्ष्य पर पहुँचने के उदा- हरण के सम्बन्ध में गान्धार का उल्लेख किया है। शतपथ ब्राह्मण के (११ : ४ : १) तथा अनुवर्ती वाक्यों में उद्दालक आरुणि का उदीच्यों किंवा उत्तरी देश गंधार ) के निवासियों से सम्बन्ध बताया गया है। छान्दोग्य उपनिषद् (६:१४) में गान्धार का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। इसका उल्लेख उपनिषद् तथा ब्राह्मण काल के पश्चात् सूत्र काल तक किया गया है। बौधायन श्रौत सूत्र में गान्धार का उल्लेख मिलता है। (२१:१३) आपस्तम्ब श्रौत सूत्र (२२ : ६ : १८) में तथा हिरण्यकेशी श्रौत सूत्र (१७:६) में गान्धार का स्पष्ट उल्लेख है। ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में गान्धार शब्द का उल्लेख एक जन के सम्बन्ध में किया गया है। वहाँ के निवासियों को गांधारी कहा गया है। (ऋ० १:१२६ : १८) छान्दोग्योपनिषद् (६ : १४ : १२) तथा वैदिक साहित्य के अनुसार भारत के उत्तर-पश्चिम गान्धार एक जनपद था। राजा भाव्य अथवा भव्य द्वयय की स्त्री लोमसा ने गान्धार के वस्त्रों की बहुत प्रशंसा की है। भाव्य सिन्धु तटीय देश पर राज्य करता था। ऋग्वेद में गान्धार के भेंडो के ऊन की प्रशंसा की गयी है। (ऋग्वेद १:१२६ : १८) अथर्ववेद में अंगों तथा मगधों के साथ मूजबन्त तक गन्धार लोगों का उल्लेख किया गया है। अथर्ववेद का काल ऋग्वेद से बहुत पश्चात् का है। उस काल में भी जगत् को गान्धारों का यथेष्ट ज्ञान था (अथर्ववेद ५:२२:१४)। अथर्ववेद में गंधारियों किंवा गान्धारों का उल्लेख मूजवंतो के साथ किया गया है। उनकी गणना अवमानित जातियों में की गयी है। श्रौत सूत्रों में गान्धार जनपद तथा वहाँ के निवासियों का वर्णन मिलता है। कुछ विद्वानों का मत है। गान्धार निवासी कुभा अर्थात् काबुल नदी के तट, सिन्धु कुभा संगम, तथा सिन्धु के पूर्वीय तट पर कुछ दूर तक आबाद थे। कालान्तर में वे पारसी राज्य के अंग हो गये थे। पारसी राज फर्कसीज ने गान्धारों की सेना के साथ यूनान पर आक्रमण किया था। गान्धारराज नग्नजित का नाम वैदिक साहित्य सोम के स्थान पर अन्य वस्तु के उपयोग का मत दिया था। (शतपथ ब्राह्मण ८: १:४:१०; ऐतरेय ब्राह्मण ७:३४)। शतपथ ब्राह्मण (११ : ४ : १) में उद्दालक आरुणि का उदीच्यों अथवा उत्तरी देश गंधार के निवासियों के साथ संबन्ध बताया गया है। पुराणों में गान्धार का उल्लेख प्रचुर रूप से मिलता है। गान्धार का एक चन्द्र पौरववंशीय राजा था। उसके पिता का नाम आरद्वान किंवा अनुरुद्ध था। द्रुह्यु की चौथी पीढ़ी में हुआ था। उसने उत्तर- पश्चिम में गान्धार देश आबाद किया था। (वायु पुराण ९९:७:१० तथा विष्णु पुराण ४:१७:१)। गान्धार के नरेश को वायु तथा मत्स्य पुराणों ने द्रुह्युवंशी बताया है। (मत्स्य ४८:६; वायु ९९:९७) ब्रह्माण्ड पुराण के मत से गान्धार की चौथी पीढ़ी में प्रचेतस के एक शत पुत्र हुए थे। उन सबको म्लेच्छाधिप कहा गया है। (ब्रह्माण्ड पुराण ३ : ७४ : ११)। मत्स्य तथा ब्रह्माण्ड पुराणों में गान्धार का उल्लेख यवन, सिन्धु, सौवीर के साथ किया गया है। मत्स्य, वायु तथा विष्णु पुराणों में वर्णन है। द्रुह्यु के वंश में एक गान्धार उत्पन्न हुए थे। द्रुह्यु राजा ययाति के पुत्र थे। उन्हीं के नाम पर गान्धार देश का नामकरण किया गया था। (मत्स्य पुराण ४८; वायु पुराण; विष्णु पुराण ४ : १७) भागवत तथा ब्रह्म पुराण के अनुसार गान्धार द्रुह्यु की चौथी पीढ़ी में हुआ था। गान्धार के चार पुत्र धर्म, धृति, दुर्गम तथा प्रचेता थे। भागवत (९-२३-१५) ब्रह्म (१३) मत्स्य पुराण के अनुसार गान्धार को केवल धर्म, विदुध तथा प्रचेता तीन ही पुत्र थे। विष्णु पुराण तथा वाराह मिहिर के
८२ राजतरंगिणी धर्म स्थान खण्डहर हो गये थे । उसके अनुसार उत्तर दिशा में गान्धार का विस्तार १००० ली पूर्व में सिन्धु नदी तक था । राजधानी पुरुषपुर अर्थात् पेशावर ४० ली के क्षेत्र में फैला था । गान्धार राजवंश का लोप हो गया । कपिशा राज्य के अन्तर्गत उसका शासन होता था । नगर तथा ग्राम उजड़ गये थे । परन्तु देश धनधान्य पूर्ण था । उपज खूब होती थी । भूमि उर्वरा थी । अनेक प्रकार के अन्न, फल तथा फूल होते थे । लोग लज्जालु तथा कोमल हृदय थे । लोगों में साहित्य के प्रति रुचि थी । कुछ ही बौद्ध धर्मानुयायी बच गये थे । शेष मूर्तिपूजक तथा धर्म भ्रष्ट हो गये थे । पाणिनि का गान्धार प्रदेश में जन्म हुआ था । गान्धार की राजधानी पुष्कलावती किंवा पुष्करावती सिन्धु के पश्चिम तथा तक्षशिला के पूर्व की ओर थी । गान्धार पहले सिन्धु के दोनो ओर फैला था किन्तु कालान्तर में सिन्धु नदी के पश्चिम ओर ही रह गया । पुष्करावती नगर को नींव भरत के पुत्र पुष्कर ने डाली थी । (विष्णु पुराण ४ . ५) । आठवीं तथा नवी शताब्दी में मुसलमानों के उत्कर्ष के साथ ही साथ यह देश शनैःशनैः उनके राज- नीतिक तथा सांस्कृतिक प्रभाव में आ गया । सन् ८७० ई० में अरब सरदार याकूब ने अफगानिस्तान पर आंशिक विजय प्राप्त की थी । अलप्तगीन तथा सुबुक्तगीन के आक्रमणों का वहाँ के हिन्दू नरेशों ने सामना किया था। सन् ९९० में लम्पक (लमगान) का दुर्ग हिन्दुओं के हाथो से निकल गया । काफिरिस्तान के अतिरिक्त समस्त अफगानिस्तान को इस्लाम स्वीकार करना पड़ा । ग्यारहवीं तथा बारहवीं शताब्दी में हिन्दू शाही वंशजों के हाथ में गान्धार प्रदेश का शासन-सूत्र आ गया था । सन् १०२१ ई० में सुलतान महमूद गजनो ने गान्धारराज त्रिलोचन पाल पर आक्रमण किया । राजा तोंसी तट पर पराजित हो गया । गान्धार के हिन्दू धर्म तथा स्वतंत्रता दोनों का ही लोप हो गया । तत्पश्चात् केवल ५ वर्ष के लिए उसके पुत्र