भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 887

८२ राजतरंगिणी धर्म स्थान खण्डहर हो गये थे । उसके अनुसार उत्तर दिशा में गान्धार का विस्तार १००० ली पूर्व में सिन्धु नदी तक था । राजधानी पुरुषपुर अर्थात् पेशावर ४० ली के क्षेत्र में फैला था । गान्धार राजवंश का लोप हो गया । कपिशा राज्य के अन्तर्गत उसका शासन होता था । नगर तथा ग्राम उजड़ गये थे । परन्तु देश धनधान्य पूर्ण था । उपज खूब होती थी । भूमि उर्वरा थी । अनेक प्रकार के अन्न, फल तथा फूल होते थे । लोग लज्जालु तथा कोमल हृदय थे । लोगों में साहित्य के प्रति रुचि थी । कुछ ही बौद्ध धर्मानुयायी बच गये थे । शेष मूर्तिपूजक तथा धर्म भ्रष्ट हो गये थे । पाणिनि का गान्धार प्रदेश में जन्म हुआ था । गान्धार की राजधानी पुष्कलावती किंवा पुष्करावती सिन्धु के पश्चिम तथा तक्षशिला के पूर्व की ओर थी । गान्धार पहले सिन्धु के दोनो ओर फैला था किन्तु कालान्तर में सिन्धु नदी के पश्चिम ओर ही रह गया । पुष्करावती नगर को नींव भरत के पुत्र पुष्कर ने डाली थी । (विष्णु पुराण ४ . ५) । आठवीं तथा नवी शताब्दी में मुसलमानों के उत्कर्ष के साथ ही साथ यह देश शनैःशनैः उनके राज- नीतिक तथा सांस्कृतिक प्रभाव में आ गया । सन् ८७० ई० में अरब सरदार याकूब ने अफगानिस्तान पर आंशिक विजय प्राप्त की थी । अलप्तगीन तथा सुबुक्तगीन के आक्रमणों का वहाँ के हिन्दू नरेशों ने सामना किया था। सन् ९९० में लम्पक (लमगान) का दुर्ग हिन्दुओं के हाथो से निकल गया । काफिरिस्तान के अतिरिक्त समस्त अफगानिस्तान को इस्लाम स्वीकार करना पड़ा । ग्यारहवीं तथा बारहवीं शताब्दी में हिन्दू शाही वंशजों के हाथ में गान्धार प्रदेश का शासन-सूत्र आ गया था । सन् १०२१ ई० में सुलतान महमूद गजनो ने गान्धारराज त्रिलोचन पाल पर आक्रमण किया । राजा तोंसी तट पर पराजित हो गया । गान्धार के हिन्दू धर्म तथा स्वतंत्रता दोनों का ही लोप हो गया । तत्पश्चात् केवल ५ वर्ष के लिए उसके पुत्र भीमपाल ने पुनः स्वतंत्रता प्राप्त की । परन्तु मुस्लिम शक्ति के सम्मुख गान्धार मुस्लिम धर्म तथा संस्कृति में लोप हो गया । मुस्लिम इतिहासकारों ने गान्धार की राज- धानी तक्षशिला का वर्णन नही किया है। तक्षशिला अपना पूर्व गौरव खो चुका था। खंडहरो का ढेर मात्र रह गया था । मुस्लिम इतिहासकारों ने उसका उल्लेख करना महत्वपूर्ण नही समझा । इम वैदिक काल से अठारहवीं शताब्दी तक गान्धार भारतीय राज्य का अंग होता और निकलता रहा है। उसका इतिहास भारतीय इतिहास में गुंथा है। उसे अलग रखना कठिन है। वहा भारतीय संस्कृति फली-फूली । यहाँ से बाहर गयी । ललित कलाएं विकसित हुईं । गान्धार का पुराना नाम, धर्मादि का लोप हो गया । उत्तर-पश्चिमीय सीमान्त प्रदेश के रूप में उसका अधिक क्षेत्र पाकिस्तान बनने के पूर्व भारत का अंग था । तक्षशिला का वर्णन करते हुए प्लिनी लिखता है कि नगर पर्वत मूल के उस स्थान पर आबाद था, जहाँ पर्वत भूमि में मिल जाता था । नगर समतल भूमि में बसा था । यह नगर की बड़ी प्रशंसा करता है कनिघम ने तक्षशिला में ५५ स्तूप, २८ विहार तथा ९ मन्दिरो का ध्वंसावशेष देखा था । नागार्जुनी कोन्डा के वीरपुरुष दत्त के अभिलेख में गान्धारका उल्लेख आया है। गान्धार में १००० से अधिक बौद्ध विहार थे । युवान्च्वाग के समय में उनको बुरी अवस्था थी । अनेक स्तूपों के शिखर खंडहर थे । लगभग १०० देव मन्दिर गान्धार में थे । पुष्करावती गान्धार को राजधानी थी । उसकी राजधानियां विभिन्न समयों में बदलती रही है । पुष्करावती किंवा पुष्कलावती तथा कभी तक्षशिला हो