भीमपाल ने पुनः स्वतंत्रता प्राप्त की । परन्तु मुस्लिम शक्ति के सम्मुख गान्धार मुस्लिम धर्म तथा संस्कृति में लोप हो गया । मुस्लिम इतिहासकारों ने गान्धार की राज- धानी तक्षशिला का वर्णन नही किया है। तक्षशिला अपना पूर्व गौरव खो चुका था। खंडहरो का ढेर मात्र रह गया था । मुस्लिम इतिहासकारों ने उसका उल्लेख करना महत्वपूर्ण नही समझा । इम वैदिक काल से अठारहवीं शताब्दी तक गान्धार भारतीय राज्य का अंग होता और निकलता रहा है। उसका इतिहास भारतीय इतिहास में गुंथा है। उसे अलग रखना कठिन है। वहा भारतीय संस्कृति फली-फूली । यहाँ से बाहर गयी । ललित कलाएं विकसित हुईं । गान्धार का पुराना नाम, धर्मादि का लोप हो गया । उत्तर-पश्चिमीय सीमान्त प्रदेश के रूप में उसका अधिक क्षेत्र पाकिस्तान बनने के पूर्व भारत का अंग था । तक्षशिला का वर्णन करते हुए प्लिनी लिखता है कि नगर पर्वत मूल के उस स्थान पर आबाद था, जहाँ पर्वत भूमि में मिल जाता था । नगर समतल भूमि में बसा था । यह नगर की बड़ी प्रशंसा करता है कनिघम ने तक्षशिला में ५५ स्तूप, २८ विहार तथा ९ मन्दिरो का ध्वंसावशेष देखा था । नागार्जुनी कोन्डा के वीरपुरुष दत्त के अभिलेख में गान्धारका उल्लेख आया है। गान्धार में १००० से अधिक बौद्ध विहार थे । युवान्च्वाग के समय में उनको बुरी अवस्था थी । अनेक स्तूपों के शिखर खंडहर थे । लगभग १०० देव मन्दिर गान्धार में थे । पुष्करावती गान्धार को राजधानी थी । उसकी राजधानियां विभिन्न समयों में बदलती रही है । पुष्करावती किंवा पुष्कलावती तथा कभी तक्षशिला हो
परिशिष्ट ख ८३ जाती थी । पुष्करावती सिन्धु के पश्चिम तथा तक्षशिला के पूर्व ओर आबाद थी । अभिधर्म कोष शास्त्र - एवं सुमंगल विलासिनी का रचयिता बसुबन्धु पुष्करावती का निवासी था । गान्धार जातक में गान्धार कश्मीर का उल्लेख मिलता है । दरायुह के बेहिस्तुन अभिलेख ( ईसा पूर्व पाँच सो बाईस से चार सो छियासी वर्ष ) गान्धार का उल्लेख है। दरायुह ( दारियस ) के सूसा प्रासाद के भग्नावशेष के एक अभिलेख में गान्धार का उल्लेख मिला है । जम्बूद्वीप की सीमा वर्णन में उत्तर-पश्चिम गान्धार तथा कश्मीर का उल्लेख किया गया है । सोलह जनपदों में कम्बोज तथा गान्धार को उत्तरापथ में सम्मिलित किया गया है । खुद्दक निकाय के उत्तरखण्ड चुल्ल निद्देस में गान्धार जनपद के स्थान पर भोन अर्थात् भवन जनपद का उल्लेख किया गया है । मज्झिम निकाय की अट्ठ कथा तथा पपंचसूदनी में गान्धार राष्ट्र सीमान्त पर स्थित जनपद बताया गया है । यहाँ पर कश्मीर गान्धार का नाम साथ-साथ लिया गया है । ( जातक भाग २ : ३६५ ) । अनेक विद्वानों ने इसके आधार पर कश्मीर को गान्धार के अन्तर्गत बताया है । यह अप्रमाणित है । ठीक नहीं है । मार्कण्डेय, वायु, ब्रह्माण्ड, मत्स्य तथा वामन पुराणों में 'गान्धारा यवनाश्चैव' का उल्लेख मिलता है । गान्धार, यवन शब्द एक साथ प्रयुक्त किया गया । उनसे यवन देश तथा गान्धार का समीप होना प्रतीत होता है । सिन्धु अर्थात् आधुनिक सिन्ध प्रदेश सिन्धु नदी के पश्चिम तथा पूर्व में सिन्धु नदी के अधोभाग के पूर्व था । सोवीर क्षेत्र झेलम-चनाव संगम से ५० मील अधोभाग में था । भद्र देश वर्तमान सियालकोट तथा उसका समीपवर्ती क्षेत्र है । कुणिन्द लोगों के विषय में कहा जाता है कि कुलू अंचल के आधुनिक कुलेतस हैं । प्राचीन काल में यह अंचल सहारनपुर तथा अम्बाला जिले तक विस्तृत था । इस क्षेत्र से तत्कालीन मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं । पारद लोग खुराशान क्षेत्र के निवासी थे । यवन अफगानिस्तान में थे । यूनानी जाति अफगानिस्तान में आबाद हो गयी थी । राज्य वही स्थापित कर लिया था । कुहून शब्द काबुल नदी जिसका प्राचीन नाम कुभा किंवा कुहू था उसकी उपत्यका के निवासियो के लिए आया है। 'गान्धारान् वरयान् हुन्दान्,' 'गान्धारान् ओरसान् कुहून्,' 'गान्धारान् रुरसान् (ओरसान्) कुहून्' आदि उल्लेख वायु, ब्रह्माण्ड तथा मार्कण्डेय पुराणों में मिलते हैं । इससे निष्कर्ष निकलता है । गान्धार कुभा अर्थात् काबुल नदी की उपत्यका तक विस्तृत था । 'शिवपौरान् इन्द्रहार्यान्', 'शिवपौरान् इन्द्रभरून्' का उल्लेख वायु, ब्रह्माण्ड तथा मत्स्य पुराणों में मिलता है । शिव पौरान् से अर्थ शिव नगर के पौरगण से है । शिवपुर अर्थात् वर्तमान शोरकोट जिला पश्चिमी पाकिस्तान के लिए व्यवहृत किया गया है । संम्मोह तन्त्र की तालिका ( २ : ४ ) में गान्धार देश का उल्लेख किया गया है । 'हूण कौरव गान्धार' अर्थात् हूणों के समीप देश की ओर संकेत किया गया है । गान्धार का दूसरा नाम दिहन्दास दिया गया है । दोनों शब्द समानार्थक माने गये हैं । दिहन्दास वास्तव में उदभाण्डपुर प्रतीत होता है । गान्धार को कन्धार में मिलाने का प्रयास किया गया है परन्तु यह खींचातानी तर्कसम्मत नहीं मालूम होती । गान्धार की जो स्थिति तथा सीमा बतायी गयी है उसमे वर्तमान कन्धार का मेल नहीं खाता । सम्भव है । गान्धार के नाम पर अफगानिस्तान के दक्षिण में गान्धार नगर बसाया गया होगा ! हो सकता है गान्धार का अपभ्रंश वर्तमान कन्धार हो गया । भारत में काशी नाम के कितने ही स्थान हैं । परन्तु वाराणसी को ही काशी वास्तविक काशी राज्य रही । अन्यथा, दक्षिण काशी, उत्तर काशी अनेक स्थान काशी के नाम पर है ।
८२ राजतरंगिणी धर्म स्थान खण्डहर हो गये थे। उसके अनुसार उत्तर दिशा में गान्धार का विस्तार १००० ली पूर्व में सिन्धु नदी तक था । राजधानी पुरुषपुर अर्थात् पेशावर ४० ली के क्षेत्र में फैला था । गान्धार राजवंश का लोप हो गया । कपिशा राज्य के अन्तर्गत उसका शासन होता था । नगर तथा ग्राम उजड़ गये थे। परन्तु देश धनधान्य पूर्ण था। उपज खूब होती थी । भूमि उर्वरा थी । अनेक प्रकार के अन्न, फल तथा फूल होते थे । लोग लज्जालु तथा कोमल हृदय थे । लोगों में गान्धर्व के प्रति रुचि थी । कुछ ही बौद्ध धर्मानुयायी बच गये थे । शेष मूर्तिपूजक तथा धर्म भ्रष्ट हो गये थे । पाणिनि का गान्धार प्रदेश में जन्म हुआ था । गान्धार की राजधानी पुष्कलावती किंवा पुष्करावती सिन्धु के पश्चिम तथा तक्षशिला के पूर्व की ओर था । गान्धार पहले सिन्धु के दोनों ओर फैला था किन्तु कालान्तर में सिन्धु नदी के पश्चिम ओर ही रह गया । पुष्करावती नगर की नींव भरत के पुत्र पुष्कर ने डाली थी । ( विष्णु पुराण ४ . ५ ) । आठवीं तथा नवी शताब्दी में मुसलमानों के उत्कर्ष के साथ ही साथ यह देश शनैः-शनैः उनके राज- नीतिक तथा सांस्कृतिक प्रभाव में आ गया । सन् ८७० ई० में अरब सरदार याकूब ने अफगानिस्तान पर आंशिक विजय प्राप्त की थी । अलप्तगीन तथा सुबुक्तगीन के आक्रमणों का यहाँ के हिन्दू नरेशों ने सामना किया था । सन् ९९० में लम्पक ( लमगान ) का दुर्ग हिन्दुओं के हाथों से निकल गया । काफिरिस्तान के अतिरिक्त समस्त अफगानिस्तान को इस्लाम स्वीकार करना पड़ा । ग्यारहवीं तथा बारहवीं शताब्दी में हिंदू शाही वंशजो के हाथ में गान्धार प्रदेश का शासन-सूत्र आ गया था । सन् १०२१ ई० में सुलतान महमूद गजनी ने गान्धारराज त्रिलोचन पाल पर आक्रमण किया । राजा तोसी तट पर पराजित हो गया । गान्धार के हिन्दू धर्म तथा स्वतंत्रता दोनों का ही लोप हो गया । तत्पश्चात् केवल ५ वर्ष के लिए उसके पुत्र भीमपाल ने पुनः स्वतंत्रता प्राप्त की । परन्तु मुस्लिम शक्ति के सम्मुख गान्धार मुस्लिम धर्म तथा संस्कृति में लीन हो गया । मुस्लिम इतिहासकारों ने गान्धार की राज- धानी तक्षशिला का वर्णन नहीं किया है । तक्षशिला अपना पूर्व गौरव खो चुका था । खंडहरों का ढेर मात्र रह गया था । मुस्लिम इतिहासकारों ने उसका उल्लेख करना महत्वपूर्ण नहीं समझा । इस वैदिक काल से अठारहवीं शताब्दी तक गान्धार भारतीय राज्य का अंग होता और निकलता रहा है । उसका इतिहास भारतीय इतिहास से गुंथा है। उसे अलग रखना कठिन है। वहां भारतीय संस्कृति फली-फूली । वहाँ से बाहर गयी । ललित कलाएँ विकसित हुई । गान्धार का पुराना नाम, धर्मादि का लोप हो गया । उत्तर-पश्चिमीय सीमान्त प्रदेश के रूप में उसका अधिक क्षेत्र पाकिस्तान बनने के पूर्व भारत का अंग था । तक्षशिला का वर्णन करते हुए प्लिनी लिखता है कि नगर पर्वत मूल के उस स्थान पर आबाद था, जहाँ पर्वत भूमि में मिल जाता था । नगर समतल भूमि में बसा था । वह नगर की बड़ी प्रशंसा करता है कनिघम ने तक्षशिला मे ५५ स्तूप, २८ विहार तथा ९ मन्दिरों का ध्वंसावशेष देखा था । नागार्जुनो कोण्डा के वीरपुरुष दत्त के अभिलेख में गान्धारका उल्लेख आया है। गान्धार में १००० से अधिक बौद्ध विहार थे । युवान्चुवाग के समय में उनकी बुरी अवस्था थी । अनेक स्तूपों के शिखर खंडहर थे । लगभग १०० देव मन्दिर गान्धार में थे । पुष्करावती गान्धार की राजधानी थी । उसकी राजधानियाँ विभिन्न समयों में बदलती रही है । पुष्करावती किंवा पुष्कलावती तथा कभी तक्षशिला ही
परिशिष्ट ज्ञ ८३ जाती थी । पुष्करावती सिन्धु के पश्चिम तथा तक्षशिला के पूर्व ओर आबाद थी । अभिधर्म कोष शास्त्र - एवं सुमंगल विलासिनी का रचयिता वसुबन्धु पुष्करावती का निवासी था । गान्धार जातक में गान्धार कश्मीर का उल्लेख मिलता है। दरायुह के बेहिसुत अभिलेख ( ईसा पूर्व पाँच सौ बाईस से चार सौ छियासी वर्ष ) गान्धार का उल्लेख है। दरायुह ( दारियस ) के सूसा प्रासाद के भग्नावशेष के एक अभिलेख में गान्धार का उल्लेख मिला है। जम्बूद्वीप की सीमा वर्णन में उत्तर-पश्चिम गान्धार तथा कश्मीर का उल्लेख किया गया है। सोलह जनपदों में कम्बोज तथा गान्धार को उत्तरापथ में सम्मिलित किया गया है ! खुद्दक निकाय के उत्तरखण्ड चुल्ल निद्देस में गान्धार जनपद के स्थान पर भोन अर्थात् भवन जनपद का उल्लेख किया गया है। मज्झिम निकाय की अट्ठ कथा तथा पपंचसूदनी में गान्धार राष्ट्र सीमान्त पर स्थित जनपद बताया गया है। यहाँ पर कश्मीर गान्धार का नाम साथ-साथ लिया गया है। ( जातक भाग २ : ३६५ ) । अनेक विद्वानों ने इसके आधार पर कश्मीर को गान्धार के अन्तर्गत बताया है। यह अप्रमाणित है। ठीक नहीं है। मार्कण्डेय, वायु, ब्रह्माण्ड, मत्स्य तथा वामन पुराणों में 'गान्धारा यवनाश्चैव' का उल्लेख मिलता है । गान्धार, यवन शब्द एक साथ प्रयुक्त किया गया। उनसे यवन देश तथा गान्धार का समीप होना प्रतीत होता है । सिन्धु अर्थात् आधुनिक सिन्ध प्रदेश सिन्धु नदी के पश्चिम तथा पूर्व में सिन्धु नदी के अधोभाग के पूर्व था । सौवीर क्षेत्र झेलम-चनाब संगम से ५० मील अधोभाग में था । भद्र देश वर्तमान सियालकोट तथा उसका समीपवर्ती क्षेत्र है । कुणिन्द लोगों के विषय में कहा जाता है कि कुलू अंचल के आधुनिक कुलेत्त हैं। प्राचीन काल में यह अंचल सहारनपुर तथा अम्बाला जिले तक विस्तृत था । इस क्षेत्र से तत्कालीन मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं । पारद लोग खुराशान क्षेत्र के निवासी थे। यवन अफगानिस्तान में थे । यूनानी जाति अफगानिस्तान में आबाद हो गयी थी । राज्य वही स्थापित कर लिया था । कुहून शब्द काबुल नदी जिसका प्राचीन नाम कुभा किंवा कुहू था उसकी उपत्यका के निवासियों के लिए आया है। 'गान्धारांन् वश्यान् हूह्वान्,' 'गान्धारान् औरसान् कुह्हून्,' 'गान्धारान् रुरसान् ( औरसान् ) कुरून्' आदि उल्लेख वायु, ब्रह्माण्ड तथा मार्कण्डेय पुराणों में मिलते हैं। इससे निष्कर्ष निकलता है । गान्धार कुभा अर्थात् काबुल नदी की उपत्यका तक विस्तृत था । 'शिवपौरान् इन्द्रहाक्षान्', 'शिवपौरान् इन्द्रभक्षन्' का उल्लेख वायु, ब्रह्माण्ड तथा मत्स्य पुराणों में मिलता है । शिव पौरान् से अर्थ शिव नगर के पौरागण से है । शिवपुर अर्थात् वर्तमान शोरकोट जिला पश्चिमी पाकिस्तान के लिए व्यवहृत किया गया है । संम्मोह तन्त्र की तालिका ( २ : ४ ) में गान्धार देश का उल्लेख किया गया है ।'हूण कौरव गान्धार' अर्थात् हूणों के समीप देश की ओर संकेत किया गया है । गान्धार का दूसरा नाम दिह्न्दास दिया गया है। दोनों शब्द समानार्थक माने गये हैं । दिह्न्दास वास्तव में उदभाण्डपुर प्रतीत होता है । गान्धार को कन्धार में मिलाने का प्रयास किया गया है परन्तु यह खीचातानी तर्कसम्मत नहीं मालूम होती । गान्धार की जो स्थिति तथा सीमा बतायी गयी है उसमे वर्तमान कन्धार का मेल नहीं खाता । सम्भव है। गान्धार के नाम पर अफगानिस्तान के दक्षिण में गान्धार नगर बसाया गया होगा ! हो सकता है गान्धार का अपभ्रंश वर्तमान कन्धार हो गया । भारत मे काशी नाम के कितने ही स्थान हैं । परन्तु वाराणसी को ही काशी वास्तविक काशी राज्य रही । अगस्त्य, दक्षिण काशी, उत्तर काशी अनेक स्थान काशी के नाम पर हैं ।
८४ राजतरंगिणी पौराणिक परम्परा के अनुसार गान्धार में सिन्धु नदी के दोनों तटों पर दो नगर तक्षशिला तथा पुष्कलावती आबाद थे । तक्षशिला सराय कला रेल जंक्शन से रावलपिण्डी के उत्तर-पश्चिम २० मील पर हरो नदी की उपत्यका में आबाद है । यहाँ ३ नगरों के ध्वंसावशेष हैं। धुर दक्षिणी ध्वंसावशेष का स्थान उठती अधित्यका मीर टीला पर है । पुष्कलावती किंवा पुष्करावती नगर स्वात प्रदेश में परगना चारसद्दा मील डयारत अंचल में १७ मील उत्तर-पूर्व पेशावर में स्थित है । स्वात उपत्यका को प्राचीन काल में उड्डियान देश कहते थे । स्कन्द पुराण की तालिका में उसकी क्रम संख्या १३ तथा ग्राम-संख्या ९ लाख दी गयी है । सातवीं शताब्दी में हुएनसांग जिस समय उत्तरापथ में प्रवेश किया उस समय उदभाण्डपुर कपिशा के राजा की द्वितीय राजधानी थी । उस राज्य में लम्पक (लगमान) नगर, नगरहार (जलालाबाद), वर्ण (वन्नू) तथा जागूड़ अर्थात् दक्षिणी अफगानिस्तान गजनी पड़ता था । गजनी का नाम स्कन्द पुराण में गाजनक आया है । उसके ग्रामों की संख्या ७२ हजार दी गयी है । देशों की तालिका में उसकी क्रम-संख्या ७ है । गान्धार देश के विषय में हुएनसांग लिखता है । गान्धार की राजधानी पुरुषपुर थी । राजवंश लुप्त हो गया था । कपिशा राज्य के अन्तर्गत था । नगर तथा ग्राम उजड़ गये थे । बहुत थोड़े लोग वहाँ निवास करते थे । श्री लक्ष्मीधर ग्यारह पिशाच देशों में गान्धार को भी मानते हैं । यहाँ अर्थ यह लगाना चाहिए कि वहाँ के लोग पैशाची भाषा मानते थे । (कम्परेटिव ग्रामर आफ प्राकृत लेंगुवेज पैरा-२७) स्कन्द पुराण के देशों में तथा महावस्तु के जनपदों में गान्धार और कम्बोज जनपद का नाम नहीं है । किन्तु अंगुत्तर निकाय में १६ जनपदों में गान्धार, कम्बोज का नाम दिया गया है । महावंश में शिवि तथा दशार्ण दो अन्य जनपदों का उल्लेख किया गया है । महावस्तु में बुद्ध ज्ञान प्रचारार्थ दिये गये नामों में शिवि देश सम्मिलित है । शिवि स्कन्द पुराण के देशों की तालिका में ४५वाँ नाम है । उसके ग्रामों की संख्या १० हजार दी गयी है । कम्बोज जनपद का भी उल्लेख है । स्कन्द पुराण की तालिका में क्रमसंख्या १९ तथा ग्रामों की संख्या १० लाख दी गयी है । गान्धार जनपद स्कन्द पुराण तथा महावंश के रचना- काल में अपना महत्त्व खो चुका था । उसका महत्त्व शिवि एवं दशार्ण जनपदों को जो उसी क्षेत्र के थे मिल गया था । बौद्ध काल में शिवि देश अपने सुन्दर दुशालों के लिए अत्यन्त प्रसिद्ध था । चण्डप्रद्योत अवन्ती के राजा ने जीवक को पाण्डु रोग से मुक्त होने पर शिवि का बना दुशाला दिया था । जीवक तक्षशिला का स्नातक था । यहाँ उसने आयुर्वेद तथा चिकित्सा शास्त्र की शिक्षा प्राप्त की थी । तक्षशिला में उन दिनों भारतवर्ष के कोने-कोने से यथा लाट देश, कुरु देश तथा शिवि देश से विद्यार्थी शिक्षा प्राप्ति निमित्त जाया करते थे । विनय पिटक में स्पष्ट उल्लेख है । जीवक ने इन दुशालों (सिवेयक दुस्स) को भगवान् बुद्ध को अर्पित किया था । शिवि जातक में कोशल के राजा प्रसेनजित ने भगवान् बुद्ध को १ लाख मूल्य के शिवि राज्य में बने वस्त्र अर्थात् सिवेयक वस्त्रं दिया था । मालूम होता है कि गान्धार क्षेत्र उन दिनों शिवि तथा दशार्ण देशों में मिल गया था । श्यान (थाईलैण्ड) के उत्तर स्थित यूनान प्रान्त का प्राचीन भारतीय नाम गान्धार था । ईसा से दो शती पूर्व वहाँ भारतीय आबाद हो गये थे । तेरहवीं शताब्दी तक यूनान का नाम गान्धार ही प्रचलित था। भारतीय गान्धार पश्चिमी पाकिस्तान का पेशावर तथा रावलपिण्डी का जिला था ।
परिशिष्ट 'ट' गुह्यक ( तरंग १ : १५६ पृष्ठ : २१३ ) गुह्यक दस देवयोनियों में यक्षों तुल्य एक योनि हैं। अमर कोश के अनुसार दस निम्नलिखित देवयोनियाँ हैं : विद्याधराप्सरो-यक्ष-रक्षो-गन्धर्व-किन्नराः । पिशाचो गुह्यकः सिद्धो भूतोऽमी देवयोनयः ॥ १:१:११ कुवेर को गुह्यकेश्वर तथा वैश्रवण भी कहा गया है । गुह्यक उस वर्ग के लिए प्रयुक्त किया गया है जो कुवेर के कोष की रक्षा करते थे । उनके स्वामी गुह्यकेश्वर थे । कुवेरस्त्र्यम्बकसखो यक्षराट् गुह्यकेश्वरः । १:२:७१ मनुष्यधर्मा धनदो राजराजो धनाधिपः । किन्नरेशो वैश्रवणः पौलस्त्यो नरवाहनः ॥ १:२:७२ बौद्ध भास्कर्य किंवा मूर्तिकला में कुबेर तथा यक्षों का प्रमुख स्थान है । कुवेर की अलकापुरी का बड़ा सुन्दर वर्णन मेघदूत में कालिदास ने किया है । यक्ष का स्वामी कुवेर है । बौद्ध मूर्तियों में कुवेर तथा यक्ष भगवान् की पूजा करते दिखाये गये हैं । गुह्यक शब्द का एक जाति के रूप में प्रयोग मिलता है । उन्हें देवयोनि के अन्तर्गत एक जाति महा- भारत ने माना है । ( आदि पर्व १८६ : ७ ) इस जाति के लोग द्रौपदी के स्वयंवर के समय उपस्थित थे । गुह्यकेश्वर अर्थात् कुवेर की सभा में गुह्यकों का स्थान था । ( सभा पर्व १० : ३ ) गन्धमादन पर्वत पर उनका निवास कहा गया है । भीमसेन ने उन्हें वहीं गदा से प्रहार किया था । ( शल्य पर्व ११ : ५५-५६ ) गुह्यक को यक्ष भी कहा गया है ( सभा पर्व १० : १५ ) । पुराणों में कुवेर के अनुयायी तथा दानव गुह्यक कहे गये हैं । ( भागवत पुराण १ : ९ : ३, १० : ३४ : २८, २ : १० : ३७, ४ : ४ : ३४ ) गुह्यक जाति हिमालय में निवास करती थी । ( भागवत ४ : ५ : २६, ४ : १० : ५ ) वे माया विद्या में निपुण थे । ( भागवत पुराण १० : ५५ : २३ ) गुह्यकों के देवता शिव थे । वे शिव के अनुयायी थे । ( भागवत पुराण ६३ : १० ) गुह्यको ने पुण्यात्माओं के संसर्ग से स्वर्ग प्राप्त किया था । ( भागवत पुराण ११ : १२ : ३, ११-१४ : ५, ) गुह्यकों को यक्षों तथा राक्षसों की श्रेणी में रखा गया है । ( ब्रह्माण्ड पुराण ३ : ७ : १६७-१६८, ४ : २ : २६, मत्स्य पुराण १३ : १७, १२१, २ ) गुह्यको के आचरण तथा कर्तव्यों का विशद वर्णन मत्स्य पुराण ( १८० : ९०, २४६ : ५३, ) तथा वायु पुराण ( अध्याय ६९ : तथा १०१ ) में मिलता है । गुह्यक वर्ग को वायु पुराण ( अध्याय ३० ) में हिमालयवासी कहा गया है । वे 'शंकर पार्वती के साथ विराजमान थे ।' उस समय आदित्यगण, वसुगण, अश्विनीकुमार, गुह्यकों को साथ लेकर वैश्रवण अर्थात् कुवेर, सनत्कुमार, अंगिरादि देवर्षि, विश्वावसु, गन्धर्व, नारद, कैलास निवासी यक्षराज महामुनि उशना तथा अप्सराऐं आदि उमा, शंकर की उपासना करने लगीं ।
८६ राजतरंगिणी हरिवंश पुराण में कैलाश शिखर पर गुह्यकों के साथ कुबेर के आगमन का वर्णन मिलता है। (८५:१०) यक्ष जाति को गुह्यक एक शाखा किंवा उपवर्ग थे। उनमें तथा यक्षों में यह भिन्नता थी। गुह्यक गणों की सम्पत्ति की रक्षा करते थे। उनका सैनिक वर्ग था। ये शक्तिशाली थे। काम साधारणतया शस्त्रोपजीवी किंवा पहरा, चोकी, रक्षादि करना और शस्त्रादि चलाना था। उन्होंने महाभारत युद्ध में भाग लिया था। यक्ष जाति के होते हुए भी उन्हें अलग गुह्यक संज्ञा उसी प्रकार दी गयी है जैसे हिन्दू होने पर भी क्षत्रियों की अपनी अलग जाति शस्त्राश्रयी होने के कारण हो गयी। वायु पुराण (अध्याय १०९) से प्रकट होता है कि गुह्यक लोग गन्ध अर्थात् ब्रह्म लोक में देवताओं के साथ रहते थे। सत्य लोक सातवां किंवा अन्तिम लोक है। उनमें समस्त देवगण गन्धर्वों, अप्सराओं, यक्षों तथा गुह्यको के साथ निवास करते हैं। वायु पुराण के (अध्याय ६९) में गन्धर्व, गुह्यक, यक्ष तथा पिशाचों को असुरदेव की श्रेणी में रखा गया है। यहां पर सर्प, भूत, पिशाच, नाग एवं मनुष्यों को पृथ्वो लोक का निवासी बताया गया है। गुह्यकों की उत्पत्ति के विषय में वायु पुराण (अध्याय ९ १५, ३४) में क्या है-‘ब्रह्मा ने रजस्तम प्रधान दूसरा शरीर धारण किया। उस अन्धकार में क्षुधाकुल होकर उन्होंने दूसरी प्रजा उत्पन्न को। वह प्रजा जल को भक्षण करने के लिए कटिबद्ध हो गयी। हम जल की रक्षा करते हैं। कहते हुए जो उत्पन्न हुए वे क्रोधी निशाचर राक्षस हुए। जिन लोगों ने कहा कि हम जल को खा जायेंगे, नष्ट कर देंगे ये क्रूरकर्मा गुह्यक यक्ष कहलाये। भागवत (१ ९३) में श्रीकृष्ण, अर्जुन, युधिष्ठिर आदि के रथारूढ़ गमन करने की शोभा की तुलना गुह्यकों सहित कुबेर से की गयी है। गुह्यकों को कुबेर का साथी कहा गया है। भगवान् के स्थूल तथा सूक्ष्म रूपो का वर्णन करते हुए सिद्ध, चारण, गन्धर्व, विद्याधर, असुर, गुह्यक, किन्नर, अप्सराएं, नाग, सर्प विपुरुष, उरग, मातृकाएं, राक्षस, पिशाच, प्रेत, भूत, विनायक, कूष्माण्ड, उन्माद, वैताल, यातुधान के वर्ग में गुह्यको को रखा गया है (स्कन्द० २.१०.६७ ११:१२:३, तथा १४.५)। दक्ष यज्ञ में सती के प्राण विसर्जन काल में गुह्यक तथा प्रमथ गण उपस्थित थे। शिव के पार- पद गुह्यक तथा प्रमथगण सती के साथ दक्ष यज्ञ में गये थे। सती के प्राण विसर्जन के साथ ही गुह्यकों तथा प्रमथो ने क्रुद्ध होकर दक्ष यज्ञ में विघ्न उपस्थित किया। अस्त्र-शस्त्रो से आक्रमण किया। उनके भयंकर आक्रमण वेग को देखकर भृगु ने यज्ञ द्वारा सहस्रों ऋभु नामक देवों को उत्पन्न किया। उन्होंने जलती लक- डियो द्वारा प्रमथगण तथा गुह्यको पर आक्रमण किया। उन्हें भगाने में समर्थ हुए। दक्ष यज्ञ के प्रसंग में गुह्यकालय अर्थात् गुह्यकों के निवास स्थान का उल्लेख किया गया है। सती के प्राणाहुति से क्रुद्ध होकर वीरभद्र ने दक्ष के मस्तक को यज्ञ की दक्षिणाग्नि में डाल दिया। यज्ञ को विध्वंस कर गुह्यक गण गुह्यकालय लौट गये। यहां पर गुह्यकालय हिमालय स्थित कैलास के समीपस्थ स्थान होना चाहिए। वायु पुराण ने हिमालय का यही अंचल गुह्यकों का निवास-स्थान बताया है। उत्तम हिमालय मृगया निमित्त गया था। वहा उसकी हत्या कर दी गयी थी। ध्रुव अत्यन्त क्रुद्ध होकर त्रों के अनुचरों से सेवित उत्तर दिशा मे हिमालय की द्रोणी अर्थात् घाटी में गये। वहाँ नगर गुह्यकों से जनाकीर्ण थे। (भागवत ४:१०:५) यहा पर भी निर्देश किया गया है। गुह्यक गण उत्तर दिशा में हिमा- की घाटी किंवा द्रोणी में रहते थे।
परिशिष्ट ट ८७ श्रीकृष्ण द्वारा गुह्यक शंखचूड़ के वध की कथा भागवत (१०:३४;२८) में दी गयी है । एक समय शंखचूड़ गुह्यक गोपियों को लेकर उत्तर दिशा की ओर भाग गया । श्रीकृष्ण उस अधम गुह्यक के पास पहुँचे । गुह्यक गोपियों को छोड़कर भाग गया । श्रीकृष्ण ने उसका पीछा किया । वध कर मणि लेकर वापस आये । इससे दो बातें स्पष्ट होती हैं । गुह्यक दस्यु आदि अनुचित कार्य करते थे । उनका निवास स्थान उत्तर दिशा में था । मथुरा से उत्तर दिशा पंजाब, कश्मीर, हिमाचल की ओर पड़ता है । उत्तर दिशा का अर्थ प्रायः हिमालय का उत्तरीय पर्वतीय अंचल माना जाता रहा है । प्रद्युम्न तथा शम्बरासुर वधके प्रसंग में गुह्यकों का पुनः उल्लेख भागवत (१०:५५:२३) में किया गया है । तदनन्तर शम्बरासुर ने यक्ष, गन्धर्व, पिशाच, नाग और राक्षसों की सैकड़ों माया का प्रयोग किया । गुह्यक मायावी थे । युद्ध में माया का प्रयोग करते थे । यह बात अन्य पुराणों में भी कही गयी है । शम्बर ने गुह्यकों की माया का प्रयोग किया । गुह्यकों ने युद्ध में भाग नहीं लिया था परन्तु उनकी युद्ध नीति का प्रयोग शम्बर ने प्रद्युम्न के विरुद्ध किया था । भागवत (११:१२:३) में पुनः दैत्य, राक्षस, गन्धर्व, अप्सरा, नाग, सिद्ध, चारण, गुह्यक को एक ही वर्ग में रखा गया है । गुह्यकों के पूर्वज ब्रह्मर्षि थे । देव योनि वर्ग में थे । इसका उल्लेख भागवत (११- १४:५) में किया गया है । इन ब्रह्मर्षियों की संतान देवता, दानव, गुह्यक, मनुष्य, सिद्ध, गन्धर्व, विद्याधर, चारण, किन्नर, नाग, राक्षस, और किम्पुरुष आदि थे । रामायण में कैलास के समीप गुह्यकों के रहने की बात कही गयी है । सुग्रीव ने उत्तर दिशा में माता सीता को खोजने के लिए जिन देशों तथा जातियों का नाम लिया है उनमें गुह्यक थे । वाल्मीकि रामा- यण किष्किन्धा काण्ड सर्ग ४३ श्लोक ३ मे उल्लेख आता है—'वहाँ यक्षों के स्वामी विश्रवाकुमार श्रीमान् राजा कुबेर, जो समस्त विश्व के लिए वन्दनीय है, धनदाता है, यक्षराज गुह्यको के साथ निवास करते हैं । गुह्यकों का उल्लेख यक्षो के साथ नीलमत पुराण में किया गया है : आश्रमानि तथा मध्वश्चकुस्तीर्थान्यनेकंशः । गन्धर्वाप्सरसो यक्षाः शैलेन्द्राश्च सगुह्यकाः ॥ 186 = २५९-२६० × × × गुह्यकेश्वर का भी उल्लेख नीलमत में मिलता है : गुहेश्वरः शतमुखा यष्टिकापथ एव च । कदम्बेशस्तथा पुण्यः क्षेत्रं चैव समन्ततः ॥ 118 = १६०-१६१ यावच्छत सुखं तीर्थं पावतीर्थं गुह्येश्वरम् । तावत् क्षेत्रं समं पुण्यं चाराणस्याथवाधिकम् ॥ 119 = १६१-१६२ कल्हण के गुह्यक शब्द के व्यवहार से गुह्यक जाति की सत्यता तथा वास्तविकता पर विशेष प्रकाश पड़ता है । पुराणों में गुह्यकों को यक्षों की एक उपजाति माना है । कल्हण के इस वाक्य से कि राजा ने गुह्यको से सहायता ली (रा० १:१५६) इसका अर्थ है पुल निर्माण का कार्य उनसे लिया । इससे मालूम होता है । उस समय गुह्यक नाम की जाति कश्मीर में रहती थी । यह जाति परिश्रमी तथा निपुण थी । पुल
४८ राजतरंगिणी
बनाने का काम आज भी अलौकिक कार्य समझा जाता है । किन्तु कश्मीरी कलाकार की सहायता न लेकर गुह्यकों की सहायता पुल बनाने के लिए ली गयी । इसका अर्थ है कि यह जाति इस कला में निपुण थी । यक्ष नाम की भी एक जाति थी, जो कश्मीर में रहती थी । यक्षों को कालान्तर में मानव विशेष समझ लिया गया था । इसी प्रकार गुह्यकों को भी मानव विशेष समझा गया । परन्तु कल्हण के वर्णन से स्पष्ट हो जाता है गुह्यक एक जाति थी । उस जाति के लोग कश्मीर में आबाद थे । निर्माण कला में निपुण थे । कल्हण ने ( १:५९, १८४, ३ ३४९ ) से यक्ष का उल्लेख किया है । यक्षों के सन्दर्भ में कहा जाता है । उनका उपयोग सेतु अर्थात् पुल बनाने में किया गया था । पुराण, महाभारत में यक्ष के अन्तर्गत गुह्यक जाति मानी गयी है । अतएव राजा दामोदर ( ता० १:१५९ ) के काल तक यक्ष और गुह्यक दोनों जातियां कश्मीर में थीं ये परिश्रमी थीं । शिल्प उनका मुख्य कार्य था ।
परिशिष्ट 'ठ' यक्ष ( तरंग १ : १५९-पृष्ठ २१८ ) कल्हण कश्मीर में प्रचलित किवदन्ती की ओर संकेत करता है। प्राचीन विशाल इमारतों का निर्माण विशाल शिलाखण्डों से किया गया है। उन्हें यक्षों ने किया था। वे मानवीय शक्ति के परे की बात है। कल्हण ने जिन भव्य भवनों तुंग निर्माणों का वर्णन किया है उनमें बहुतों के ध्वंसावशेष वर्तमान हैं। कश्मीरी मुसलमान उक्त निर्माणों को जिन तथा परियों का बनाया मानते हैं। किसी ग्रामीण से पूछने पर उत्तर मिलता है। पाण्डवों ने बनाया था। यक्ष शब्द ऋग् तथा अथर्ववेद में अनेक स्थलों पर आया है। ( ऋग्वेद १:१९०:४, ४:३:१३, ५:१०:४, ७:५६:१६, १०:८८:१३, ७:६१:५, अथर्ववेद ८:९:२५ १०:२:३२, १०:७:३८, १०:८:४३ ११:२:४ ) वायु, मत्स्य, ब्रह्माण्ड पुराणों में यक्ष शब्द प्रायः गन्धर्व तथा किन्नर के साथ आया है। यह सब हिमालय प्रदेश की पर्वतीय जातियाँ थी। अलवेरूनी ने गन्धर्वों को गायक जाति में गिना है। उनका संगीत तथा नृत्य पेशा माना है। ( मत्स्य : ११४:८२; ब्रह्माण्ड : २:१८:३३ ) गन्धर्वान किन्नरान् यक्षान् रक्षोविद्याधरोरगान् । कलायग्रामकांश्चैव तथा किंपुरुषान् खसान् ॥ हरिवंश पुराण, भविष्य पर्व ( ३३:११ ) में महर्षि, वसु, अप्सरा, गन्धर्व के साथ यक्ष का उल्लेख किया गया है। उन्हें कुबेर के भवन में निवास करना दिखाया गया है। ( वायु : ३९:५७ ) ( नीलमत : 1007-8 ) अग्नि पुराण ( १९ : १८ ) में उन्हें 'कश्यपपत्नीखसाजाता :' अर्थात् कश्यप की पत्नी खसा से यक्षों की उत्पत्ति हुई थी। यक्षों का वर्णन महाभारत में प्रचुर रूप से मिलता है। गुह्यकों के सन्दर्भ में यक्षों का उल्लेख किया गया है। महाभारत मे उन्हें देव योनि में रखा है। विराट अण्ड द्वारा ब्रह्मादि के उत्पन्न होने के पश्चात् यक्षो की उत्पत्ति बताई गयी है। महाभारत आदि पर्व ( १ : ३५ ) में यक्षों को पुलस्त्य मुनि की सन्तान कहा गया है ( आदि पर्व ६६ : ७ )। राक्षस रावण पुलस्त्य का नाती था। अतएव यक्षों का सम्बन्ध राक्षसों से माना गया है। यक्ष मानव थे। श्री शुकदेवजी ने यक्षों को महाभारत की कथा सुनायी थी। ( आदि पर्व १ : १०८ )। यक्षों ने कुबेर का राजपद पर अभिषेक किया था। ( वन पर्व १ : १०-११ ) पाण्डव भीम ने यक्षों तथा राक्षसों को पराजित किया था। ( वन पर्व १६० : ५७-५८ । ) सुन्द उपसुन्द ने यक्षों को पराजित और पीड़ित किया था। ( वन पर्व २०८ : ७ )। यम ने यक्ष का रूप धारण कर युधिष्ठिर से प्रश्नोत्तर किया। यक्ष के प्रश्नों का उत्तर देकर धर्म- राज युधिष्ठिर ने चारों भाइयों को यम से जीवित कराया था। ( वन पर्व ३१४ : १७ )। १२
९० परिशिष्ट ठ प्रायः देवताओं की मूर्तियों पर यक्षगण नभोपय से उन्हें माला पहनाते, उनपर पुष्प वर्षा करते दिखाये जाते हैं। भगवान् बुद्ध की मूत्ति में भी शिरोभाग दोनों पाश्र्वों में उड़ते यक्ष माला सहित उत्कीर्ण किये मिलते हैं। ब्रह्माण्ड तथा वायु पुराणों के अनुसार ये राक्षस तथा खसा की सन्तान थे। ये अपनी माता को खा जाना चाहते थे। अतएव उनका नाम यक्ष पड़ा। उनके आकार का वर्णन किया है। उन्हें चार हाथ तथा चार पैर होते हैं। रात्रि में आहार निमित्त विचरण करते हैं। यमु दनि का रूप धारण कर अप्सरा क्रथस्थला के साथ नन्दन में निवास किया था। उससे रजत नामक पुत्र उत्पन्न हुआ था। यक्ष अपने पुत्र के साथ हिमालय में निवास निमित्त आया। ब्रह्माण्ड पुराण (२·१८ : ३३२ · ३ : ७ : ६०, १००-१७, २२:१४, ४१ : ३०, ७१ : १:१) तथा भागवत आदि पुराणों में यक्षों की उत्पत्ति की एक और कथा है। कश्यप पिता तथा खशा माता का पुत्र यक्ष था। (भागवत २:६:१३, ६:८:२४, १०:६:२७, ६२:१९, ८५:४१; ब्रह्माण्ड पुराण २:३२ : १-२, ३५· १९१, ३६ : ११८।) पुराणों में उन्हें रुद्र के अनुयायी रूप से चित्रित किया गया है। उनके स्वामी का नाम कुबेर है। (भागवत पुराण ११ १६. १६)। मत्स्य पुराण (८.५) के अनुसार ब्रह्मा ने यक्षों का अधिनायकत्व शूलपाणि को दिया था। यक्षों ने कच्चे पात्र में वसुधा का दोहन किया था। मत्स्य पुराण (१० : २२,) के अनुसार वृत्र की सहायता इन्द्र के विरोध में यक्षों ने की थी। दक्ष के यज्ञ में सती के साथ गये थे। यक्ष वृत्र के पक्ष से देवताओं से युद्ध कर रहे थे। (भागवत ६:१०:२० ४:४:४) उनके खेलों का वर्णन भागवत पुराण (१०:९०:९) में किया गया है। हरि की भक्ति के कारण यक्षों का मंगल होता है। (भागवत ७:७:५०)। यक्ष देवों के साथ भगवान् कृष्ण को देखने आये थे। (भागवत ७.८:३८,) रावण ने यक्षों को परास्त किया था। (ब्रह्माण्ड पुराण ३:७:२१५,) यक्ष पित्रों की पूजा करते थे। (भागवत पुराण ३:१०:२८,) मत्स्य पुराण (अध्याय २३) में वर्णन मिलता है। देवगुरु बृहस्पति की पत्नी तारा के कारण शंकर तथा चन्द्रमा में युद्ध हुआ। उसमें यक्षों के स्वामी कुबेर ने वैशाल, यक्ष, नाग तथा किन्नरों की सेना के साथ शंकर की ओर से युद्ध में भाग लिया था। मत्स्य पुराण (अ० १८०) में यक्षों के विषय में एक रोचक कथा दी गयी है। उससे यक्षों के व्यवहार, आचरण तथा धर्म पर प्रकाश पड़ता है। इसका सम्बन्ध हरिकेश यक्षसे है। पूर्णभद्र यक्षो का राजा था। उसका पुत्र हरिकेश था। हरिकेश शिव का उपासक था। पूर्णभद्र ने अपनी पुरातन परम्परा पर पुत्र का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा—रुद्र की उपासना उचित नहीं है। हमारे धाम मानवों से भिन्न हैं। यक्ष स्वभाव से क्रूर होते हैं। कच्चा मांस खाते हैं। कुत्सित जीवों का भक्षण करते हैं। हिंसक होते हैं। न हि यक्षकुलीनानां मूढ वृत्तं भवत्युत । गुह्यका यत यूयं वै स्वभावात्क्रूरचेतसः ॥ क्रव्यादाश्चैव किंमक्षा हिंसाशीलाइच पुत्रक । मैवं कार्षीर्न ते वृत्तिरेवं दृष्टा महात्मना ॥
, परिशिष्ट ४ ९१ पिता की बात न मानकर, हरिकेश काशी आकर, तपस्या करने लगा । तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने हरिकेश से वर मांगने के लिए कहा । हरिकेश ने शिव भक्ति का वर मांगा । शिव ने प्रसन्न होकर यक्ष को वरदान दिया—'यक्ष, तुम पूज्यगणों के स्वामी तथा धनपति होगे । प्राणियों से अजेय होगे । अन्नदाता होगे । क्षेत्रपाल होगे । उद्भ्रम तथा संभ्रम नामक दो गण तुम्हारे सेवक होंगे । तुम दण्डपाणि होगे ।' काशी तथा मथुरा दोनों स्थानों पर यक्ष लोग अपने पुरातन धार्मिक परम्परा के स्थान पर शिव उपासना करने लगे । यक्षों ने लौकिक किंवा जातीय धर्म तथा रीतियों के स्थान पर शैव मत स्वीकार कर लिया । उन्हें कालान्तर में शिव के गणों में सम्मिलित कर लिया गया । वे शिव के भक्त तथा अनुयायी हो गये । भागवत ( २ : ६ : १३ ) में विराट् पुरुष के वर्णन के प्रसंग में देवता, दैत्य, मनुष्य, नाग, यक्ष, मृग, गन्धर्व, अप्सरा, राक्षस, भूत, प्रेत, विद्याधर सर्पादि को एक वर्ग में रखकर उन्हें विराट् पुरुष माना है। भागवत ( ६ : ८ २४ ) में नारायण कवच के वर्णन में—कूष्माण्ड, विनायक, यक्ष, राक्षस, भूत, प्रेतादि को कौमोदकी गदा से नष्ट करने की प्रार्थना की गयी है । देवराज इन्द्र के विरुद्ध आते हुए यक्षों का वर्णन मिलता है । दैत्य, दानव, यक्ष, राक्षस सुवर्ण के साज सामान से सुसज्जित होकर देवराज इन्द्र की सेना की बाढ़ रोकने के लिए आ गये थे । ( भा० : १० : २० । ) नृसिंह अवतार के समय भगवान् के समीप जय-जयकार करने आने वालों में—सिद्ध विद्याधर महा- नाग, मनु, प्रजापति, गन्धर्व, अप्सराऐं, चारण, यक्ष, किंपुरुष, वैताल, सिद्ध, किन्नर और सुनन्द तथा कुमुद आदि विष्णु के सभी पार्षद यहाँ आये । ( भागवत ७ : ८ : ३८ ) यहाँ पर विष्णु के पार्षद रूप में यक्षों का वर्णन किया गया है । रेवत ने कुशस्थली नामक नगर बसाया था । वहाँ से वे आनर्तादि देशों पर राज्य करते थे । उनके पुत्र ककुद्मी थे । शारपाणि के पुत्र अनर्त थे । अनर्त के पुत्र रेवत थे । रेवत के एक शत पुत्र थे । उनमें ककुद्मी ज्येष्ठ था । ककुद्मी की कन्या रेवती थी । रेवती का विवाह दोपावतार स्वरूप बलदेव के साथ किया गया था । वे ब्रह्मा से भेंट करने गये थे । लौटकर अपने नगर में आये । देखा कि उनके वंशजों ने यक्षों के भय से नगर त्याग कर दिया था । ( भागवत पुराण ९ : ३ : ३५ । ) भागवत ( १० : ६ : २७ ) में यक्षों को भूत, प्रेत, पिशाच, राक्षस और विनायक के वर्ग में रखा गया है । भागवत पुराण ( १० : ३२ : १६ ) में यक्षों को पुनः देवता, गन्धर्व, सिद्ध, चारण, पन्नग, दैत्य, विद्याधर तथा मनुष्य के साथ वर्णन किया गया है । भागवत पुराण ( १० : ९० : ९ ) में भगवान् अपनी पत्नियों के साथ विहार करने की उपमा यक्षराज कुबेर का यक्षिणियों के साथ विहार करने से दी गयी है । उद्धव के प्रश्नों का उत्तर देते हुए कृष्ण ने अपने विराट् स्वरूप का वर्णन किया है । 'मैं दैत्यों में दैत्यराज प्रह्लाद, नक्षत्रों में चन्द्रमा, ओषधियों में सोमरस एवं यक्ष राक्षस में कुबेर हूँ ।' ( भागवत ११ : १६ : १६ ) यक्षों को धनकृपण कहा गया है ? 'जो मनुष्य, देवता, ऋषि, पितर, प्राणी, जाति, भाई, कुटुम्बी और धन के भागीदारों को उनका भाग देकर सन्तुष्ट नहीं रखता और न स्वयं ही उपभोग करता है वह यक्ष के समान धन की रखवाली करने वाला कृपण है ।' ( भा० ११ : २३ : २४ ) ।
९२ राजतरंगिणी रामायण में सुग्रीव ने बन्दरों को सीता के खोजने के लिए जिन देशों तथा जातियों का नाम लिया था उनमें यक्ष का भी नाम है। यह जाति कैलास के समीप उत्तर में निवास करती थी । ( वाल्मीकि रामायण किष्किन्धा काण्ड सर्ग ४३ श्लोक २१-२३ । ) मत्स्य पुराण ( अध्याय १२१ ) में यक्षों के निवासस्थान के सम्बन्ध में उल्लेख मिलता है—'कैलास पर्वत के पूर्व और उत्तर दिशा में दिव्य सुवेल नामक पर्वत तक फैला रत्नों की तरह जाज्वल्यमान गन्धप्रभ गिरि है। उसके समीप अच्छोद सरोवर है। उस सर से अच्छोद नदी निकली है। नदी के तट पर के चैत- रथ वन है। उसके समीपस्थ पर्वत पर मणिभद्र क्रूरकर्मा यक्ष सेनापति गुह्यकों से रक्षित निवास करता है।' 'कैलास के दक्षिण और पूर्व दिशा में हेमशृङ्ग दिवा लोहित नामक एक महान् पर्वत है। उसके तट पर विशोक वन है। वहाँ मणिधर यक्ष परम धार्मिक एवं सौम्य गुह्यकों द्वारा रक्षित निवास करता है। ककुद्मी कैलास के पश्चिम ककुद्मान पर्वत पर रुद्र के यूप (अग्निवेश्वर) की उत्पत्ति हुई थी। त्रिककुद के सम्मुख त्रैककुद कज्जल तुल्य शैल है। वहाँ वैद्युत पर्वत है। उसके पाद में दिव्य मानस सरोवर है। उससे सरयू नदी निकली है। उसके तट पर नैभ्राज दिव्य वन है। यहां प्रहेति का पुत्र कुबेर का सेवक ब्रह्मघाती पौरुषशाली राक्षस निवास करता है। वायु पुराण अध्याय ३९ में यक्षों का निवास स्थान दिया गया है। शतशृंग पर्वत पर अत्यन्त यशो यक्षो के सौ पुर हैं। वायु पुराण अध्याय ६९ में यक्षों के विषय में उल्लेख है— 'पुण्यजन नामक यक्ष, गुह्यक नाम से प्रसिद्ध यक्ष, एवं देवजन नामक यक्षादि गुह्यकों के अन्तर्गत हैं। अगस्त्य, पौलस्त्य तथा विश्वामित्र के गोत्रों में उत्पन्न होने वाले राक्षस तथा यक्षों के राजा कुबेर हैं। अलका नगरी के कुबेर अधीश्वर हैं। यक्ष केवल आँखों से देखकर रक्त मास एवं चर्बी पी जाते हैं। राक्षस शरीर के भीतर प्रवेश कर पी जाते हैं। पिशाच पीडित कर पीते हैं। सभी लक्षणों से सम्पन्न देवताओं के समान अधिकारी, तेजस्वी, बलवान, ऐश्वर्यशाली, इच्छानुसार रूप धारण करने वाले, शक्तिशाली, विक्रमी, लोकों द्वारा पूजनीय, सूक्ष्म स्वरूप धारण करने वाले, तेजस्वी, यक्षादि के योग्य वरदान देने वाले, यज्ञ परा- यण एवं देवताओ के समान धर्मात्मा होते हैं, उन्हें असुर कहा जाता है। गन्धर्वों का प्रभाव देवताओ की अपेक्षा हीन-चौथाई हीन होता है। अर्थात् गन्धर्कों में देवताओं का चतुर्थांश प्रभाव है। गुह्यक का प्रभाव गन्धर्वों के प्रभाव का चतुर्थांश होता है। अर्थात् गुह्यकों में केवल सोलहवां भाग देवताओ का प्रभाव शेष रहता है। राक्षसों का प्रभाव गुह्यकों अर्थात् यक्षों तुल्य होता है। पिशाचों का प्रभाव यक्षों से तीन गुना हीन होता है। रूप, आयु, बल, धर्म, ऐश्वर्य, बुद्धि, तपस्या, शास्त्र, बल एवं पराक्रम में गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पिशाच चार देवयोनियों में उत्पन्न होने वाले वर्ग सुर तथा असुरों की अपेक्षा हीन होते हैं। उक्त उद्धरणों से यक्षों के सम्बन्ध में कुछ बातें स्पष्ट होती हैं। (१) यक्ष देवयोनि मे थे। ये मानव थे। (२) उन्हें गन्धर्व, राक्षस तथा पिशाचों के वर्ग में रखा गया है। (३) सुरों की अपेक्षा असुरों के वर्ग में उन्हें रखा गया है। (४) वे हिमालय निवासी थे। (५) उनका आवास कैलास के समीप था। (६) उनका आसुरी आचरण मांसादि खाने तथा रक्तपात करने का था। (७) किन्तु कालान्तर में वे शिव के अनुयायी होकर शैवमतावलम्बी हो गये थे । (८) कुबेर उनका राजा था। (९) वे युद्ध में भाग लेते थे। (१०) क्रूरकर्मा थे। (११) मत परिवर्तन के कारण शिव के गण बन गये